भारतीय कविता की द्विवार्षिकी

Updated at : 10 Apr 2017 6:18 AM (IST)
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भारतीय कविता की द्विवार्षिकी

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार बर्टोल्ट ब्रेष्ट (10 फरवरी, 1898-14 अगस्त, 1956) एक कविता है- ‘क्या अंधेरे दौर में/गाया भी जायेगा?/ हां अंधेरे दौर को भी/गाया जायेगा.’ आज अंधकार कहीं अधिक सघन है और कविता सदैव रोशनी फैलाती है. अंधकार के खिलाफ कविता हमेशा तन कर खड़ी रही है. हमारा समय हिंसा, धर्मांधता, कट्टरता, निरंकुशता और एक […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

बर्टोल्ट ब्रेष्ट (10 फरवरी, 1898-14 अगस्त, 1956) एक कविता है- ‘क्या अंधेरे दौर में/गाया भी जायेगा?/ हां अंधेरे दौर को भी/गाया जायेगा.’ आज अंधकार कहीं अधिक सघन है और कविता सदैव रोशनी फैलाती है. अंधकार के खिलाफ कविता हमेशा तन कर खड़ी रही है. हमारा समय हिंसा, धर्मांधता, कट्टरता, निरंकुशता और एक प्रकार की तानाशाही का समय है. यह समय सर्वाधिक हिंसक और उग्र है. सृजन विरोधी, जीवन विरोधी, स्मृति रहित और स्वप्नविहीन समय में कविता आततायी, निरकुंश और हिंसक ताकतों को चुनौती देती है. राज्य सत्ता को शब्द सत्ता द्वारा दी गयी चुनौती कहीं अधिक शक्तिशाली है. कवि अपनी कविता के साथ या तो जीवित रहता है, या मृत हो जाता है. घिनाैने और बदबूदार समय में कविता प्रेम, करुणा और क्रोध भाव के साथ ही सार्थक बनी रह सकती है.

इसलिए किसी भी भारतीय कवि की भूमिका आज कहीं अधिक है.

भारतीय कविता की रजा द्विवार्षिक (वाक) (7 से 9 अप्रैल, 2017) पर कवियों और काव्य प्रेमियों का ध्यान जाना स्वाभाविक है. सैयद हैदर रजा (22 फरवरी, 1922-23 जुलाई, 2016), प्रगतिशील कलाकार ग्रुप (पीएजी) के छह संस्थापक सदस्यों में से एक थे. कविता से इस ग्रुप के सदस्यों का गहरा नाता था. रजा मिश्रित भारतीय संस्कृति के पक्षधर रहे. उनके बिंदु में सब कुछ समाहित है. उनके लगभग सौ चित्रों में एक काव्य पंक्ति है. अपनी डायरी (ढाई आखर) में रजा समय-समय पर हिंदी, अंगरेजी, संस्कृत, फ्रेंच आदि भाषाओं की काव्य पंक्तियां दर्ज करते रहे थे.

रजा फाउंडेशन की स्थापना 2001 में हुई, जिसके मैनेजिंग ट्रस्टी अशाेक वाजपेयी हैं. उनकी सृजनात्मक क्षमता से सब अवगत हैं. वे कला, साहित्य, संस्कृति की एक बड़ी हस्ती हैं. रजा फाउंडेशन की ओर से वे दो वर्ष बाद 2019 में एशियाई कविता और 2021 (रजा जन्मशती वर्ष) में विश्व कविता समारोह की घोषणा कर चुके हैं.

