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भारतीय महिला हॉकी : जज्बे की जीत

देश और हमारे राज्य झारखंड में प्रतिभाओं की कमी नहीं है. आवश्यकता है खेल के क्षेत्र में ऐसा इकोसिस्टम तैयार करने की, जो स्वतः खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करे.

By रवींद्रनाथ महतो
Updated Date
भारतीय महिला हॉकी : जज्बे की जीत
भारतीय महिला हॉकी : जज्बे की जीत
PTI

खेल महाकुंभ तोक्यो ओलिंपिक में सात पदक प्राप्त कर भारत ने अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है. ओलिंपिक में अब तक हासिल कुल 35 पदकों में 10 स्वर्ण पदक हैं, जिनमें आठ स्वर्ण पदक पुरुष हॉकी प्रतियोगिता में मिले हैं. जैवलिन थ्रो में नीरज चोपड़ा के स्वर्ण पदक से 13 साल पहले बीजिंग ओलिंपिक में अभिनव बिंद्रा ने 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग में स्वर्ण पदक हासिल किया था. इस प्रकार यह भारत का मात्र दूसरा व्यक्तिगत स्वर्ण पदक है. ओलिंपिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा मंच है, जिसके माध्यम से दुनिया के देश विश्व पटल पर अपनी पहचान बना पाते हैं.

भारत जैसे विशाल देश के लिए अपने ओलिंपिक इतिहास में मात्र 35 पदक प्राप्त कर पाना खेल में पिछड़े होने का अहसास दिलाता है. विशेषज्ञों की मानें, तो हमारे देश में खेल संस्कृति का अभाव, खेल में पारिवारिक व सामाजिक भागीदारी तथा इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, खेल फेडरेशनों की सियासत, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सरकारी नीतियों में प्राथमिकता का अभाव इसके मुख्य कारण हैं.

मैं बात करना चाहता हूं भारतीय महिला हॉकी टीम की, जो पिछले ओलिंपिक के स्वर्ण पदक विजेता ब्रिटेन से बेहद कड़े मुकाबले में हार कर पदक से चूक गयी. भारतीय महिला टीम केवल तीन बार ओलिंपिक खेलों में शामिल हुई है, पर रानी रामपाल के नेतृत्व वाली इस टीम का अभूतपूर्व प्रदर्शन पूरे भारत की बेटियों की ओर से सपने को जीने जैसा था. इस आयोजन में टीम द्वारा ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी मजबूत टीमों को हराना निश्चय ही अकल्पनीय था.

शुरू में इस टीम के कदम डगमगाये थे, पर दो वर्ष के परिश्रम की बदौलत इसने स्वयं को जमाये रखा और सेमीफाइनल तक पहुंचकर दुनिया को चकित कर दिया. इस सफलता की कहानी 16 बेटियों की कहानी है, जिन्होंने तमाम मुश्किलों को पार कर अपने सपने को साकार किया है और देश की बेटियों के लिए सपने गढ़ने का काम किया है.

कप्तान रानी रामपाल के पिता हरियाणा में घोड़ागाड़ी चलाते थे. उन्हें पहले खेलने में विरोध का सामना करना पड़ा था. लेकिन जिनके जज्बों में ताकत होती है, नियति उनके लिए स्वतः रास्ता बना देती है. वर्ष 2010 में 15 साल की उम्र में वे विश्व कप खेलनेवाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बनीं. साल 2020 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘वर्ल्ड गेम्स एथलीट ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार मिला.

उसी साल ‘बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्स वुमन ऑफ द ईयर’ के लिए भी उन्हें नामांकित किया गया था. भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया है. उप कप्तान 27 वर्षीया दीप ग्रेस एक्का भी ओडिशा के एक गरीब परिवार से हैं और तोक्यो में अपना दूसरा ओलिंपिक खेल रही थीं. वर्ष 2013 में महिला जूनियर हॉकी विश्व कप जीतनेवाली टीम में वे शामिल थीं. टीम की स्टार खिलाड़ी 29 साल की वंदना कटारिया 2013 के जूनियर महिला विश्व कप में भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करनेवाली खिलाड़ी रहीं.

