समाज की दोहरी मानसिकता

Updated at : 12 May 2017 12:57 AM (IST)
विज्ञापन
समाज की दोहरी मानसिकता

समाज चाहे कितना भी आधुनिक होने का दावा करे, बहू और बेटियों को समानता का दर्जा देने में विफल रहा है. समय बदला है, सोच बदली है, लड़कियां पढ़ रहीं हैं, आगे बढ़ रहीं हैं, पर हजारों ऐसी भी हैं, जिनके सपनों का काफिला शादी होने के बाद थम जाता है. उन्हें यह एहसास करवाया […]

विज्ञापन

समाज चाहे कितना भी आधुनिक होने का दावा करे, बहू और बेटियों को समानता का दर्जा देने में विफल रहा है. समय बदला है, सोच बदली है, लड़कियां पढ़ रहीं हैं, आगे बढ़ रहीं हैं, पर हजारों ऐसी भी हैं, जिनके सपनों का काफिला शादी होने के बाद थम जाता है. उन्हें यह एहसास करवाया जाता है कि एक सुघड़ गृहणी होना ही सबसे बड़ी योग्यता है. उनकी योग्यता को कोई तरजीह नहीं दी जाती है.

भारतीय समाज की दोहरी मानसिकता का यह एक कड़वा सच है. जिंदगी भर वह एक आउटसाइडर का तमगा लेकर रहती हैं. समाज में यह सोच क्यों नहीं बदल रही है? जब परिवार में नयी बहू आये, तो उसे बेटी की तरह प्यार दें, उसके पंखों को उड़ान दें. उसे भी खुला आसमान दें.

डॉ शिल्पा जैन सुराणा, वारंगल

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola