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गांधी परिवार फिर सुर्खियों में

Updated at : 09 Aug 2022 7:45 AM (IST)
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गांधी परिवार फिर सुर्खियों में

सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनी हुई हैं और बदलाव व लोकतांत्रिक चुनाव की आशा लगाये लोग चुप बैठे हैं.

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हर वीर शहीद नहीं होता, पर हर शहीद वीर होता है. कांग्रेस के केंद्र में स्थित परिवार विशेष को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के हाथों शहीद होने की उम्मीद जरूर होगी, जब वह परिवार के सदस्यों से कथित गड़बड़ियों के बारे में पूछताछ कर परिवार को वीर का दर्जा दे रही है. गांधी परिवार का इतिहास बताता है कि जब भी उसका कोई सदस्य सरकारी एजेंसियों के निशाने पर आता है, तो उसका आंतरिक शहीद सक्रिय हो जाता है.

ऐसा तब भी हुआ था, जब आपातकाल के कारनामों के लिए जनता पार्टी की सरकार ने उन्हें निशाना बनाया था. क्या ऐसा उनके वारिसों के साथ भी हो सकता है? अब जब कांग्रेस गांधी परिवार के पीछे लामबंद है, तो क्या पार्टी उस परिवार को देश की राजनीति के केंद्र में लगा सकती है? पार्टी के विरोध प्रदर्शन को देशभर के टीवी चैनलों और अखबारों में प्रमुखता से जगह भी मिल रही है.

गांधी परिवार के सदस्यों के ईडी कार्यालय आने-जाने के घंटों तक टीवी पर लाइव दिखाने से मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में कांग्रेस को फिर से देखा जाने लगा है. नेताओं के लिए कोई भी खबर बुरी नहीं होती है. कांग्रेस के लिए तो बुरी खबर कई तरह से सबसे अच्छी खबर बन रही है. निष्क्रिय समर्थक देशभर में विरोधों में भाग ले रहे हैं, लगभग ठिठका पड़ा संगठन जाग रहा है और दिशाहीन बिखरे समर्पित कार्यकर्ता उत्साहित हो रहे हैं.

ऐसे में पतनशील दिख रहा गांधी परिवार मौजूदा जांच का लाभार्थी हो गया है. सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनी हुई हैं और बदलाव व लोकतांत्रिक चुनाव की आशा लगाये लोग चुप बैठे हैं. इस स्थिति में निकट भविष्य में चुनाव भी लगभग असंभव दिख रहा है. कुछ माह पहले ही नीचे से ऊपर तक नये पदाधिकारी निर्वाचित करने के लिए कांग्रेस ने चार चरणों की चुनाव प्रक्रिया का समय तय किया था. पार्टी ने 31 मार्च, 2022 तक पहले चरण के सदस्यता अभियान को भी पूरा नहीं किया है. पिछले माह ही राज्यों के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय समिति के सदस्यों का चुनाव हो जाना था. सितंबर-अक्तूबर में अध्यक्ष और वर्किंग कमेटी के सदस्यों के चुनाव की आशा थी. राहुल गुट उन्हें अध्यक्ष के रूप में देखना चाहता है, पर वे कोई औपचारिक उत्तरदायित्व नहीं लेने पर टिके हुए हैं.

इस स्थिति का बड़ा कारण उनकी योग्यता व क्षमता पर विवाद है. पुराने लोग सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाये रखना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि भावावेशी राहुल गांधी की अपेक्षा वह अन्य विपक्षी पार्टियों से बेहतर तालमेल बना सकती हैं. अगर वह पद पर बनी रहती हैं, तब भी राहुल गांधी की ही चलेगी, जैसा राज्यसभा के हालिया चुनाव में हुआ. संगठन का वास्तविक लोकतांत्रिक चुनाव कराना गांधी परिवार का स्वाभाव नहीं है.

सलमान खुर्शीद ने बुद्धिमत्तापूर्ण बात कही थी कि वह अपने नेता के बचाव में आयेंगे और उनके नेता उन्हें बचायेंगे. इसका तात्पर्य है कि गांधी परिवार कांग्रेस है और कांग्रेस गांधी परिवार है. फिलहाल न तो कांग्रेसमुक्त भारत की संभावना दिख रही है और न ही गांधीमुक्त कांग्रेस की. वे कई वर्षों से भले ही मतदाताओं के ध्यान में न रहे हों, पर अभी वे दिखने लगे हैं. ब्रांड गांधी ने बाजार की कीमती जगह घेर ली है. सवाल यह है कि क्या वह बिक सकेगी!

