1. home Hindi News
  2. opinion
  3. editorial news column news prabhatkhabar editorial clashes of power corridors srn

सत्ता के गलियारों की हलचलें

By प्रभु चावला
Updated Date
सत्ता के गलियारों की हलचलें
सत्ता के गलियारों की हलचलें
Twitter

केंद्रीय मंत्रिपरिषद में फेर-बदल के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई संकेत नहीं दे रहे हैं. वे जल्दी में भी नहीं हैं. फिर भी उम्मीद में लगे नेता खुद को आगे करने या अपने आराध्यों या संपर्कों के जरिये मोदी कैबिनेट में बदलाव की कोशिश में लगे हुए हैं. कुछ लोग कुछ खास संगठनों के रसूखदारों को लुभाने में लगे हैं. कुछ अपवादों के अलावा किसी की भी प्रधानमंत्री तक सीधी पहुंच नहीं हैं, सो उन लोगों के पास इस कोरोना संकट में मोदी के लिए अपनी उपयोगिता जाहिर करने के लिए डिजिटल व सोशल मीडिया का ही विकल्प है.

प्रधानमंत्री ने केवल उन्हीं जगहों को भरा है, जो किसी के देहांत या इस्तीफे से खाली हुई थीं. आधा दर्जन से अधिक मंत्रियों के पास दो-तीन से ज्यादा मंत्रालय हैं. मंत्रिपरिषद के विस्तार के बारे में अनुमान की शुरुआत शिव सेना और अकाली दल के मंत्रियों के हटने तथा रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद हुई. अफवाहों का बाजार इसलिए भी गर्म है कि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों को छोड़ कर आये नेता भी जगह पाने की कोशिश में हैं. असली स्वयंसेवकों और दलबदलुओं के बीच संतुलन साधने को लेकर मोदी असमंजस में हैं.

मंत्री पद के इच्छुकों ने मीडिया में अपने पक्ष में खबरें छपवाने के लिए जन-संपर्क खिलाड़ियों को नियुक्त किया है. फेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सएप समूहों में नाम की चर्चा के लिए सोशल इंफ्ल्यूएंस वाली नयी खेप को लगाया. कुछ प्रवक्ताओं और नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं, लेकिन कैबिनेट में बदलाव की मुहिम के लिए किसी वर्तमान मंत्री को चिह्नित नहीं किया जा रहा है, पर पीएम मोदी का मन एक रहस्य है. हालांकि कहा जा रहा है कि ज्योतिषियों ने बताया है कि सरकार में कोई बड़ा बदलाव करने के लिए जून माह का हर दिन शुभ है. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंक विद्या और ज्योतिष दोनों को परिभाषित करते हैं.

मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां ऐसा संस्थान होती हैं, जो समाप्त नहीं होतीं. जातिगत या धार्मिक नेताओं द्वारा गठित कई क्षेत्रीय समूह व्यक्तिनीत विचारधारा के प्रभाव और ऊर्जा के चुकने के बाद गायब हो गये. इसके विपरीत राष्ट्रीय पार्टियां बनी रहती हैं, क्योंकि उनके नये खून में पुराना डीएनए होता है. इसका श्रेय संबद्ध युवा संगठनों में उनकी सक्रियता को जाता है.

कांग्रेस ने अचानक समझा कि उसे नये लोगों की दरकार है, क्योंकि पुराने लोग अपने प्रभाव को बचाने के लिए आपस में जूझ रहे हैं. यह पहली बार है, जब हाशिये पर जा चुकी कांग्रेस के बूढ़े नेताओं की अपेक्षा युवा कांग्रेस के नेता अधिक सक्रिय दिख रहे हैं. इसके अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास ने भटिंडा से बेंगलुरु तक कोरोना महामारी में राहत की हर पुकार को मदद देने के लिए अपने युवा ब्रिगेड को तैनात कर युवा कांग्रेस को लगभग सर्वव्यापी बना दिया है.

