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ट्रंप का रुख तय करेगा भारत से बेहतर रिश्ता, पढ़ें, अनिल त्रिगुणायत का आलेख

Updated at : 23 Oct 2025 8:03 AM (IST)
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India Us Relations

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ पीएम मोदी

Donald Trump : प्रधानमंत्री मोदी ने गाजा शांति समझौते में ट्रंप की भूमिका की प्रशंसा की है, इस कारण भी ट्रंप के रुख में भारत के प्रति थोड़ी नरमी आयी है. अन्यथा वह यह कभी नहीं भूल सकते कि भारत-पाकिस्तान के बीच कथित संघर्षविराम कराने के उनके दावे का भारत ने लगातार खंडन ही किया है.

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Donald Trump : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दीपावली के अवसर पर व्हाइट हाउस में दीये जलाये और भारतीय समुदाय को दीपोत्सव की बधाई दी. इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी को उन्होंने टेलीफोन पर बधाई भी दी. ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को महान बताते हुए उनसे अपनी मित्रता की बात कही और भी बताया कि उनके साथ व्यापार के मुद्दे पर बातचीत हुई है. दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर सहमति बनाने के लिए बातचीत चल रही है. ट्रंप का इशारा उसी तरफ रहा होगा. प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दीपावली की बधाई देने के लिए ट्रंप का आभार जताया और यह उम्मीद व्यक्त की कि दो महान लोकतंत्र आतंकवाद के सभी रूपों के विरुद्ध एकजुट रहेंगे.


इससे पहले मिस्र के शर्म अल शेख में हुए गाजा शांति सम्मेलन की बैठक में भी ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा की थी. तब उन्होंने पाक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सामने ही भारत को एक महान देश कहते हुए मोदी को अपना खास दोस्त बताया था. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ मुश्किल यह है कि अपने रुख से वह कब पलट जायें, इसका कुछ पता नहीं चलता. अपने अहंकार के आगे वह किसी को कुछ नहीं समझते. चूंकि प्रधानमंत्री मोदी ने गाजा शांति समझौते में ट्रंप की भूमिका की प्रशंसा की है, इस कारण भी ट्रंप के रुख में भारत के प्रति थोड़ी नरमी आयी है. अन्यथा वह यह कभी नहीं भूल सकते कि भारत-पाकिस्तान के बीच कथित संघर्षविराम कराने के उनके दावे का भारत ने लगातार खंडन ही किया है. यही नहीं, भारतीय उत्पादों पर टैरिफ का बोझ लाद देने के बाद नयी दिल्ली ने दुनिया के दूसरे देशों के साथ कारोबार बढ़ाने का रास्ता चुना.

ट्रंप अब तक भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा चुके हैं. इनमें से 25 प्रतिशत टैरिफ रेसीप्रोकल- यानी जवाबी टैरिफ है. जबकि शेष 25 प्रतिशत रूस से तेल खरीदने के लिए पेनल्टी है. भारत के साथ अमेरिका के रिश्तों में मुश्किल दरअसल यह है कि ट्रंप बार-बार जिस तरह झूठ या अर्धसत्य का सहारा लेते हैं, वह दोतरफा रिश्तों को बाधित ही ज्यादा करता है. भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने के कथित दावे की तरह ट्रंप कई बार यह झूठा दावा कर चुके हैं कि भारत ने रूस से कच्चा तेल न खरीदने के बारे उन्हें आश्वस्त किया है.

हाल ही में जब ट्रंप ने फिर यह बात कही कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे रूसी तेल न खरीदने का वादा किया है, तो भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने प्रेस बीफिंग में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी. यही नहीं, कच्चे तेल की खरीद की भारतीय नीति के बारे में सफाई देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि ‘भारत तेल और गैस का बड़ा खरीदार है. जनता के हितों की रक्षा करना हमारी प्राथमिकता है और हमारी आयात नीतियां इसी मकसद को पूरा करती हैं.’ ट्रंप के दावे के उलट भारत ने पिछले महीने, यानी सितंबर में कुल तेल आयात का 34 प्रतिशत रूस से मंगाया. यह जरूर है कि तेल आयात में विविधीकरण के तहत देश की सरकारी तेल कंपनियों ने रूस से तेल आयात में थोड़ी कटौती की है, लेकिन निजी रिफाइनरी कंपनियों ने रूसी तेल की खरीद बढ़ा दी है.


