खाली पदों का संकट

Updated at : 18 Apr 2017 6:35 AM (IST)
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खाली पदों का संकट

पिछले साल मई महीने में भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा था कि अदालतों में लंबित लाखों मुकदमों के निकट भविष्य में निपटारे की संभावना बहुत कम है, क्योंकि इसके लिए 70 हजार से ज्यादा जजों की जरूरत है तथा बड़ी संख्या में रिक्तियों के बावजूद पर्याप्त संख्या में नियुक्तियां नहीं हो […]

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पिछले साल मई महीने में भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा था कि अदालतों में लंबित लाखों मुकदमों के निकट भविष्य में निपटारे की संभावना बहुत कम है, क्योंकि इसके लिए 70 हजार से ज्यादा जजों की जरूरत है तथा बड़ी संख्या में रिक्तियों के बावजूद पर्याप्त संख्या में नियुक्तियां नहीं हो रही हैं.
देश का पुलिस महकमा भी संख्या-बल के लिहाज से खस्ताहाली का शिकार है. पुलिसकर्मियों के तकरीबन पांच लाख पद खाली होने के तथ्य का संज्ञान लेते हुए अदालत ने इस साल जनवरी में केंद्र सरकार को राज्यों के गृहसचिवों से ताजा आंकड़े मांगने और चार हफ्ते में नियुक्तियों के लिए की गयी पहलों की जानकारी देने का निर्देश दिया था. पर, यह समस्या सिर्फ अदालतों और पुलिस विभागों तक सीमित नहीं है. जरूरी नागरिक सेवाएं, सुरक्षा और निगरानी से संबंधित तमाम महत्वपूर्ण विभागों- शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, वित्त और सैन्य सेवा- में कर्मचारियों की भारी कमी है. प्रमुख जांच एजेंसियों में कर्मचारियों की कमी का स्तर 22 से 36 फीसदी तक पहुंच चुका है. आइआइटी, आइआइएम और एनआइटी जैसे अग्रणी शिक्षा संस्थानों में तकरीबन छह हजार पद खाली हैं और देश भर में प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर फिलहाल शिक्षकों के 10 लाख पदों पर भरती करने की तत्काल जरूरत है.
यह दुर्दशा चिकित्सा के क्षेत्र में भी नजर आती है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में फिलहाल प्रति हजार आबादी पर 0.7 डाॅक्टर उपलब्ध हैं, जो पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात से भी कम है. सेना के तीनों अंगों में तकरीबन 55 हजार पदों खाली पड़े हैं और आयुध कारखानों में अलग-अलग किस्म के 40 फीसदी से अधिक पदों पर नयी भरती का इंतजार है. विधि-व्यवस्था की बहाली, त्वरित न्याय और रोजमर्रा के नागरिक सेवाओं की आपूर्ति अगर सुशासन की निशानी है, तो फिर ये तथ्य संकेत करते हैं कि पंचायत से लेकर केंद्रीय स्तर तक सरकारें अपनी जवाबदेही से कन्नी काट रही हैं. रोजगार का सृजन और मानव संसाधन के विकास के कार्यक्रमों को पूरा कर ही अर्थव्यवस्था में टिकाऊ वृद्धि दर कायम रखा जा सकता है.
नागरिकों को बेहतर सेवाएं और सुविधाएं मुहैया कराना सरकार की जिम्मेवारी भी है तथा विकास और समृद्धि में समुचित हिस्सेदारी लोगों का अधिकार भी है. शासन-प्रशासन के मोरचे पर ऐसी बुनियादी कमियों को दूर करने की फौरी कोशिश की जानी चाहिए तथा महत्वपूर्ण महकमों में खाली पड़े पदों पर भरती का सिलसिला तुरंत शुरू किया जाना चाहिए.
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