यादें बहुत याद आती हैं

Updated at : 11 Apr 2017 6:01 AM (IST)
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यादें बहुत याद आती हैं

मुकुल श्रीवास्तव स्वतंत्र टिप्पणीकार यादें भी कैसी-कैसी याद आ जाती हैं. आजकल विकास की चर्चा खूब हो रही है. बात ज्यादा पुरानी भी नहीं है. जब मेरे घर में हैंडपंप लगा था और उसी से पूरे घर का काम चल जाता था. फिर एक दिन पानी का कनेक्शन ले लिया गया, तो लगा कि जिंदगी […]

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मुकुल श्रीवास्तव

स्वतंत्र टिप्पणीकार

यादें भी कैसी-कैसी याद आ जाती हैं. आजकल विकास की चर्चा खूब हो रही है. बात ज्यादा पुरानी भी नहीं है. जब मेरे घर में हैंडपंप लगा था और उसी से पूरे घर का काम चल जाता था. फिर एक दिन पानी का कनेक्शन ले लिया गया, तो लगा कि जिंदगी खूबसूरत हो गयी और अब रोज हैंडपंप से पानी निकालने की ड्यूटी का झंझट खत्म हो गया.

हालांकि एक छोटे से टब में थोड़ा पानी जरूर इकट्ठा रखा जाता था. वैसे भी नल में चौबीस घंटे पानी आता था, फिर पानी आने का समय निर्धारित हो गया, तो टंकी खरीदी गयी. इसके पहले कुछ दिनों तक ड्रम से काम चला, पर विकास के इस मॉडल में ड्रम बिलो स्टैंडर्ड था, तो टीवी पर विज्ञापन देख कर सिंटैक्स की टंकी खरीदी गयी.

उधर पानी लगातार कम होता जा रहा था, तो फिर विकास की राह पर चलते हुए एक मोटरपंप भी खरीदा गया, जिससे कि जितनी देर पानी आता है, उतनी देर में ज्यादा से ज्यादा पानी इकट्ठा कर लिया जाये.

भले ही वे लोग परेशान हों, जो मोटरपंप न खरीद सकते हों. अब घर का खाना उतना मजेदार नहीं होता था. कहीं किसी भी नल में चुल्लू लगा कर पानी पी लेना असभ्यता की निशानी माना जाने लगा. हम भी बड़े होकर कमाने लग गये थे और होटल में जब वेटर बिसलरी की बोतल रख जाता, तो मारे शर्म के यह नहीं कह पाते कि सामान्य पानी लाओ, ताकि पता तो लगे कि हम जिस शहर में बैठे हैं, उसके पानी का स्वाद कैसा है. पर, विकास की अंधी दौड़ में पानी भी ग्लोबलाइज्ड हो रहा था.

उस दौरान नल से पानी ज्यादा देर तक आता नहीं और बोतलबंद पानी का बाजार दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ रहा था. हम भी विकसित होने की चाह और पानी की गुणवत्ता खराब होने के कारण इस विकास की दौड़ में शामिल हो गये. नतीजा यह हुआ कि एक-एक वाटर प्यूरीफायर हमारे किचन की शोभा बढ़ाने लग गये.

जमाना काफी तेजी से बदल रहा था. पीलिया और हैजा जैसी बीमारियां बढ़ने लग गयीं और टीवी लगातार डरा रहा था कि सिर्फ प्यूरीफायर से काम नहीं चलेगा, अब आरओ लगाइये. जो मिनरल पानी में होने चाहिए, वो तो हमने विकास की दौड़ में गंवा कर पानी को प्रदूषित कर दिया है.

ऐसे में मजबूरी में हमें चौदह हजार का एक आरओ लगवाना पड़ा. आरओ पानी साफ करके हमको देता है और जितनी देर आरओ पानी साफ करता है, उसकी पाइप से साफ पानी जैसा कुछ लगातार नाली में बहता रहता है. आरओ से निकला पानी बिलकुल किसी डिब्बेबंद पानी जैसा लगता है और अमीर होने का फील आता है. जैसे हम घर में बिसलेरी पी रहे हों. वाकई हम बहुत तेजी से विकसित हो रहे हैं. यादें बहुत याद आती हैं.

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