हम, पत्नी और फूलमती

Updated at : 12 Apr 2017 6:02 AM (IST)
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हम, पत्नी और फूलमती

वीर विनोद छाबड़ा व्यंग्यकार हम जब भी गुड़हल के पेड़ को देखते हैं, तो तीस साल पीछे डाउन मेमोरी लेन में चले जाते हैं- हम शहर से बाहर एक नये मकान में शिफ्ट हुए हैं. पत्नी मायके से लाकर लॉन में एक गुड़हल का पौधा रोपती हैं. कुछ महीनों बाद वह पौधा पेड़ हो गया. […]

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वीर विनोद छाबड़ा
व्यंग्यकार
हम जब भी गुड़हल के पेड़ को देखते हैं, तो तीस साल पीछे डाउन मेमोरी लेन में चले जाते हैं- हम शहर से बाहर एक नये मकान में शिफ्ट हुए हैं. पत्नी मायके से लाकर लॉन में एक गुड़हल का पौधा रोपती हैं. कुछ महीनों बाद वह पौधा पेड़ हो गया. उसमें लाल फूल निकले. सुबह-सुबह पूजा के लिए फूल की डिमांड बहुत है. चूंकि पेड़ चारदीवारी के काफी अंदर है, इसलिए हम सुबह गेट जल्दी खोल देते हैं. हम भी वहीं कुर्सी डाल बैठ जाते हैं और चाय के साथ अखबार पढ़ते हैं.
उस दिन सुबह-सुबह गेट पर आहट हुई. एक भद्र महिला खड़ी हैं. उसने विनम्र नमस्कार किया- दो-चार फूल चाहिए. हमने गेट खोल दिया. फूल तोड़ते-तोड़ते खुद ही बताने लगीं- कुछ दिन पहले पिछली गली में किराये पर घर लिया है. फूल थोड़ी ऊंचाई पर थे. हम अंदर से स्टूल उठा लाये और चढ़ गये. थोड़ा डर लगा. जाने कैसे वो हमारे दिल के भाव की मैपिंग कर गयीं. उसने स्टूल कस कर पकड़ लिया.
फूल हाथ में आ गया. हमारा सीना गर्व से फूल उठा. वो भी बड़ी खुश हुईं. बच्चों की तरह ताली बजाने लगीं. हमें उनकी इस अदा पर हंसी आ गयी. हमने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया. वो बिना हिचक बैठ गयीं. हमने इसे हां समझ कर पत्नी को आवाज दी. उन्होंने सिर से पांव तक उस भद्र महिला का एक परीक्षण किया. हमने उनका परिचय देना चाहा, परंतु पत्नी ने मौका ही नहीं दिया- मैं जानती हूं. फूलमती हैं.उस भद्र महिला ने खुद से दोबारा बोलना शुरू किया- मेरे पति बिजली के सामान की ठेकेदारी करते हैं.
बड़ी-बड़ी सरकारी बिल्डिंगों का इलेक्ट्रिफिकेशन. इतने में पत्नी चाय ले आयीं. चाय रिकॉर्ड टाइम में बनी है. मतलब यह कि जल्दी से चाय पीकर दफा हो.
अच्छा हुआ कि पत्नी भी साथ में चाय पीने बैठ गयीं और इस बीच हमें उठ कर भागने का मौका मिल गया. दस मिनट बाद फूलमती जा चुकी हैं. पत्नी के चेहरे पर तनाव की लकीरें हैं. हमने खामोश रहना बेहतर समझा. चुपचाप नाश्ता निगला और दफ्तर गये. सारा दिन बड़ी टेंशन में कटा. आखिर हमारी गलती क्या है? उसकी गलती भी नहीं है. बेचारी फूल ही तो तोड़ने आयी थी. शाम हम दबे पांव घर पहुंचे. पैरों तले से जमीन खिसक गयी. गुड़हल का पेड़ वहां नहीं था.
इससे पहले कि हम कुछ पूछते, पत्नी ने बताया कि कटवा दिया. दीमक बहुत आ गये थे. हमें हंसी आ गयी, पर दुख हुआ कि बेचारा गुड़हल बलि चढ़ गया.
अगले दिन हमें सुबह-सुबह फूलमती दिखीं. हमें देख कर व्यंग्य से मुस्कुरायीं. उसके बाद हमें फूलमती कभी नहीं दिखीं. चली गयी होंगी किसी और मोहल्ले में. एक और गुड़हल की बलि चढ़वाने!
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