वंदना 2016 एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी में स्वर्ण पदक जीतनेवाली टीम में भी थीं. तीस वर्षीया गोलकीपर सविता हरियाणा से हैं. पिछले 12 सालों में वे भारत के लिए सौ से ज्यादा मैच खेल चुकी हैं. साल 2018 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

इस गौरवशाली टीम में झारखंड की दो बेटियां- निक्की प्रधान और सलीमा टेटे- भी थीं. निक्की 27 वर्ष की हैं और भारत के लिए सौ से ज्यादा मैच खेल चुकी हैं. वे जयपाल सिंह मुंडा के जिले खूंटी से हैं. वे 2016 के रियो ओलिंपिक में भी खेल चुकी हैं. तब वे ओलिंपिक में हिस्सा लेनेवाली झारखंड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी बनी थीं. सलीमा टेटे सिमडेगा से हैं और उनकी उम्र मात्र 19 साल है.

वे 2018 के यूथ ओलिंपिक में रजत पदक जीतनेवाली भारतीय टीम की कप्तान थीं. हमारे राज्य की ऐसी अनेक प्रतिभाशाली महिला खिलाड़ी हैं. बेंगलुरु में चल रहे जूनियर इंडिया कैंप में झारखंड के सिमडेगा जिले की तीन बेटियां- संगीता कुमारी, ब्यूटी डुंगडुंग और सुषमा कुमारी प्रशिक्षण ले रही हैं. ये तीनों एक ही गांव कर्मागुड़ी की हैं. साल 2016 के अंडर-18 एशिया कप में कांस्य पदक विजेता भारत की ओर से किये गये 14 में से आठ गोल संगीता ने किया था.

साल 2002-03 के आसपास झारखंड की कई खिलाड़ी टीम में हुआ करती थीं, जिनमें प्रमुख रूप से सुमराय टेटे, एडलिन केरकेट्टा, कांति बा, मसीरा सुरीन, असुxता लकड़ा आदि थीं. एक बड़े अंतराल के बाद 2015 के बाद पुनः यह सिलसिला शुरू हुआ और झारखंड की निक्की प्रधान, सोनल मिंज, अलका डुंगडुंग, अल्फा केरकेट्टा और अब सलीमा टेटे, संगीता कुमारी, ब्यूटी, सुषमा कुमारी आदि या तो भारतीय टीम से खेल चुकी हैं या खेल रही हैं.

देश में व विशेषकर हमारे राज्य झारखंड में प्रतिभाओं की कमी नहीं है. आवश्यकता है खेल के क्षेत्र में ऐसा इकोसिस्टम तैयार करने की, जो स्वतः खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करे. हॉकी के लिए जिस प्रकार ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार ने कार्य किया है, वह केंद्र और अन्य राज्य सरकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है. खेल की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सरकार के नेतृत्व में एक सुस्पष्ट और सुग्राह्य योजना बनाना तो आवश्यक है ही, लोगों की भागीदारी के साथ-साथ सरकारी और निजी क्षेत्र का समन्वय खेल के क्षेत्र में हमें एक महाशक्ति बना सकता है.

उड़नपरी पीटी उषा कहती हैं कि खेल के क्षेत्र में बेहतर परिणाम के लिए उस परिणाम को पाने की इच्छा करना सबसे पहली आवश्यकता है. सरकार, समाज, परिवार और खिलाड़ियों की समेकित इच्छा से यह इच्छा शक्ति भविष्य में सफलता के दरवाजे खोल देगी. इस कार्य में हमारे राज्य झारखंड की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

महिला हॉकी टीम की बात करते हुए मुख्य कोच शॉर्ड मारिन और एनालिटिक कोच जैनेक सॉपमैन की चर्चा जरूरी है. इन दोनों ने जिस प्रकार इस टीम को विश्व स्तरीय तकनीकें सिखायीं और कोविड महामारी के कठिन दौर में भी प्रयासरत रहे, वह निश्चय ही प्रशंसनीय है. ओलिंपिक पदक से चूक जाने के कारण टीम की कहानी ‘चक दे इंडिया’ की तरह सुखांत वाली तो नहीं है, पर इन बेटियों ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर जिस प्रकार महिला हॉकी को स्थापित किया है, उनके पदचिह्नों पर चलकर निश्चय ही हमारा देश भविष्य में नये कीर्तिमान गढ़ेगा.

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