लाभ-हानि के पलड़े पर यूबीआइ

Updated at : 12 Apr 2017 6:03 AM (IST)
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लाभ-हानि के पलड़े पर यूबीआइ

रीतिका खेड़ा आइआइटी, दिल्ली साल 2016-2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के ठीक पहले वित्त मंत्रालय से छन कर आनेवाली खबरों में यूबीआइ के बारे में खूब चर्चा थी. यूबीआइ के दो मुख्य सिद्धांतों में एक तो इसकी सार्वभौमिकता है, ताकि सभी नागरिक इसके अंतर्गत आ सकें. और दूसरा, एक ‘बुनियादी आय’ है, जिसके बल पर किसी […]

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रीतिका खेड़ा
आइआइटी, दिल्ली
साल 2016-2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के ठीक पहले वित्त मंत्रालय से छन कर आनेवाली खबरों में यूबीआइ के बारे में खूब चर्चा थी. यूबीआइ के दो मुख्य सिद्धांतों में एक तो इसकी सार्वभौमिकता है, ताकि सभी नागरिक इसके अंतर्गत आ सकें. और दूसरा, एक ‘बुनियादी आय’ है, जिसके बल पर किसी अन्य उपार्जन के बगैर भी एक गरिमापूर्ण जीवन जीया जा सके. पर, इस दिशा में अब तक जिन विचारों पर चर्चाएं चल रही हैं, उनसे यूबीआइ का एक विद्रूप स्वरूप ही उभरता है.
आर्थिक सर्वेक्षण लाभुकों को लक्ष्य कर हस्तांतरित किये जानेवाले लाभों के मामले में भारत के निराशाजनक रिकॉर्ड को इंगित करते हुए यूबीआइ में ‘सार्वभौमिकता’ की शक्ति को उभारता है. पर, सर्वेक्षण का अंत अपर्याप्त तथा लक्षित नकद हस्तांतरण पर चर्चा से होता है. यूबीआइ पर आधारित पूर्व आलेखों ने यह धारणा बनायी कि अनुपयुक्त एवं अवांछनीय सब्सिडी पर जीडीपी का 10 प्रतिशत तक व्यय होता है, पर यह आंकड़ा लगभग दो दशक पुराना है. नये आकलन के अनुसार, 2011-12 में यह पांच प्रतिशत था और अब तो संभवतः और नीचे आ चुका होगा.
सरकार द्वारा किये जानेवाले सामाजिक व्ययों, खासकर मनरेगा, जन वितरण प्रणाली (पीडीएस), मध्याह्न भोजन योजना पर किये गये शोधों से गरीबी पर उनके असर के संबंध में मिले उत्साहजनक नतीजों से स्पष्ट है कि यूबीआइ के समर्थन में उपर्युक्त कार्यक्रमों के विघटन के लिए उतना ही जोरदार औचित्य भी होना चाहिए.
इन कार्यक्रमों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रस्तुत कई सकारात्मक साक्ष्यों की सुविधाजनक ढंग से अनदेखी की गयी. ऐसा नहीं कि ये कार्यक्रम अपने आप में पूर्ण हैं, पर इससे यह तो साफ होता ही है कि इस सर्वेक्षण में केवल अपने अनुकूल तथ्यों के चयन की प्रवृत्ति है.
इस सर्वेक्षण से परे, मगर मुद्दे से संबद्ध एक घटना का जिक्र जरूरी है. 2015 में चंडीगढ़, दादरा एवं नगर हवेली तथा पुदुचेरी में सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के अंतर्गत अन्न की जगह प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) अथवा नकद अंतरण की शुरुआत की.
सरकार ने इस योजना का समवर्ती मूल्यांकन भी कराया, जिससे यह पता चला कि चरण-2 (मध्य-2016) में लाभुकों के पांचवें हिस्से को कोई नकदी नहीं मिली. पुदुचेरी में चरण-1 एवं चरण-2 के बीच स्थिति बदतर हो गयी. चरण-1 में केवल 25 प्रतिशत लाभुकों को नकद अंतरण प्राप्त हो सका, जबकि चरण-2 में यह थोड़ा बेहतर होकर 37 प्रतिशत पर पहुंचा. नतीजतन, इस रिपोर्ट ने पाया कि इस मूल्यांकन के उत्तरदाताओं के बहुलांश ने नकदी की बजाय खाद्य पाने को ही तरजीह दी. डीबीटी-पीडीएस का ये मूल्यांकन अहम हैं, क्योंकि यूबीआइ पर बहस से इनका सीधा संबंध है. साक्ष्य बताते हैं कि नकद अंतरण को वैसी शानदार सफलता नहीं मिल सकी है, जैसी सरकार सुनना चाहती है. तो क्या इसी वजह से ये नतीजे सरकार द्वारा छिपाये गये?
‘आधार’ के संबंध में भी सरकार ने असुविधाजनक तथ्यों की उपेक्षा की है.आधार के प्रवर्तकों ने आरंभ से ही निगरानी एवं डाटा माइनिंग के अपने बुनियादी ढांचे को एक निर्दोष सामाजिक कल्याण परियोजना के रूप में पेश किया. केंद्र में एक के बाद आनेवाली दूसरी सरकारों ने आधार का यह कल्याणकारी स्वरूप उभारने के लिए दो रणनीतियों का सहारा लिया. पहला, नकारात्मक नतीजों की अनदेखी या उनसे इनकार करना. जब भी पेंशन, मनरेगा, पीडीएस, छात्रवृत्ति जैसी कल्याण योजनाओं में आधार का इस्तेमाल हुआ, तो इससे लाभुकों के लाभ से छूट जाने जैसी समस्याएं सामने आयीं. भ्रष्टाचार की शिकायतें भी आयीं.
फिर भी वैसे कार्यक्रमों की सूची बढ़ रही है, जिनके लिए आधार जरूरी है. ऐसा करके सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करती जा रही है. सरकार की दूसरी रणनीति लाभ गढ़ने या उन्हें बढ़ा कर दिखाने की है. खाना बनानेवाली गैस में डीबीटी से संबद्ध सफलता के लिए सरकार द्वारा बचत राशि को ज्यादा बड़ी दिखाने के पीछे भी यही मंशा थी.
अंततः, लगता है कि यूबीआइ को लेकर पैदा किया गया सारा उत्साह वास्तव में सामाजिक लाभों में की गयी मामूली वृद्धि से ध्यान हटाने का एक हथकंडाभर था. 2013 से ही सरकार मातृत्व लाभ के अंतर्गत 6,000 रुपये प्रति शिशु की अपनी देनदारी से बचती आ रही है.
सामाजिक सुरक्षा पेंशनों में भी इसने अपना अंशदान वर्ष 2006 से ही बेशर्मीपूर्वक 200-300 रुपये प्रतिमाह के स्तर पर रोक रखा है. सरकार यदि संजीदा होती, तो वह इसे 1,000 रुपये प्रतिमाह करते हुए आसानी से इसका सार्वभौमीकरण कर सकती थी. साक्ष्य बताते हैं कि ये दोनों कार्यक्रम अच्छे नतीजे दे रहे हैं, जो शायद सरकार के लिए असुविधाजनक है.(अनुवाद: विजय नंदन)
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