पिछले दिनों एक बैठक में नयी पीढ़ी पर चर्चा चल निकली. चिंताएं सामने आयीं, शिकायतों का सिलसिला भी चला. किसी ने मोबाइल को दोष दिया, किसी ने सोशल मीडिया को, किसी ने बदलते संस्कारों को. इसी बीच एक सज्जन ने तनिक मुस्कराते हुए कहा, 'अरे, ये जेन जी लोग...' बात सहज थी. शायद विनोद में कही गयी थी. पर शब्द मन में कहीं ठहर गये. हमारे और हमारे बच्चों के बीच यह ‘ये’ कब आकर खड़ा हो गया? जिन्हें अंगुली पकड़कर चलना सिखाया, जिनकी पहली मुस्कान पर घर खिल उठा, जिनके सपनों में हमने अपना भविष्य देखा, ये अचानक हमारे लिए 'ये लोग' कैसे हो गये? जेन जी को लेकर हमारी सबसे बड़ी उलझन शायद यह पीढ़ी नहीं है. उलझन दरअसल वह चश्मा है, जिससे हम इसे देख रहे हैं. हर नयी पीढ़ी अपने समय से सवाल करती है. यौवन का स्वभाव ही प्रश्न है. वह पूछती है, क्यों? वह जानना चाहती है, ऐसा ही क्यों? ये प्रश्न पुरानी पीढ़ी को कई बार असुविधाजनक लगते हैं. इसे हम जेनरेशन गैप कहते हैं. पीढ़ियों में अंतर प्रकृति का विधान है. मत अलग हो सकते हैं. भाषा अलग हो सकती है. जीवन की गति अलग हो सकती है. लेकिन संवाद बना रहे, तो पीढ़ियों के बीच एक सुंदर सेतु बनता है. नयी पीढ़ी पर हमारा सबसे सहज आरोप है, 'हर समय मोबाइल में डूबी रहती है'. शिकायत पूरी तरह निराधार नहीं. पर प्रश्न का एक सिरा हमारी ओर भी मुड़ता है. क्या हमारे बच्चे हमें पुस्तक हाथ में लिये देखते हैं? क्या वे हमें परिवार के बीच बैठकर निश्चिंत संवाद करते देखते हैं? क्या भोजन की मेज पर हमारा मोबाइल हमसे दूर रहता है? क्या हम इन्हें कभी गांव की पगडंडी पर ले गये? खेत की मेड़ पर चलाया? मिट्टी की सोंधी गंध से इनका परिचय कराया? दादी-नानी की स्मृतियों में छिपी पारिवारिक कथा सुनाई? अपनी मातृभाषा की मिठास इनके भीतर उतारने का प्रयत्न किया? यदि बच्चे की दुनिया स्क्रीन में सिमट रही है, तो एक प्रश्न हमें स्वयं से भी पूछना होगा कि हमने इसे स्क्रीन के बाहर की दुनिया कितनी सुंदर बनाकर दिखाई? संस्कार केवल कहे नहीं जाते, वे जिये जाते हैं. बच्चे हमारे शब्दों से कम, हमारे आचरण से अधिक सीखते हैं. हमारी पीढ़ी के लिए संसार एक मानचित्र था. इस पीढ़ी के लिए संसार एक स्पर्श है. इसलिए इसकी जिज्ञासाएं अधिक हैं. इसके पास विकल्प अधिक हैं. अवसर अधिक हैं. और उलझनें भी अधिक हैं. दुनिया जितनी छोटी हुई है, माता-पिता, शिक्षक और समाज की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी हुई है. सूचनाओं के इस अथाह समुद्र में हमें इनके लिए किनारा बनना होगा. एक ऐसा किनारा, जिसका नाम भरोसा हो. क्या यह पीढ़ी सचमुच जड़ों से कट रही है? यह शिकायत अक्सर सुनाई देती है, आज का युवा धर्म से दूर है, अध्यात्म से दूर है, परंपरा और संस्कार से दूर है. पर जरा इसका दूसरा पक्ष भी देखिए. प्रेमानंद जी महाराज को सुनने वाले लाखों युवाओं को किस खाते में रखेंगे? मंगलवार को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर में उमड़ने वाली युवा भीड़ किसकी है? तीर्थस्थलों और आध्यात्मिक आयोजनों में बढ़ती युवा उपस्थिति हमें क्या संकेत देती है? शायद यह पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर नहीं जा रही. वह अपनी जड़ों तक पहुंचने की अपनी पगडंडी खोज रही है. इसका तरीका अलग है. इसकी भाषा अलग है. इसकी जिज्ञासा अलग है. यह हर बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करेगी