शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार

Updated at : 31 Mar 2017 5:32 AM (IST)
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शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार

सर्वोच्च न्यायालय ने लोहा खनन में भ्रष्टाचार के मामले में कर्नाटक के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों- एन धरम सिंह और एचडी कुमारस्वामी- के विरुद्ध जांच का आदेश दिया है. राज्य पुलिस के विशेष जांच दल को तीन महीने के भीतर रिपोर्ट जमा कराने को भी कहा गया है. देश में यह पहला मामला नहीं है, जब […]

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सर्वोच्च न्यायालय ने लोहा खनन में भ्रष्टाचार के मामले में कर्नाटक के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों- एन धरम सिंह और एचडी कुमारस्वामी- के विरुद्ध जांच का आदेश दिया है. राज्य पुलिस के विशेष जांच दल को तीन महीने के भीतर रिपोर्ट जमा कराने को भी कहा गया है. देश में यह पहला मामला नहीं है, जब किसी बड़े राजनेता या पदाधिकारी पर गंभीर आरोप लगे हैं. पिछले कुछ सालों से शीर्ष पदों पर व्याप्त भ्रष्टाचार और राजनीतिक संलिप्तता के मुद्दे पर चर्चा चल रही है.
इस समस्या पर अंकुश लगाने के उपायों, जैसे- लोकपाल और लोकायुक्तों की नियुक्ति, त्वरित जांच, सीबीआइ से मदद आदि, पर भी बहसें होती रही हैं. लेकिन, सरकारी अड़ंगेबाजी और जांच एजेंसियों में भी भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों के कारण इस मोरचे पर ठोस प्रगति नहीं दिख रही है. कर्नाटक के मामले को ही लें. मनमाने ढंग से खदान आवंटन की पोल एक लोकायुक्त की रिपोर्ट से ही खुली थी, पर दूसरे लोकायुक्त पर खुद ही भ्रष्ट होने का आरोप है.
सीबीआइ के दो पूर्व प्रमुखों पर दूसरे मामलों में आरोपितों से सांठगांठ का आरोप है. कई नौकशाहों पर मुकदमे चल रहे हैं या फिर वे जांच के घेरे में हैं. संसद और विधानसभाओं में दागी नेताओं का प्रवेश जारी है. नीचे से ऊपर तक घूसखोरी, धांधली और फर्जीवाड़े का नतीजा यह है कि इस वर्ष शुरू में आयी ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के मामले में भारत 176 देशों की सूची में 76वें स्थान से लुढ़क कर 79वें स्थान पर चला गया. एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हम सबसे भ्रष्ट देश हैं, जहां दो-तिहाई भारतीयों को रिश्वत देना पड़ता है.
हालांकि, यह संतोष की बात है कि हाल में घपले-घोटाले के बड़े मामले सामने नहीं आये हैं, पर इस बीमारी के व्यापक स्तर पर फैले होने के कारण यह नहीं कहा जा सकता है कि इस पर लगाम लग गयी है. नोटबंदी के दौरान रिजर्व बैंक और अन्य बैंकों के अनेक उच्चाधिकारी अवैध भुगतान में लिप्त पाये गये हैं. ऐसे में निचले स्तर के कर्मचारियों से शुचिता की अपेक्षा करना तार्किक नहीं है.
घूस लेने के साथ घूस देना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन आम नागरिक अक्सर बेबसी में रिश्वत देने के लिए बाध्य हो जाता है. भ्रष्टाचार की रोकथाम की राह में बड़ा अवरोध कानूनी प्रक्रिया की बेहद धीमी गति है. यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि अदालतें भी इस रोग से मुक्त नहीं हैं. भ्रष्टाचार ने न सिर्फ शासन-प्रशासन को पंगु बना दिया है, बल्कि अब यह लोकतंत्र के लिए भी बड़ा खतरा बन गया है.
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