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यूरोप के सामने पहचान की चुनौती

Updated at : 17 Jul 2024 8:43 AM (IST)
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यूरोप के सामने पहचान की चुनौती

इस वर्ष अप्रैल में द इकोनॉमिस्ट ने लिखा था कि यूरोपीय संघ में कोई ढाई करोड़ मुस्लिम हैं और पूरे यूरोप में इनकी संख्या पांच करोड़ है.

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वर्तमान यूरोप में अतीत ही भविष्य है. लगभग 13 सौ साल पहले युद्ध से यूरोप के धार्मिक परिदृश्य को बदलने की कोशिश हुई थी. आठवीं से दसवीं सदी के बीच उम्मयद शासकों ने स्पेन, पुर्तगाल, सिसिली और माल्टा को जीतकर यूरोपीय इतिहास को नया मोड़ देने की कोशिश की, पर वे इन दक्षिणी सीमाओं से आगे नहीं जा सके. ब्रिटिश इतिहासकार एडवर्ड क्रीजी ने 19वीं सदी में लिखा था कि चार्ल्स मार्टेल की महान जीत ने पश्चिमी यूरोप में अरबों की जीत को निर्णायक रूप से रोका, इस्लाम से ईसाइयत को बचाया तथा प्राचीन अवशेषों एवं आधुनिक सभ्यता के स्रोतों को संरक्षित किया.

हाल में ब्रिटेन में लेबर पार्टी ने भारी जीत हासिल की है. नयी संसद में मुस्लिम सांसदों की संख्या 19 से बढ़कर 25 हो गयी है. फ्रांस में इस्लाम-विरोधी, प्रवासन-विरोधी राष्ट्रवादी दक्षिण को वामपंथी पार्टियों के गठबंधन ने हरा दिया है. उसके बाद वहां फसाद भी हुए. दूसरी ओर, स्विटजरलैंड, इटली, फिनलैंड, स्लोवाकिया, हंगरी, क्रोएशिया और चेक रिपब्लिक में राष्ट्रवादियों को जनादेश मिला है. स्वीडन की संसद में दक्षिणपंथी पार्टी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. नीदरलैंड में इस्लाम-विरोधी नेता गीर्ट वाइल्डर्स चार दलों के गठबंधन के नेता हैं. इटली की जॉर्जिया मेलोनी जैसी दक्षिणपंथी नेता यूरोप में शरिया-विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाते हैं. हार के बावजूद फ्रांस में ले पेन डटी हुई हैं.

मध्य युग में जो युद्ध पीछे धकेला गया था, वह वापस लौटता प्रतीत हो रहा है. शब्दों के हथियारों से लड़ने वाली सेनाओं के नये नाम इस प्रकार हैं- कॉमी, वोक, एंटी-सेमिटिक, इस्लामोफोब, नियो नाजी आदि. खैर, आप जहां भी हों, लोकतंत्र रैडिकल इस्लाम के लिए मध्यकालीन सेनाओं से बेहतर साधन साबित हो सकता है. ग्लोबल मुस्लिम ट्रैवल इंडेक्स 2024 के अनुसार, पश्चिम में ब्रिटेन मुस्लिमों के लिए सबसे अच्छा गंतव्य है. फिर भी सर्वे बताते हैं कि 40 प्रतिशत ब्रिटिश मुस्लिम शरिया को कानून बनाना चाहते हैं.

फ्रांस में ‘स्वतंत्रता’ जेहादियों और उनके समर्थकों के लिए है, ‘समता’ हत्यारों के लिए है तथा ‘बंधुत्व’ उस धर्म के लिए है, जो चर्चों को मस्जिद बनाना चाहता है. ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्हें लगता है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और शारीरिक सुरक्षा पर खतरा है. यूरोप में हर जगह उन्मादी हमले का जोखिम है. लोग भयभीत हैं. साल 2014 के एक सर्वे में पाया गया था कि 57 प्रतिशत जर्मन इस्लाम को खतरा मानते हैं, 61 प्रतिशत का मानना है कि इस्लाम और पश्चिम साथ नहीं चल सकते, 40 प्रतिशत लोग मानते है कि इस्लाम के चलते वे अपने ही देश में अजनबी जैसा महसूस करते हैं तथा 24 प्रतिशत मुसलमानों को जर्मनी नहीं आने देना चाहते हैं.

