महागंठबंधन की राह के कांटे

Updated at : 06 Apr 2017 5:53 AM (IST)
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महागंठबंधन की राह के कांटे

सुरेंद्र किशोर वरिष्ठ पत्रकार बिहार जैसा महागंठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बनाने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सलाह मौजूं है. उत्तर प्रदेश की चुनावी हार के बाद प्रतिपक्ष पस्तहिम्मत है. इस पृष्ठभूमि में यदि महागंठबंधन बनाने का गंभीर प्रयास भी शुरू हो जाये, तो उससे गैर-राजग दलों में एक नयी ऊर्जा का संचार हो सकता है. […]

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सुरेंद्र किशोर

वरिष्ठ पत्रकार

बिहार जैसा महागंठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बनाने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सलाह मौजूं है. उत्तर प्रदेश की चुनावी हार के बाद प्रतिपक्ष पस्तहिम्मत है. इस पृष्ठभूमि में यदि महागंठबंधन बनाने का गंभीर प्रयास भी शुरू हो जाये, तो उससे गैर-राजग दलों में एक नयी ऊर्जा का संचार हो सकता है. वैसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है कि छितराये प्रतिपक्षी दल अधिक दिनों तक पस्तहिम्मत बने रहें, क्योंकि इससे सत्ताधारी जमात द्वारा मनमानी किये जाने का खतरा बढ़ जाता है. नीतीश कुमार की यह सलाह भी सही है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट महागंठबंधन बनाने की दिशा में पहल करें.मणि शंकर अय्यर तथा कुछ अन्य नेताओं ने भी ऐसी ही सलाह दी है.

लेकिन, नीतीश कुमार की सलाह का महत्व इसलिए है, क्योंकि उनके नेतृत्व वाली महागंठबंधन सरकार कुछ कठिनाइयों और शिकायतों के बावजूद आराम से चल रही है. इस चर्चा के बीच कि नीतीश राजग मंे जा सकते हैं, बिहार के मुख्यमंत्री की ताजा सलाह प्रतिपक्ष का हौसला बढ़ानेवाली है. सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा महागंठबंधन बनाना आज की स्थिति में संभव भी है? अभी तो असंभव जरूर लगता है, पर यदि इसके लिए गंभीर और ईमानदार प्रयास अभी से शुरू हो जायें, तो आनेवाले दिनों में शायद एक हद तक यह कल्पना साकार रूप ले ले.

नरेंद्र मोदी की सरकार अपने लोकलुभावन कामों के जरिये अपनी लोकप्रियता बढ़ाती जा रही है. उसे देशव्यापी दलीय गंठजोड़ के जरिये हराने के विचार को एक ठोस राजनीतिक पहल की संज्ञा दी जा सकती है. पर, सवाल है कि क्या मोदी सरकार अगले दो साल में नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर हमला जैसे अपने अन्य चौंकानेवाले कामों से आगे निकल जाती है या प्रतिपक्ष महागंठबंधन बना कर 2019 के लोस चुनाव में राजग को मात दे देता है!

किसी भी महागंठबंधन के निर्माण में मुख्यतः तीन कठिनाइयां सामने आ सकती हैं. एक- महागंठबंधन का नेता कौन होगा? दो- महागंठबंधन की नीति-रीति कैसी होगी? तीन- राज्यों के परस्पर विरोधी क्षत्रपों को एक मंच पर कैसे लाया जा सकेगा? प्रतिपक्ष के लिए एक और कठिनाई नरेंद्र मोदी सरकार इस बीच पैदा कर सकती है.

संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले तक मोदी सरकार कुछ ऐसे चौंकानेवाले काम कर दे, ताकि महागंठबंधन के निर्माण के बावजूद राजग अपराजेय रहे. याद रहे कि हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राजग को 325 सीटें मिलीं, जबकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा की 328 सीटों पर बढ़त मिली थी. यानी उसकी 3 सीटें ही घटीं. आम तौर लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में विजयी दलों की सीटें काफी घट जाती हैं.

अनेक मतदाताओं के अनुसार, नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पौने तीन साल के कार्यकाल में अच्छे काम किये हैं. उतने काम 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय तक लोगों को नजर नहीं आये थे. दूसरी बात, वहां महागंठबंधन का भी कमाल था. अब गैर-राजग दलों को इस बात पर भी विचार करना होगा कि वे नरेंद्र मोदी के लोक-लुभावन कामों का मुकाबला कैसे करेंगे? क्या जहां-जहां गैर-राजग दलों की सरकारें बची हुई हैं, वहां वे सुशासन व विकास की रफ्तार को तेज करेंगे? क्योंकि, सिर्फ दलीय या फिर जातीय समीकरण ही हर जगह राजग का मुकाबला नहीं कर पायेगा.

महागंठबंधन के निर्माण में सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम को एक मंच पर कैसे लाया जाए? क्या मायावती 1995 में हुए लखनऊ गेस्ट हाउस कांड को भूल जायेंगी, जब सपा के बाहुबलियों ने उनके कमरे में जबरन घुस कर मायावती के साथ बदतमीजी की थी.

याद रहे कि उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव में राजग की अपेक्षा कांग्रेस-सपा-बसपा को कुल मिला कर दस प्रतिशत अधिक वोट मिले थे. लगभग यही समस्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और कम्युनिस्टों के बीच आयेगी. तमिलनाडु में क्या होगा? क्या अन्ना द्रमुक और द्रमुक को कभी एक मंच पर लाना संभव होगा? ऐसी समस्याएं कुछ अन्य राज्यों में भी हैं. इस तरह सारे गैर-राजग दलों को एक मंच पर लाना असंभव नहीं, तो अत्यंत कठिन जरूर है.इस महती काम को संभव बनाने के लिए कुशल मध्यस्थों की जरूरत पड़ेगी और इसमें काफी समय लग सकता है.

लोकसभा के अगले चुनाव में सिर्फ दो साल बाकी हैं, जो देखते-देखते बीत जायेंगे. इसलिए गैर-राजग दल यदि अभी से लग जायें, तो उन्हें कुछ सफलता मिल सकती है. एक मजबूत विकल्प तैयार करने में यदि प्रतिपक्ष विफल रहता है, तो वह उसकी विफलता है, जनता की नहीं. गत 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता के तो करीब 61 प्रतिशत वोट राजग के खिलाफ पड़े थे.

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