पहली बार सुस्त कनिष्ठों ने मध्य व निम्न वर्गों का भरोसा हासिल किया है, जबकि वरिष्ठ स्वीकार्यता की तलाश कर रहे हैं, मानो नेत्रहीन भविष्य देखने के लिए दूरबीन खोज रहे हों. राहुल गांधी ने अतीत से एक विचार लिया है. उनके चाचा संजय गांधी ने जनता पार्टी सरकार को हटाने के लिए युवा कांग्रेस का इस्तेमाल किया था. कमलनाथ, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, अंबिका सोनी, रमेश चेन्निथला, गुंडू राव, तारिक अनवर आदि संजय गांधी के गोलमेज के सदस्य थे. साल 1980 की लोकसभा में एक-तिहाई से अधिक सदस्य युवा कांग्रेस की पृष्ठभूमि से थे, क्योंकि वे संजय गांधी के प्रति समर्पित थे.

दूसरी ओर, भाजपा भारत की सबसे बड़ी पार्टी इसलिए बनी, क्योंकि इसके बड़े नेताओं ने युवा नेताओं को शामिल किया. वर्तमान में, इसका आधा नेतृत्व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से है, लेकिन भाजपा की युवा इकाई- भारतीय युवा मोर्चा- भारतीय युवा कांग्रेस जैसा प्रदर्शन नहीं कर सकी. दक्षिण बेंगलुरु के सांसद और युवा मोर्चा के अध्यक्ष तेजस्वी सूर्य अपने क्षेत्र तक ही सीमित हैं. भाजपा के चुनावी पोस्टर का यह चेहरा कर्नाटक के ही श्रीनिवास (युवा कांग्रेस) के उलट बड़े तकनीकी और कॉर्पोरेट नेताओं की संगत में ही संतुष्ट दिख रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीबीआइ निदेशक के रूप में सुबोध कुमार जायसवाल को चुना है. जायसवाल के विरोधियों का अनुमान था कि सरकार राकेश अस्थाना या वाइसी मोदी में से किसी को चुनेगी, जो उनसे वरिष्ठ भी हैं और प्रधानमंत्री व अमित शाह के करीबी भी माने जाते हैं. जायसवाल की साफ छवि है और वे अपने सिद्धांतों के लिए सत्ता के आदेश को न माननेवाले अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं. वे अटल बिहारी वाजपेयी की विशेष सुरक्षा टीम में रहे हैं.

एक नये कानून के आधार पर हुई उनकी नियुक्ति ने सरकार को अस्थाना और मोदी को रॉ या आइबी प्रमुख जैसे संवेदनशील पद देने से बचा लिया. जब प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने सर्वोच्च न्यायालय के एक पुराने निर्णय को उद्धृत किया कि जिन अधिकारियों की सेवानिवृत्ति में छह माह से कम शेष हों, उन्हें प्रोन्नति नहीं मिलेगी, तो इसे मोदी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. दो दिन के भीतर सरकार ने आइबी निदेशक अरविंद कुमार और रॉ प्रमुख सामंत कुमार गोयल का कार्यकाल अगले साल 30 जून तक बढ़ा दिया. दोनों इस महीने सेवानिवृत्त होनेवाले थे.

सुधीजन दो चर्चित नौकरशाहों, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और जून के अंत में सेवानिवृत्त हो रहे नीति आयोग के सीइओ अमिताभ कांत के भविष्य को लेकर अटकलें लगा रहे हैं. अरोड़ा सेवानिवृत्त होने के बाद आयुक्त बनाये गये थे और भाजपा उनके उत्साह और लचीलेपन पर, खास कर बंगाल में, बहुत खुश थी. कुछ बाबू अमिताभ कांत के लिए बेहतर अवसर की कोशिश में हैं. पार्टियों में घूमनेवाले, नरम बातें करनेवाले और संबंध बनाने में प्रवीण अमिताभ कांत नीति आयोग में पांच साल से अधिक समय बिताने और दो बार सेवा विस्तार पानेवाले पहले अधिकारी होंगे.

‘इनक्रेडिबल इंडिया’ का विचार देनेवाले और केरल को वैश्विक पर्यटन का पर्याय बनानेवाले इस व्यक्ति ने उसके बाद यूपीए और एनडीए का पसंद बने रहने के अलावा कुछ भी विशेष नहीं किया है. अरोड़ा और कांत ने कांग्रेस के दौर से अधिक एनडीए शासन में ज्यादा फोकस में रहे. बहरहाल, अक्सर चर्चा में रहने वाले दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल भी अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में पहुंच गये हैं. बैजल की जगह कौन लेगा, इसका पता अगर किसी व्यक्ति को है, तो वह केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं.

Share Via :
Published Date

संबंधित खबरें

अन्य खबरें