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महामारी में मानवीय मूल्यों का ह्रास

By आशुतोष चतुर्वेदी
Updated Date
महामारी में मानवीय मूल्यों का ह्रास
महामारी में मानवीय मूल्यों का ह्रास
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हम सभी एक ऐसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. अस्पतालों का दृश्य विचलित करता है. बिस्तर, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और रेमडेसिविर जैसी दवाओं की कमी है. मरीजों की लंबी कतारें हैं. ऐसे हालात थोड़े समय तक ही रहने वाले हैं और जल्द ही इन पर काबू पा लिया जायेगा. लेकिन आपदा की इस घड़ी में भी लूट-खसोट की अफसोसनाक खबरें आ रही हैं. मरीजों को एंबुलेंस, दवा, ऑक्सीजन सिलिंडर और अस्पताल में भर्ती के लिये लूटा जा रहा है.

अनेक प्राइवेट अस्पताल भी अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में हैं. कई निजी अस्पताल कैशलेस हेल्थ इंश्योरेंस को ही स्वीकार नहीं कर रहे हैं और मरीजों के परिवारों से लाखों की नगदी जमा करने को कह रहे हैं. वित्त मंत्रालय को इस बारे में दिशा निर्देश जारी करना पड़ा है. बाजार से ऑक्सीजन सिलेंडर गायब हैं और उनकी मुंहमांगी कीमत वसूली जा रही है.

यही हाल रेमडेसिविर इंजेक्शन के साथ है. दवाइयां और यहां तक कि विटामिन तक बाजार से गायब हैं और अधिक कीमत में बेचे जा रहे हैं. खाने-पीने के सामान भी अचानक महंगे हो गये हैं. मुनाफा कमाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा जा रहा है.उम्मीद थी कि संकट की इस घड़ी में हम एक-दूसरे के काम आयेंगे, लेकिन यह बेहद शर्मनाक है कि समाज का एक वर्ग आपदा को अवसर मान रहा है.

हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने कोरोना की मुश्किलों पर सुनवाई के दौरान कहा कि आपदा के समय नैतिक ताना-बाना बहुत हद तक विखंडित हो गया है. लोग महामारी से लड़ने के लिए साथ आने के बजाय कालाबाजारी कर रहे हैं. न्यायमूर्तिद्वय विपिन सांघी और रेखा पल्ली की पीठ ने कहा कि हम अब भी परिस्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं, इसीलिए हम एक साथ नहीं आ रहे हैं. इसी कारण हम जमाखोरी और कालाबाजारी हो रही है.

कोरोना महामारी के बीच देश की अदालतों ने सराहनीय हस्तक्षेप किया है और सरकारों को तत्काल कदम उठाने के लिए बाध्य किया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई न होने से मरीजों की जान जाना अपराध है और यह किसी जनसंहार से कम नहीं है. जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस अजित कुमार की पीठ ने कहा कि कोरोना मरीजों को मरते देख हम दुखी हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक अन्य खंडपीठ ने सिस्टम की कमी को उजागर कर दिया. अस्पतालों में बेड की उपलब्धता की जानकारी देने वाला सरकारी पोर्टल दिखा रहा था कि राज्य में आइसोलेशन बेड और आइसीयू बेड उपलब्ध हैं. पोर्टल पर लखनऊ के एक बड़े अस्पताल में 192 बेड खाली दिखाये जा रहे थे. हाईकोर्ट ने सच्चाई जानने के लिए अपने सामने अस्पताल को फोन लगवाया. उधर से जवाब आया कि अस्पताल में एक भी बेड खाली नहीं है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने भी ऑक्सीजन संकट पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया. हाई कोर्ट ने केंद्र से कहा कि आप शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर डालकर बैठे रह सकते हैं, हम नहीं. हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि दिल्ली को ऑक्सीजन सप्लाई करने के आदेश का पालन न करने पर क्यों न आपके खिलाफ अवमानना का मामला चलाया जाए. बाद में केंद्र सरकार के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा.

मद्रास हाईकोर्ट ने विधानसभा चुनावी रैलियों में कोरोना प्रोटोकॉल टूटने के बाद चुनाव आयोग पर बेहद सख्त टिप्पणियां की थीं और उसे कोरोना का प्रसार करने के लिए जिम्मेदार ठहराया था. मुख्य न्यायाधीश संजीव बनर्जी ने चुनाव आयोग से कहा कि आपकी संस्था कोरोना की दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार है और आयोग के अधिकारियों पर हत्या का केस चलना चाहिए. अदालत ने कहा कि लोगों का स्वास्थ्य सबसे अहम है और यह चिंताजनक है कि संवैधानिक अधिकारियों को ऐसी बातें याद दिलानी पड़ती है.

इस टिप्पणी पर चुनाव आयोग विचलित हो गया. वह इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक गया और कहा था कि इस टिप्पणी के बाद मीडिया हमें हत्यारा कह रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि हाईकोर्ट की प्रतिक्रियाएं तल्ख थीं. अदालत ने कहा कि कभी-कभी हम कठोर हो जाते हैं, क्योंकि हम लोगों की भलाई चाहते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया को रिपोर्टिंग करने से नहीं रोका जा सकता है.

यह बात भी सच है कि आपदा की इस घड़ी में हर राज्य, हर शहर और हर कस्बे में अनेक लोग और संस्थाएं मदद के लिए आगे आयी हैं. सिख संस्थाओं ने तो कमाल कर दिया है. गाजियाबाद के इंदिरापुरम के एक गुरुद्वारे में कोरोना मरीजों के लिए ऑक्सीजन लंगर की व्यवस्था की गयी है. इसके तहत बड़े टेंट में बेड, ऑक्सीजन सिलिंडर और कन्सेंट्रेटर की व्यवस्था है.

गुरुद्वारा कमिटी और खालसा हेल्प की ओर संचालित इस गुरुद्वारे में 70 से अधिक मरीज हर रोज आ रहे हैं. इनमें अधिकतर वे लोग हैं, जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत होती है, लेकिन उन्हें अस्पतालों में जगह नहीं मिलती है. अधिकतर लोग गुरुद्वारे में इंतजार करते हैं, जबकि उनके परिजन बेड की व्यवस्था में जुटे होते हैं. मुंबई में भी सिंह सभा गुरुद्वारा कोरोना काल में मदद का केंद्र बना हुआ है. मुंबई के अनेक गुरुद्वारे कोरोना मरीजों और जरूरतमंदों को खाना, राशन के साथ-साथ ऑक्सीजन भी मुहैया करा रहे है. मुंबई का सिंह सभा गुरुद्वारा टाटा कैंसर अस्पताल में भर्ती मरीजों का भी सहारा बना हुआ है.

हमारे बीबीसी के एक पुराने साथी और उनका परिवार मुंबई में कोरोना से पीड़ित हो गया था. उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा- पंद्रह दिन से मेरा परिवार गुरुद्वारे से आ रहा खाना खा रहा है. सोसायटी के सभी कोविड प्रभावित परिवारों को गुरुद्वारा दोनों वक्त खाना पहुंचाता है. मेरी पत्नी के अस्पताल से घर आने के बाद भी उनकी सेवा रुकी नहीं है. यह है खालिस निःस्वार्थ सेवा. आपदा की इस घड़ी में अन्य धार्मिक संस्थानों-संस्थाओं से भी ऐसी अपेक्षा की जाती है कि सदी के सबसे बड़े संकट में वे भी मानवता की सेवा के लिए आगे आयें.

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