नरमुंडों वाले किसानों के देश में

Updated at : 14 Apr 2017 5:40 AM (IST)
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नरमुंडों वाले किसानों के देश में

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया पांच दशक पहले 1967 में उठे किसानों के नक्सलबाड़ी आंदोलन ने पूरे देश को अपने वैचारिक चपेट में ले लिया था. आजादी से मोहभंग की यह सबसे तीखी प्रतिक्रिया थी. आजादी के बाद सामंती व्यवस्था न केवल मौजूद थी, बल्कि सशक्त रूप में जमींदारों द्वारा […]

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डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
पांच दशक पहले 1967 में उठे किसानों के नक्सलबाड़ी आंदोलन ने पूरे देश को अपने वैचारिक चपेट में ले लिया था. आजादी से मोहभंग की यह सबसे तीखी प्रतिक्रिया थी. आजादी के बाद सामंती व्यवस्था न केवल मौजूद थी, बल्कि सशक्त रूप में जमींदारों द्वारा उत्पीड़न भी मौजूद था. यह आंदोलन बेहतर कृषि व्यवस्था और कृषक संस्कृति के निर्माण की परिकल्पना के साथ दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों और किसानों द्वारा स्वत: स्फूर्त प्रकट हुआ था.
लेकिन, इतने अरसे बाद भी किसानों की दशा में बुनियादी बदलाव होने के बजाय उनकी बेदखली और आत्महत्या की घटनाएं ही लगातार बढ़ी हैं.
साल 2016 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, देश में किसान आत्महत्या की दर 42 फीसदी बढ़ी है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना में यह सबसे ज्यादा है. पिछले दिनों मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में नवंबर 2016 से फरवरी 2017 के बीच तीन महीने में 106 किसानों और 181 कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की है. यानी किसानों की परिस्थितियां जटिलतर होती जा रही हैं.
भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन यह कड़वा सच है कि भारत की व्यवस्था कृषि केंद्रित व्यवस्था नहीं है. भारतीय सत्ता के केंद्र में न किसान हैं और न ही कृषि कार्य से जुड़े उद्योग.
किसान आत्महत्याओं का संबंध राज्य सत्ता की इस व्यवस्था से अनिवार्य रूप से जुड़ा है. एक ओर तो किसान अब भी कृषि कार्य की बुनियादी जरूरतों सिंचाई, बीज, उर्वरक और नयी तकनीकों से वंचित हैं, वही दूसरी ओर किसानों के उत्पादन और बाजार के बीच तर्कसम्मत सामंजस्य नहीं है. इसके साथ ही कृषि क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वर्चस्व ने किसानों की आत्मनिर्भरता और परंपरागत कृषि की ताकत को हड़प लिया है. परिणामस्वरूप बीज से लेकर उर्वरक तक के लिए किसानों को इन्हीं महाजनों के यहां चक्कर काटना पड़ता है.
सहकारी बैंक और अन्य राष्ट्रीय बैंक कुछ ऋण की व्यवस्था जरूर करते हैं, लेकिन वह न केवल अपर्याप्त है, बल्कि उसकी प्रक्रिया भी बहुत जटिल है. खास तौर पर वहां का भ्रष्टाचार भी किसानों का मनोबल तोड़ता है. ऐसे में किसान स्थानीय महाजनों या निजी फाइनेंस कंपनियों के चंगुल में फंस जाते हैं. कभी-कभी सरकार कर्ज माफी की घोषणा करती है, लेकिन उससे किसान अंशत: ही प्रभावित होते हैं.
सवाल यह है कि क्या कर्ज माफी ही किसानों की आत्महत्या का स्थायी समाधान है या पूंजी केंद्रित व्यवस्था के विकल्प के रूप में मजबूत कृषि केंद्रित व्यवस्था का होना? निस्संदेह कर्ज माफी किसानों को तत्काल राहत देती है, लेकिन केवल इसी के भरोसे नहीं रहा जा सकता है.
जब तक ठोस कृषि व्यवस्था नहीं बन जाती, तब तक कर्ज माफी के बाद भी किसान पुन: कर्ज की अंधेरी गलियों में भटकने के लिए विवश होंगे ही. ग्लोबल वार्मिंग की वजह से मौसम परिवर्तन का भी यह असर है कि परंपरागत जल स्रोत अब खत्म हो चुके हैं. इसके साथ ही भूगर्भ जल का स्तर भी अपनी मानक सीमा से नीचे जा रहा है. ऐसे में किसानों के लिए पानी की स्थायी व्यवस्था क्या होगी? सरकारों के पास इसके लिए क्या योजना है? अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल, गैस, लोहा, बॉक्साइट और हथियारों की होड़ का देशी प्रभाव किसानों में साफ दिखता है. इसी का परिणाम है कि आज हमारे देश में कृषि और कृषि से जुड़े उद्योग ध्वस्त हो चुके हैं.
पिछले एक महीने से तमिलनाडु के किसान नरमुंडों के साथ देश की राजधानी में प्रदर्शन कर रहे हैं.उन किसानों ने देश के प्रधानमंत्री से मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया. मजबूरन उन्हें नग्न होकर प्रदर्शन करना पड़ रहा है. मद्रास हाइकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को कर्ज माफी का आदेश दिया है, लेकिन वह अपर्याप्त है, क्योंकि उसमें सिर्फ सहकारी बैंक के कर्ज की बात की गयी है. किसानों की मांग है कि यह राशि बढ़ायी जाये और उनके लिए स्थायी पानी की व्यवस्था हो. आज देश का सबसे बड़ा बुनियादी उत्पादक समुदाय आत्महत्या कर रहा है और नागरिक समाज के बीच भयंकर चुप्पी है.
मीडिया तो राज्य सत्ता के निर्देश में देश को ‘सैन्य’ केंद्रित बना कर छद्म देशभक्ति का बहस चला रहा है. सबसे बड़ी बिडंबना तो यह है कि इतना बड़ा किसान समुदाय आज कोई निर्णायक आंदोलन नहीं खड़ा कर पा रहा है. और जो नक्सलबाड़ी की स्मृतियों के साथ किसान संस्कृति के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं, वे देशद्रोही और आतंकी घोषित हो चुके हैं. किसानों के बीच से जो भी प्रतिरोधात्मक शक्तियां हैं, उन्हें अपराधी बना दिया गया है और जो किसान व्यवस्था को स्वीकार कर आत्महत्या करने के लिए विवश हैं, उनके लिए कोई शोकगीत भी नहीं है. निश्चित रूप से देश के किसानों के लिए यह सबसे जटिल समय है.
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