साइबर ठगी अब किसी व्यक्ति का बैंक खाता खाली करने या ऑनलाइन निवेश के नाम पर पैसा ऐंठने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे मानव तस्करी, बंधुआ मजदूरी, फर्जी कंपनियों, म्यूल बैंक खातों, क्रिप्टोकरेंसी और हवाला का बहुस्तरीय अंतरराष्ट्रीय तंत्र खड़ा हो चुका है. सात जुलाई को जारी एशिया/पैसिफिक ग्रुप ऑन मनी लॉन्ड्रिंग, यानी एपीजी की ‘साइबर स्कैम हब्स एंड ह्यूमन ट्रैफिकिंग’ रिपोर्ट इस अपराध के आर्थिक ही नहीं, भयावह मानवीय पक्ष को भी सामने लाती है. दक्षिण-पूर्व एशिया के कई साइबर स्कैम केंद्रों में रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं को आकर्षक नौकरियों का झांसा देकर बुलाया जाता है. विदेश पहुंचने पर उनके पासपोर्ट और मोबाइल जब्त कर लिये जाते हैं. उन्हें कड़ी निगरानी में बंधक बनाकर निवेश, रोमांस, ऑनलाइन गेमिंग, फर्जी ऋण और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध करने के लिए मजबूर किया जाता है. कंबोडिया के सिहानुकविले और पोइपेट, म्यांमार के म्यावाडी तथा श्वे कोक्को और लाओस के गोल्डन ट्रायंगल को ऐसे अपराध के प्रमुख केंद्रों में गिना गया है. भारत के गृह मंत्रालय ने भी संसद में इन ठिकानों का उल्लेख करते हुए विदेश में नौकरी स्वीकार करने से पहले नियोक्ता और भर्ती एजेंट की प्रामाणिकता जांचने की सलाह दी है. विदित है कि पीड़ित से ठगी गयी रकम सामान्यतः सबसे पहले किसी म्यूल खाते में पहुंचती है. म्यूल खाता वह बैंक खाता है, जिसका इस्तेमाल अपराध की रकम प्राप्त करने और उसे आगे भेजने के लिए किया जाता है. ये खाते कभी कमीशन, ऋण या नौकरी का लालच देकर हासिल किये जाते हैं, तो कभी फर्जी दस्तावेजों और मुखौटा कंपनियों के नाम पर खोले जाते हैं. रकम को तेजी से कई खातों में बांटकर उसकी वास्तविक पहचान धुंधली कर दी जाती है. इसके बाद पीयर-टू-पीयर सौदों या सीधे लेनदेन कराने वाले एजेंटों के जरिये उसे प्रायः यूएसडीटी जैसे स्टेबलकॉइन में बदला जाता है. यहीं से क्रिप्टो-हवाला लूप शुरू होता है. जैसे, भारत में ठगी की रकम पहले किसी म्यूल खाते में आती है. स्थानीय एजेंट इससे यूएसडीटी खरीदकर विदेश में मौजूद अपराधी के डिजिटल वॉलेट में भेजता है. इसके बदले वहां का हवाला कारोबारी स्कैम केंद्र को डॉलर या स्थानीय मुद्रा में नकद भुगतान करता है. क्रिप्टो से पैसा तेजी से दुनिया के किसी भी हिस्से में भेजा जा सकता है, जबकि हवाला उसे स्थानीय मुद्रा में नकद उपलब्ध करा देता है. फिर भी क्रिप्टोकरेंसी के हर लेनदेन को अदृश्य या गैरकानूनी मानना सही नहीं है. सार्वजनिक ब्लॉकचेन पर लेनदेन का रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है, जिसकी मदद से जांच एजेंसियां संबंधित वॉलेट और रकम के रास्ते का पता लगा सकती हैं. परेशानी तब बढ़ती है, जब अपराधी कई वॉलेट, फर्जी पहचान, विदेशी क्रिप्टो मंच और नकद लेनदेन का एक साथ उपयोग करते हैं. विदेशों में क्रिप्टो एटीएम अपराधियों को पैसा भेजने का एक और रास्ता उपलब्ध कराते हैं. इन मशीनों में नकदी जमा कर बिटकॉइन या दूसरी क्रिप्टोकरेंसी खरीदी जा सकती है. ठग पीड़ित को अपना क्यूआर कोड भेजते हैं और उससे क्रिप्टो एटीएम में नकदी जमा करने को कहते हैं. नकदी जमा होते ही क्रिप्टो सीधे ठग के डिजिटल वॉलेट में पहुंच जाती है. इसमें किसी बैंक खाते का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए लाभार्थी की पहचान करना और रकम वापस पाना कठिन हो जाता है. जांच से बचने के लिए अपराधी बड़ी रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट देते हैं. इसके लिए अलग-अलग लोगों, क्रिप्टो एटीएम और डिजिटल वॉलेट का इस्तेमाल किया जाता है. इससे रकम भेजने वाले और अंतिम अपराधी के बीच कई परतें बन जाती हैं. हालांकि, क्रिप्टो एटीएम से किया गया लेनदेन पूरी तरह गुमनाम नहीं होता. मशीन के कैमरे, स्थान, मोबाइल नंबर, क्यूआर कोड और ब्लॉकचेन पर दर्ज लेनदेन से जांच एजेंसियों को महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं. जोखिम उन देशों में अधिक है, जहां ग्राहक की पहचान और संदिग्ध लेनदेन की सूचना देने के नियम कमजोर हैं. म्यूल खातों के मामले में भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र, यानी आइ4सी ने मेवात, जामताड़ा, अहमदाबाद, हैदराबाद, चंडीगढ़, विशाखापत्तनम और गुवाहाटी में सात संयुक्त साइबर समन्वय टीमें बनायी हैं. इससे हरियाणा-राजस्थान , झारखंड, गुजरात, तेलंगाना, चंडीगढ़ और आसपास के राज्यों, आंध्र प्रदेश तथा असम समेत पूर्वोत्तर में इसके सक्रिय नेटवर्क का पता चलता है. गौरतलब है कि खाता सक्रिय होने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है. म्यूल खाते खुलने से पहले ही उनकी पहचान करना और उन्हें रोकना जरूरी है. इसके लिए बैंकों को ग्राहक के पते, घोषित कारोबार और खाते के वास्तविक लाभार्थी की सावधानी से जांच की जरूरत है. यहां एपीजी रिपोर्ट के निहितार्थ स्पष्ट हैं- साइबर ठगी केवल तकनीक या बैंकिंग से जुड़ा अपराध नहीं, बल्कि मानव तस्करी और अवैध अंतरराष्ट्रीय वित्त का गंभीर संकट है. इससे निपटने के लिए बंधक बनाये गये लोगों को बचाने, म्यूल खातों को रोकने, डिजिटल धन का रास्ता खोजने और विदेश में बैठे सरगनाओं पर कार्रवाई करने की जरूरत है. केवल बैंक खाते फ्रीज करने से पूरा नेटवर्क नहीं टूटेगा, न ही बंधकों को छुड़ाने से अपराध की आर्थिक जड़ समाप्त होगी. पीड़ितों की सुरक्षा और अपराधियों की कमाई पर प्रहार, एक साथ करना होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)