केवल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल ही जांच एजेंसियों और रिजर्व बैंक एवं सेबी जैसे नियामकों के निशाने पर नहीं हैं. ईडी और रेवेन्यू इंटेलिजेंस निदेशालय के कहने पर रिजर्व बैंक ने फिर एक दर्जन से ज्यादा क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को चेतावनी दी है कि वे रेटिंग के अपने रवैये में सुधार करें. इनकी जांच कुछ साल पहले शुरू हुई थी, जब आइएल एंड एफएस और यस बैंक बहुत अधिक रेटिंग के बावजूद ध्वस्त हो गये थे.

विभिन्न कंपनियों में इन रेटिंग एजेंसियों की हिस्सेदारी के चलते उनके पेशेवर आचरण और ईमानदारी पर संदेह उठना स्वाभाविक है. सरकार को लगता है कि जब से इन रेटिंग एजेंसियों ने अंतिम निर्णायक की भूमिका हासिल की है, दो दशकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में भारी वृद्धि हुई है. सबसे पहले क्रिसिल ने अपनी दुकान लगायी थी और यह किसी के ऋण क्षमता को तय करने वाली अकेली संस्था बन गयी.

बाद में केयर, इकरा, एसएमई रेटिंग एजेंसी, ब्रिकवर्क रेटिंग्स, इंडिया रेटिंग्स, इंफोमेरिक्स आदि संस्थाएं आयीं, जिन्हें या तो बैंकों ने बनाया था या कॉर्पोरेट जगत या सेवानिवृत्त नौकरशाहों से जुड़े लोगों ने. अब इनका विश्लेषण किया जा रहा है. सभी बोर्ड मेंबरों के कारोबारी रिश्तों पर भी नजर है. ठीक से जांच होती है, तो वित्तीय क्षेत्र के कई नामी-गिरामी लोगों का पर्दाफाश हो जायेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सुधार और बदलाव अभियान हैं. उनके सभी नारे और काम भागीदारी के आख्यान पर लक्षित होते हैं. उनका एक पसंदीदा उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की गति बढ़ाना है. उन्होंने वादा किया था कि उनकी सरकार मुश्किल पैदा करने वाले नकारा कानूनों को खत्म करेगी. अब तक 200 से अधिक ऐसे कानून या तो खत्म हो गये हैं या खत्म होने की प्रक्रिया में हैं.

जो संस्थाएं कानून एवं न्याय मंत्रालय को सलाह देती हैं, उनमें एक विधि आयोग है. अभी तक तीन वर्षों की अवधि के 21 विधि आयोगों की स्थापना हो चुकी है. इन सभी ने 262 रिपोर्ट दी हैं, जिनके आधार पर बहुत से पुराने कानून हटाये गये हैं और बदलते समय के अनुरूप नये कानून बनाये गये हैं. न्यायाधीश बीएस चौहान की अध्यक्षता में बने 21वें आयोग का कार्यकाल अगस्त, 2018 में समाप्त हुआ था. हालांकि फरवरी, 2020 में 22वें आयोग की अधिसूचना जारी हो गयी थी, पर अभी तक सरकार ने उसके नामों को जाहिर नहीं किया है. चूंकि विधि आयोग की अवधि तीन साल ही होती है, सो यह आयोग इस साल के अंत में बिना किसी सदस्य या अध्यक्ष के खत्म हो जायेगा.

बीते दो वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय के 30 से अधिक न्यायाधीश सेवानिवृत्त हुए हैं और उनमें से अधिकतर विधि आयोग की अध्यक्षता के लिए योग्य हैं. कानून मंत्रालय के पास आयोग के सदस्य बनने योग्य लोगों के कई आवेदन पड़े हुए हैं, लेकिन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने आयोग की रिक्तियों को शीर्ष प्राथमिकता नहीं दी है. शायद, जैसा अंदर के लोग मानते हैं, नियुक्तियों में देरी की वजह है कि नेतृत्व उन सुधारों के स्वरूप के बारे में स्पष्ट नहीं है, जिन्हें वह आयोग के सामने रखना चाहता है. जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी का कानूनी अभियान परिभाषित होगा, योग्य नियुक्तियां कर दी जायेंगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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प्रभु चावला

लेखक के बारे में

By प्रभु चावला

प्रभु चावला is a contributor at Prabhat Khabar.

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