कामकाजी वीजा का संकट

Updated at : 20 Apr 2017 6:26 AM (IST)
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कामकाजी वीजा का संकट

आर्थिक महाशक्ति के रूप में नया भारत गढ़ने की चर्चा में एक शब्द ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ पर खास जोर दिया जाता है. संक्षेपाक्षरों के प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी मशहूर थ्री-डी फाॅर्मूले में डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) और डेवलपमेंट (विकास) के साथ यह शब्द शामिल है. भारत की 65 फीसदी आबादी फिलहाल 35 साल से कम उम्र […]

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आर्थिक महाशक्ति के रूप में नया भारत गढ़ने की चर्चा में एक शब्द ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ पर खास जोर दिया जाता है. संक्षेपाक्षरों के प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी मशहूर थ्री-डी फाॅर्मूले में डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) और डेवलपमेंट (विकास) के साथ यह शब्द शामिल है.
भारत की 65 फीसदी आबादी फिलहाल 35 साल से कम उम्र की है. देश में पहली बार ऐसा हुआ है कि काम करने योग्य उम्र के लोगों की संख्या उन पर निर्भर आबादी की तुलना में ज्यादा हुई है और अगले तीस साल तक कमोबेश यही स्थिति बनी रहेगी. भारत वैश्विक बाजार में अपनी आबादी की इस खास स्थिति का फायदा उठा सकता है. लेकिन, 2008 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के बाद वैश्वीकरण के टिकाऊ होने को लेकर जैसे-जैसे आशंकाएं बढ़ी हैं, कुशल मानव-श्रम के अबाधित पारगमन के आशावाद को भी चोट पहुंची है.
भारत और चीन जैसे देशों के सामने एक विचित्र स्थिति आन खड़ी है. उन्हें सेवा, सामान और निवेश के लिए अपने बाजार तो दुनिया के लिए खोल कर रखने हैं, लेकिन उनके कुशल मानव-श्रम के लिए दुनिया के देश एक-न-एक बहाने से अपने दरवाजे बंद करते जा रहे हैं. अमेरिका और सिंगापुर के नक्शे-कदम पर चलते हुए अब आॅस्ट्रेलिया ने बढ़ती बेरोजगारी की समस्या के निदान के बहाने अस्थायी विदेशी कामगारों को दिये जानेवाले वीजा का कार्यक्रम (वीजा 457) खत्म कर दिया है. इसका सबसे अधिक असर भारत पर होगा. आॅस्ट्रेलिया में इस वीजा कार्यक्रम के सहारे तकरीबन 95 हजार विदेशी कामगार नौकरी कर रहे हैं और इनमें सबसे ज्यादा भारतीय हैं.
आॅस्ट्रेलिया विदेशी कामगारों के लिए दूसरा वीजा कार्यक्रम लायेगा, लेकिन उसमें पहले की तरह नरमी नहीं होगी. सिर्फ उन्हीं विदेशी कामगारों को यह वीजा हासिल होगा, जो अति विशिष्ट करार दिये गये काम के लिए हुनरमंद हैं. अमेरिका ने भी हाल के दिनों में एच-1बी वीजा जारी करने के नियम को सख्त बनाते हुए उसमें आइटी पेशेवरों की योग्यता के मानक पहले की तुलना में ज्यादा कड़े कर दिये हैं. अमेरिका का तर्क है कि नौकरी देने के मामले में किसी अमेरिकी नागरिक के साथ राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है.
कमोबेश यही संरक्षणवादी नीति आॅस्ट्रेलिया ने भी अपनायी है. अफसोस कि इन देशों के भारत के साथ अच्छे संबंध होने के बावजूद हमारी सरकार कुछ छूट हासिल नहीं कर सकी. उम्मीद की जानी चाहिए कि रोजगार पर नियंत्रण करनेवाले वैश्वीकरण के इस विरोधाभासी पहलू का राजनयिक हल निकालने के लिए भारत प्रयासरत होगा.
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