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गांधी परिवार की कांग्रेस

By प्रभु चावला
Updated Date

प्रभु चावला, एडिटोरियल डायरेक्टर, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

prabhuchawla@newindianexpress.com

इसे मानें या न मानें.यह परिहास लग सकता है, लेकिन यह राजनीतिक सच्चाई है. वे मत हासिल करने में असफल रहे. फिर भी, उनके पक्ष में सर्वाधिक आवाजें और शोर है. वे खबरों में राजनीतिक तौर पर अति-सक्रियता की वजह से नहीं हैं, बल्कि गांधी परिवार अपनी निष्क्रियता की वजह से शक्तिशाली है. अधर में पड़ी 135 साल पुरानी कांग्रेस में वे शायद ही कोई राजनीतिक सरगर्मी ला सकते हैं. सत्ता खोने के बावजूद गांधी परिवार कांग्रेस को बना और बिगाड़ सकता है तथा वैचारिक व जनांकिकी ढांचे को बदल सकता है. जब भी उन्हें चुनौती दी गयी, विरोधियों को रौंदते हुए वे जीत के साथ वापस आये हैं. पिछले हफ्ते भी इतिहास ने खुद को दोहराया. दो दर्जन पुराने कांग्रेसी नेताओं ने साम्राज्य को हिलाने का निर्णय किया. उनमें से कुछ पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं.

उन्होंने सोचा कि अब पार्टी और नेतृत्व को नींद से जगाया जाये. वे सक्रिय आत्ममूल्यांकन और प्रभावी नेतृत्व चाहते हैं, जो दिखने के साथ जमीन पर भी सक्रिय हो. वे अपनी राज्य सरकारों के लगातार अपमान और पतन से व्याकुल एवं आक्रोशित थे. पहुंच से बाहर सोनिया और कभी-कभार दिखनेवाले राहुल गांधी के कारण कांग्रेस नेता अनाथ महसूस कर रहे थे.

अंधकारमय राजनीतिक भविष्य उन्हें बेचैन कर रहा था. लेकिन, गांधी परिवार के लिए यह एक अन्य कठिन दौर है, जो बीत जायेगा. उनके लिए सामूहिक नेतृत्व का सिद्धांत अभिशाप है. साल 1969 में पार्टी के प्रथम विभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने पार्टी को परिवारिक स्वामित्व वाली राजनीतिक इकाई बना दिया. वंशवादी ढांचे को चुनौती देनेवाले हर असंतुष्ट को बेरहमी से कुचल दिया गया. इंदिरा नपी-तुली और दूरदर्शी अभिभावक थीं, जिन्होंने ऐसा सांगठनिक एल्गोरिदम लिखा, जो कांग्रेस में गांधी परिवार का हर मामले में वर्चस्व सुनिश्चित करता है. पार्टी या सरकार में शीर्ष नेतृत्व हेतु राजनीतिक अनुभव उनके लिए अनिवार्य योग्यता नहीं थी.

कांग्रेस नेताओं के समूह ने 20 साल बाद परिवार के प्रभुत्व और संगठन के बीच असंतुलन को सही करने का प्रयास किया था. उनमें से सभी गांधी परिवार की दरियादिली के लाभार्थी रहे हैं. लेकिन, जब वे गांधी देवों के खिलाफ खड़े हुए, तो उन्हें गद्दार घोषित कर दिया गया और भाजपा समर्थक कहा गया. जबकि, किसी का भी संघ परिवार से वास्ता नहीं है. गांधी परिवार और समर्थक असली श्रीमती गांधी के फार्मूले, जिसमें पहला शांत रहने की धमकी और फिर वफादारों के माध्यम से न केवल पार्टी, बल्कि राष्ट्र को बचाने के लिए गांधी परिवार के नेतृत्व की वकालत करते हैं.

बीते पांच दशकों में कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) या अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआइसीसी) द्वारा पास प्रस्तावों का उद्देश्य और भावना एक जैसी ही है. वे शुरुआत करते हैं कि कैसे कांग्रेस ने भारत को बर्बादी से निकाला और उसका अंत नेहरू और गांधीवाद की चापलूसी से होता है.

पिछले हफ्ते भी गुटबाजी कसीदे वाले भाषणों के साथ समाप्त हो गयी. आश्चर्यजनक है कि गांधी परिवार की प्रशंसा वाला समाधान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बढ़ाया गया. पत्र लिखनेवाले नेताओं को चेतावनी देने के साथ सोनिया और राहुल गांधी के हाथों को मजबूत करने का संकल्प दोहराया गया. कहा गया कि इस नाजुक घड़ी में किसी को भी कांग्रेस को कमजोर करने की इजाजत नहीं दी जा सकती या दी जायेगी.

यद्यपि सोनिया गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की थी, उन्हें नये अध्यक्ष के लिए अगले एआइसीसी सत्र के आयोजन तक रुकना है. इस बीच, राहुल गांधी के ताजपोशी के भी राग को अलापा गया. भारत की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी पर राजवंश का स्थायी रूप से हावी होना तय है. पिछले 40 वर्षों में जब भी गैर- गांधी परिवार के हाथ में पार्टी का नेतृत्व रहा, पार्टी में शांति नहीं रही. जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हुई, तो उनके पुत्र राजीव गांधी को प्रधानमंत्री के साथ-साथ कांग्रेस का भी अध्यक्ष भी बनाया गया.

चार साल के भीतर ही वीपी सिंह के नेतृत्व में उनके खिलाफ विरोध उभरा. उन्होंने लोकप्रिय जनादेश खो दिया, लेकिन पार्टी की अध्यक्षता बरकरार रखने में सफल रहे. दुर्भाग्य से, एलटीटीइ ने उनकी हत्या कर दी. एक बार फिर कांग्रेस के एक धड़े ने उनकी विधवा सोनिया गांधी को नेतृत्व सौंपने की वकालत की, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. संभवतः यह दैवीय हस्तक्षेप था कि सेवानिवृत्त पीवी नरसिम्हा राव की पार्टी अध्यक्ष के रूप में वापसी हुई और वे प्रधानमंत्री भी बने. 13 वर्ष बाद राव के कार्यकाल में एआइसीसी के चुनाव हुए. राव ने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया, लेकिन गांधी परिवार के करीबियों से उन्हें हमेशा खतरा बना रहा.

वर्ष 1996 में चुनाव हारने के बाद उन्हें अनौपचारिक ढंग से हटा दिया गया और सीताराम केसरी को आगे किया गया. उनकी भी वही गति हुई. विडंबना है कि केसरी ने ही अगस्त, 1997 में सोनिया को पार्टी के प्राथमिक सदस्य के तौर पर नामांकित किया था. आठ महीने के भीतर ही वे कांग्रेस अध्यक्ष बन गयीं. जब शरद पवार और अन्य ने विरोध किया, तो बाहर कर दिया गया. अगले 19 वर्षों तक वे एआइसीसी अध्यक्ष रहीं. दिसबंर, 2017 में उन्होंने मशाल बेटे राहुल गांधी को सौंप दी. लेकिन, लोकसभा में करारी शिकस्त के बाद राहुल ने इस्तीफा दे दिया. दोबारा नेतृत्व उनकी मां सोनिया के पास चला गया.

वास्तव में 1991-98 की छोटी अवधि को छोड़कर 24, अकबर रोड कांग्रेस मुख्यालय के मध्य भवन पर गांधी परिवार काबिज रहा है. कांग्रेस की वेबसाइट पर एक पेज है- हमारे प्रेरणास्रोत. इसमें नेहरू और गांधी के अलावा जगजीवन राम और मनमोहन सिंह समेत आठ शख्सियतों की तस्वीरें हैं. लेकिन, राव यहां गायब हैं.

यह उन लोगों के लिए चेतावनी है, जिसने भी गांधी : परिवार की वर्तमान पीढ़ी को कमतर करने की कोशिश की, उन्हें पार्टी इतिहास के फुटनोट में भी जगह नहीं मिलेगी. गांधी कभी पराजित नहीं होते. केवल कांग्रेस मात खाती है. एक गांधी बनाम दूसरा गांधी ही होता है. इसे मानें या न मानें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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