यह बात अमेरिका को भी पता है कि रूस से कच्चा तेल खरीद कर भारत तेल की वैश्विक कीमत को स्थिर रखने में मदद ही कर रहा है. इसके बावजूद ट्रंप ऐसी अनर्गल और निराधार बात बोल रहे हैं. जबकि सच्चाई यह है कि हाल के दौर में तेल खरीद में विविधीकरण के तहत भारत 17-18 देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है. इस बीच अमेरिका से भी तेल की खरीद बढ़ी है. लिहाजा तेल खरीद की हमारी नीति पर सवाल उठाने का ट्रंप को कोई अधिकार नहीं है. यह भी स्पष्ट है कि रूस से तेल खरीदना अवैध या गैरकानूनी नहीं है, क्योंकि रूसी तेल पर किसी किस्म का प्रतिबंध नहीं है, हां, उस पर कैप लगा है. यानी उसकी कीमत तुलनात्मक रूप से कम है.


असल में ट्रंप की खिसियाहट का एक बड़ा कारण यह है कि भारतीय उत्पादों पर टैरिफ का बोझ लाद दिये जाने के बावजूद नयी दिल्ली ने उनके सामने समर्पण नहीं किया. हम दूसरे देशों से अपने कारोबारी रिश्ते मजबूत कर रहे हैं. वाणिज्य मंत्रालय ने जो नया आंकड़ा जारी किया है, उसके मुताबिक, अप्रैल से सितंबर तक, यानी मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में हमारा कुल निर्यात पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 18 अरब डॉलर अधिक रहा है. इस दौरान इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक सामान, औषधि, रसायन, रत्न एवं आभूषण तथा चावल के निर्यात में अच्छी वृद्धि देखी गयी, जबकि गैर पेट्रोलियम निर्यात पहली छमाही में 189.49 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है. यानी ट्रंप द्वारा अड़ंगा लगाने के बावजूद भारतीय निर्यात बढ़ रहा है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का ही उदाहरण है.


अनर्गल बातें कहने के बजाय ट्रंप को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. उनका आरोप है कि रूस से सस्ता तेल खरीद कर भारत यूक्रेन युद्ध को हवा दे रहा है और रूस की मदद कर रहा है. हकीकत यह है कि रूस से दोस्ती में ट्रंप खुद पीछे नहीं हैं. विगत अगस्त में ट्रंप ने अलास्का में पुतिन के साथ मुलाकात की थी. पर उस बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला था. ट्रंप और पुतिन फिर हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में मिलने वाले थे. हालांकि ट्रंप ने यह कहते हुए बैठक टाल दी है कि वह पुतिन के साथ ऐसी बैठक नहीं करना चाहते, जो ‘बेकार’ साबित हो. लेकिन व्हाइट हाउस ने साथ ही यह भी कहा है कि दोनों नेताओं के बीच फोन पर ‘अच्छी’ बातचीत हुई और अब मुलाकात जरूरी नहीं है. एक तरफ ट्रंप पुतिन से दोस्ताना रिश्ते रखते हैं, दूसरी तरफ यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को खरी-खोटी सुनाते हैं. इससे तो यही साबित होता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का झुकाव रूस की तरफ है. फिर वह यह आरोप कैसे लगा सकते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध को भारत वित्तपोषित कर रहा है? देखने वाली बात यह भी है कि अमेरिका द्वारा बुडापेस्ट में होने वाली शिखर वार्ता रद्द कर देने के साथ ही रूस की तरफ से यूक्रेन पर हमले तेज हो गये हैं. यह साफ-साफ बताता है कि यूक्रेन युद्ध खत्म करने में ट्रंप कामयाब नहीं हो पा रहे. यह अजीब है कि अपनी विफलता छिपा कर अमेरिकी राष्ट्रपति दूसरों की आलोचना कर रहे हैं. बातचीत और आचरण में उनका जिम्मेदार रवैया ही भारत के साथ अमेरिकी रिश्तों को पटरी पर ला सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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अनिल त्रिगुणायत

लेखक के बारे में

By अनिल त्रिगुणायत

अनिल त्रिगुणायत is a contributor at Prabhat Khabar.

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