कि 'हमारे यहां सदियों से ऐसा ही होता आया है'. वह पूछेगी, क्यों? और हमें उस ‘क्यों’ से डरना नहीं चाहिए. यह केवल रील बनाने वाली पीढ़ी नहीं है. जेन जी को कुछ सेकंड की रील में समेट देना उसके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा. यही पीढ़ी सीमा पर खड़ी है. यही युवा वर्दी पहनकर राष्ट्र के लिए अपना सर्वोच्च अर्पित करने को तैयार हैं. यही पीढ़ी शतरंज की बिसात पर संसार को चकित कर रही है. डी गुकेश जैसे युवा भारत की प्रतिभा का नया परिचय लिख रहे हैं. यही युवा स्टार्टअप खड़े कर रहे हैं. प्रयोगशालाओं में नये प्रयोग कर रहे हैं. खेल के मैदान में तिरंगा ऊंचा उठा रहे हैं. तकनीक, विज्ञान और उद्यमिता में नये रास्ते खोल रहे हैं. यह पीढ़ी रील भी बनाती है और रिकॉर्ड भी. इस पीढ़ी की एक सुंदर विशेषता है संवेदना. यह पीढ़ी अपने साथ दूसरों के दर्द को भी पहचानना चाहती है. पर्यावरण की चिंता हो, पशु-पक्षियों के अधिकार हों, मानसिक स्वास्थ्य हो, समान अवसर की बात हो या किसी कमजोर के साथ खड़े होने का प्रश्न, आज का युवा इन विषयों पर अधिक सहजता से बोलता है. हो सकता है, इनके कुछ निष्कर्ष हमें अपरिपक्व लगें. कुछ विचारों से हमारी असहमति हो. लेकिन इनकी संवेदना को खारिज नहीं किया जा सकता. आज के युवा के पास अवसरों का आकाश है, लेकिन दबावों का विस्तार भी कम नहीं. हर क्षण तुलना है. हर मोड़ पर प्रतिस्पर्धा है. हर स्क्रीन पर किसी और की उपलब्धि चमक रही है. सोशल मीडिया पर हर कोई सफल दिखाई देता है. ऐसे में अपनी छोटी-सी असफलता भी कभी-कभी पहाड़ जैसी लगने लगती है. इसलिए आज के बच्चे को केवल अनुशासन नहीं चाहिए. उसे आश्वासन भी चाहिए. हमें जेन जी को बहुत कुछ देना है. अपना अनुभव, अपनी स्मृतियां, अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा और अपने संघर्षों से अर्जित विवेक. लेकिन इस पीढ़ी के पास भी हमें देने के लिए बहुत कुछ है. जैसे- नयी दृष्टि, नयी गति, नयी तकनीक, नये प्रश्न और दुनिया को देखने की एक नयी खिड़की. हम उन्हें धैर्य दे सकते हैं, वे हमें गति दे सकते हैं. हम उन्हें जड़ों का पता बता सकते हैं, वे हमें नये आकाश का रास्ता दिखा सकते हैं. हम उन्हें अनुभव की रोशनी दे सकते हैं, वे हमें संभावना का नया सूरज दिखा सकते हैं. रिश्ता उपदेश का नहीं, संवाद का हो. श्रेष्ठता का नहीं, सहभागिता का हो. टकराव का नहीं, विश्वास का हो. इसलिए अगली बार किसी बैठक में कोई मुस्कराकर कहे, 'अरे, ये जेन जी लोग' तो हमें भी मुस्कराकर कहना होगा, हां, जेन जी हैं. लेकिन ‘ये लोग’ नहीं. ये हमारे ही बच्चे हैं. हमारे मित्र हैं. हमारी उम्मीद हैं. हमारा आज हैं. और हमारे कल के शिल्पकार हैं. इनकी हर बात सही नहीं होगी. जैसे हमारी हर बात सही नहीं थी. ये गलतियां करेंगे. जैसे हमने कीं. ये गिरेंगे, चोट खायेंगे, सीखेंगे, फिर उठेंगे. और शायद हमसे कहीं आगे निकल जायंगे. हमें इनका रास्ता तय नहीं करना है. हमने अपने हिस्से का भारत पाया. उसे जिया. उसे थोड़ा संवारा. अब भारत की अगली यात्रा इन्हीं कंधों पर आगे बढ़ेगी. कल के भारत की इबारत इन्हीं आंखों के सपनों से बनेगी. उसके रंग इन्हीं कल्पनाओं से आयेंगे. इसलिए इन्हें कठघरे में खड़ा करने के बजाय इनके साथ खड़े होइए. याद रखिए, भारत की अगली कहानी किसी और को नहीं, इन्हीं हाथों को लिखनी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)