लोकतंत्र केवल तब समाप्त नहीं होता, जब चुनाव बंद कर दिये जाएं या सरकारों को उखाड़ फेंका जाए या संविधान को निलंबित कर दिया जाए. लोकतंत्र तब भी पंगु हो सकता है, जब उसे प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए बनाये गये संवैधानिक संस्थान वे कार्य करना बंद कर दें, जिनके लिए उनका गठन हुआ था.लोकतंत्र तब भी कमजोर पड़ता है, जब तर्क का स्थान दावे और वार्ता की जगह टकराव ले ले तथा विचार-विमर्श की जगह बहुमत का अंकगणित हावी हो जाए. स्वस्थ लोकतंत्र संवाद, बहस और विचार-विमर्श पर टिका होता है. निर्णय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, चाहे वह बहुमत से हो या आम सहमति से. मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत स्पष्ट है. विपक्ष को अपनी बात कहने का और सरकार को अपना निर्णय लागू करने का अधिकार होना चाहिए. भारत इस भावना को ही खत्म कर रहा है. हाल ही में संपन्न मानसून सत्र ने इस बीमारी को उजागर कर दिया. दोनों सदनों ने 11 विधेयक पारित किये. इनमें से सात पर लोकसभा में पांच मिनट या उससे भी कम समय तक चर्चा हुई. ग्यारह में से नौ विधेयकों पर संबंधित मंत्री के अलावा किसी अन्य सदस्य ने कुछ नहीं कहा. सत्र के अंतिम दिन ने इस गिरावट को पूरी तरह सामने ला दिया. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सदन में मौजूद थे, जबकि विपक्ष कई सप्ताह से मांग कर रहा था कि वे छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर सवालों का जवाब दें. लोकसभा में नेता विपक्ष और उनके वरिष्ठ सहयोगी भी मौजूद थे. इसके बावजूद सदन उस जमावड़े को बहस में नहीं बदल सका. गृह मंत्री ने पूर्ण बहस की पेशकश की और कहा कि वह सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं, पर विपक्ष ने सरकार की शर्तें खारिज कर अपनी शर्तों पर जोर दिया. बाद में विपक्ष के नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पर लगातार दबाव बनाना ही जवाबदेही सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका है, जबकि सरकार ने विपक्ष पर बहस से भागने का आरोप लगाया. दोनों दावे तत्कालीन राजनीतिक हितों के लिहाज से उपयोगी हो सकते हैं, पर साथ मिलकर उन्होंने यह दिखा दिया कि वह मध्य मार्ग लगभग गायब हो चुका है, जहां कभी बातचीत और समझौते हुआ करते थे. पुरानी पीढ़ी के राजनीतिक रणनीतिकार चुनावी मौसम और संसदीय सत्र के बीच के अंतर को समझते थे. प्रमोद महाजन, कमलनाथ और गुलाम नबी आजाद जैसे नेता सार्वजनिक रूप से कड़ा संघर्ष कर सकते थे, फिर भी बंद कमरे में समझौते कर लेते थे, क्योंकि वे जानते थे कि दूसरे पक्ष पर भी अपनी मजबूरियां और दबाव हैं. उनका काम केवल अपने पक्ष का बचाव करना नहीं था, बल्कि मतभेदों के बावजूद सदन को चलाते रहना भी था.शांतिपूर्ण तरीके से समझाने और सहमति बनाने की यह कला मौजूदा दौर के सभी दलों के नेतृत्व में लगभग गायब है. आज भाषा कहीं अधिक आक्रामक हो गयी है. एक मंत्री की ओर से विपक्ष के नेता को गृह मंत्री का सामना सदन में करने की चुनौती ने मुद्दे को इस सवाल में बदल दिया कि कौन भाग रहा है, जबकि वास्तविक जरूरत यह सोचने की थी कि सदन को सुचारु रूप से कैसे चलाया जाए.विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता. उसका कर्तव्य सवाल उठाना और सरकार को कठघरे में खड़ा करना है. सदन की कार्यवाही बाधित करना इस कर्तव्य का विकल्प नहीं हो सकता. राहुल गांधी के लिए अधिक विश्वसनीय विकल्प यह था कि वह गृह मंत्री को बिना किसी पूर्व शर्त के बोलने देते. फिर तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर उनके जवाबों को खारिज करते. सदन चलाने की समान जिम्मेदारी सरकार की भी है. बहुमत शासन करने का जनादेश है, विपक्ष को उपद्रव मानकर उसके साथ व्यवहार करने का लाइसेंस नहीं. एक मजबूत नेता को अपने विधायी और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाये जाने और उनकी जांच किये जाने के लिए तैयार रहना चाहिए. विपक्ष को सरकार के कार्यक्रम पर वीटो लगाने का अधिकार नहीं है, पर उसे यह सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है कि विधेयकों पर चर्चा हो और संख्या बल के आधार पर उन्हें पारित करने से पहले उनकी पूरी तरह जांच-परख की जाये. दुर्भाग्य से, संख्याबल का इस्तेमाल लंबे समय से विरोधी विचारों को दबाने के हथियार के रूप में किया जाता रहा है. सभी सत्तारूढ़ दलों ने सदन की बैठकों को सीमित करने के लिए बहुमत का हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है. यह गिरावट मौजूदा सरकार के साथ शुरू नहीं हुई, पर जब संसद कम दिनों तक बैठती है, हंगामे में कामकाज के घंटे गंवाती है और कम विधेयक विस्तृत अध्ययन के लिए भेजे जाते हैं, तो कार्यपालिका की शक्ति बढ़ती जाती है.यही स्थिति राज्यों में भी दिखाई देती है, जहां कई विधानसभाएं साल में 50 दिनों से भी कम समय के लिए बैठती हैं. केवल चुनाव लोकतंत्र को स्वस्थ नहीं रखते. विधायिकाओं को उन लोगों से सवाल करने के लिए समय, अधिकार और गंभीरता की जरूरत होती है, जो शासन करते हैं. इसका समाधान सरकार को कमजोर करना या विपक्ष को उसे रोकने देना नहीं है. भारत को लेन-देन और आपसी समझ की राजनीति की ओर लौटने की जरूरत है.सार्थक परिणाम हासिल करने के लिए प्रक्रिया में थोड़ा समझौता करना, दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने देना, ताकि अपनी बात और मजबूत तरीके से रखी जा सके. यही संसदीय राजनीति की व्यावहारिक भाषा है. संसदीय संवाद का यह दिखाई देने वाला क्षरण नागरिक समाज की ओर से कहीं अधिक खतरनाक प्रतिक्रिया को जन्म दे सकता है. जब नागरिक यह निष्कर्ष निकालने लगेंगे कि संसद राजनीतिक संघर्षों का समाधान नहीं कर सकती, तो वे अन्य रास्तों की ओर देखेंगे, सड़कों और संसद से बाहर होने वाले टकरावों की ओर. राजनीतिक वर्ग के पास अब भी इस गिरावट को पलटने का समय है. टकराव के विनाशकारी परिणामों तक पहुंचने से पहले सरकार को बातचीत करनी चाहिए. विपक्ष को सदन को रोके बिना सवाल उठाने चाहिए. भारत को ऐसी संसद की जरूरत नहीं है, जहां कोई टकराव न हो. उसे ऐसी संसद चाहिए, जो मतभेदों को बहस में, बहस को विचार-विमर्श में और विचार-विमर्श को ऐसे फैसलों में बदल सके, जिन्हें आम सहमति से मिली वैधता प्राप्त हो. आजादी के 79 वर्षों के बाद अहंकारपूर्ण टकरावों को संसदीय गतिरोध का असहनीय दर्द पैदा करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)