ब्रिटेन में 2012 के एक सर्वे में पाया गया था कि 49 प्रतिशत लोग आशंकित है कि ब्रिटिश मुस्लिमों और गोरे अंग्रेजों में सभ्यतागत युद्ध होगा. ये वही लोग हैं, जिन्होंने कंजर्वेटिव पार्टी को बुरी तरह हरा दिया है. साल 1291 में रोमन कैथोलिक चर्च के तबाह होने के साथ जेरूसलम को इस्लामी नियंत्रण से छीनने के धर्मयुद्धों का अंत हो गया था. महान इस्लामी योद्धा सलादीन को ब्रिटिश शासक रिचर्ड प्रथम ने हरा दिया था.

दोनों में हुए समझौते से लेवांत क्षेत्र में ईसाइयत के अस्तित्व को एक सदी का समय और मिल गया. सलादीन उदार था, पर अब उसके कम उदार धार्मिक वंशज ब्रिटेन की मदद से ही ब्रिटेन पहुंच चुके हैं. वोट बैंक की राजनीति ने ब्रिटिश नेताओं को समझौता करने वाली की पीढ़ी में बदल दिया है. ऋषि सुनक इस कारण भी हारे कि वे प्रवासन पर स्पष्ट नहीं थे और धुर दक्षिणपंथी रिफॉर्म पार्टी ने उस खेमे के वोटों को बांट दिया.

मुस्लिम अपनी धार्मिक पहचान पर अडिग रहते हैं. मुस्लिम आबादी 2011 में 4.9 प्रतिशत थी, जो 2021 में 6.5 प्रतिशत हो गयी. मस्जिदों की संख्या एक दशक में दुगुनी हो गयी है. एक आकलन के अनुसार, लगभग 52 सौ ब्रिटिश हर साल इस्लाम को अपनाते हैं. अन्य अनुमान के अनुसार, फ्रांस में बीते 25 साल में इस्लाम में धर्मांतरण दुगुना हो गया है. यूरोपीय संघ में हर जगह ऐसी ही स्थिति है और धर्म का एक हिस्सा स्थायी जेहाद के लिए समर्पित है. इस वर्ष अप्रैल में द इकोनॉमिस्ट ने लिखा था कि यूरोपीय संघ में कोई ढाई करोड़ मुस्लिम हैं और पूरे यूरोप में इनकी संख्या पांच करोड़ है.

इनमें अधिकतर काम की तलाश में आये थे और मुश्किल कामों के लिए उनकी जरूरत भी थी. अब इससे यूरोपीय समाजों के ताने-बाने को खतरा पैदा हो गया है. ऐसे में मुस्लिम-विरोधी भावनाओं को बल मिल रहा है. ले पेन जैसे नेता प्रवासन रोकने के पैरोकार हैं, पर दक्षिणपंथ अन्यों की तरह ही अदूरदर्शी और बिखरा हुआ हो सकता है. राष्ट्र लड़ाइयां जीतते हैं, पर युद्ध जीतने के लिए विवेक की आवश्यकता होती है.

भारत में लगभग 500 साल तक मुस्लिम शासन रहा. यूरोपीयों और अंग्रेजों का शासन भी यहां रहा. भारत एक सफल बहुसंस्कृतिवाद के लिए सीख दे सकता है. अमेरिका में जेहादीवाद के खुले प्रदर्शन पर प्रभावी रोक लगी है, जबकि सांस्कृतिक बहुलवाद को भी सुनिश्चित किया गया है. अगर यूरोप अपने सबसे करीबी सहयोगी और पूर्व उपनिवेशों से जल्दी सीख नहीं लेगा, तो सभ्यताओं के संघर्ष में वह अपने शत्रु से हार जायेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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प्रभु चावला

लेखक के बारे में

By प्रभु चावला

प्रभु चावला is a contributor at Prabhat Khabar.

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