संभवत: पहली बार 15 भारतीय भाषाओं (हिंदी, उर्दू, ओड़िया, असमी, तमिल, मणिपुरी, कश्मीरी, बांग्ला, गुजराती, मलयालम, कन्नड़, पंजाबी, तेलुगु, मराठी और अंगरेजी) के 44 कवि (कार्ड में 44, प्रकाशित पुस्तक में 43) तीन दिनों तक ग्यारह सत्र में उपिस्थित रहे और अपनी कविताओं का पाठ किया. 15 मिनट का यह कविता पाठ अपनी भाषा के साथ अंगरेजी और हिंदी अनुवाद में भी हुआ. जहां तक इन भाषाओं के कवियों के चयन का प्रश्न है, यह अशोक वाजपेयी की अपनी काव्य दृष्टि से जुड़ा है. यहां एक साथ अनेक काव्य स्वर मौजूद हैं. अपनी-अपनी भाषा के इन कवियों की महत्वपूर्ण उपस्थिति और पहचान है. इस आयोजन की एक खूबी पैनल संवाद की है. विचार-विमर्श सत्र के ग्यारह व्यक्तियों ने तीन सत्रों में क्रमश: कविता को स्मृति, स्वतंत्रता और अंत: करण से जाेड़ कर देखा, क्योंकि हमारा स्मृति लोप हो रहा है. स्वतंत्रता बाधित हो रही है और मुक्तिबोध ने बहुत पहले अंत:करण के आयतन के संक्षिप्त होने की बात कही थी.

हिंदी के मंगलेश डबराल, सविता सिंह, उदयन वाजपेयी और सुधांशु फिरदौस, उर्दू के तसनीफ हैदर, ओवैद सिद्दीकी, शमीम हनफी, इमदाद शकी, अभिषेक शुक्ल, ओड़िया के हर प्रसाद दास, मोनालिसा जेना, शक्ति मोहंती, असमी के नीलीम कुमार, प्रतीम बरुआ, मृदुल हलोइ, तमिल के सलमा, कुट्टी रेवाथी, मनुसया पृथ्वीरम, मणिपुरी के रतन थियम, शरतचंद्र थियम, दिलीप मयेंगबम, कश्मीरी के सईदा नरेन नक्श, मजरूह रशीद (प्रकाशित पुस्तक में सईदा नरेन नक्श नहीं हैं), बांग्ला के सुबोध सरकार, गौतमी सेन गुप्ता, कौशिकी दास गुप्ता, गुजराती के शीतांशु यशश्चंद्र, कांजी पटेल, मलयालम के के सच्चिदानंदन, पीपी रामचंद्रन, अथिथा थम्पी, कन्नड़ के तारिजी शुभदायिनी टी आर, आरिफ रजा, शिव प्रकाश, एचएस, पंजाबी के मदनवीरा, सुरजी पाता, खुसविंदर अमरित, तेलुगु के गाेरती वेनकन्न, मराठी के प्रफुल्ल शिलदार, विनोद कुमार, अंगरेजी के शर्मिली रे, लुबना इरफान, अरुंधती सुब्रमण्यम, आनंद ठाकोरे थे. यह नाम सूची देना आवश्यक है. परिचर्चा सत्र में कविता को स्मृति से जोड़ करके के दारुवाला, शीतांशु यशश्चंद्र, शिव विश्वनाथन, स्वतंत्रता के साथ कवि के रिश्ते पर अनन्या वाजपेयी, कृष्ण कुमार, अपूर्वानंद, के सच्चिदानंदन और अंत:करण और कविता पर उदयन वाजपेयी, आशीष नंदी, रामिन जहांबेंग्लू और शमीम हनफी ने जो विचार रखे हैं, उन पर काव्य प्रेमी बाद में विचार करेंगे.

कविता को आज के दौर में अशोक वाजपेयी ने सक्रिय प्रतिरोध का एक रूप (पोएट्री इन डार्क टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, 6 अप्रैल, 2017) कहा है. इस आयोजन में प्रतिरोध के कितने और कैसे स्वर, रूप सुनायी पड़े, इस पर हमें ध्यान देना होगा. भाषा की रक्षा का दायित्व भी कवियों पर ही है. कल रविवार को यह आयोजन समाप्त हुआ. अशोक वाजपेयी कविता के उत्सव पर, उसके रसास्वादन पर बल देते हैं. सक्रिय प्रतिरोध की कविता का क्या सचमुच इससे कोई संबंध है?

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