उत्तर प्रदेश की सत्ता के शिखर पर योगी, पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का विशेष आलेख

तमाम अटकलों और कई नेताओं के नाम पर चर्चा के बाद आखिरकार उत्तर प्रदेश में नये मुख्यमंत्री की घोषणा हो गयी. पांच बार से गोरखपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे योगी आदित्यनाथ के नाम पर पार्टी आलाकमान और नवनिर्वाचित विधायकों ने मुहर लगा दी. जिस तरह से उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी जीत […]
तमाम अटकलों और कई नेताओं के नाम पर चर्चा के बाद आखिरकार उत्तर प्रदेश में नये मुख्यमंत्री की घोषणा हो गयी. पांच बार से गोरखपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे योगी आदित्यनाथ के नाम पर पार्टी आलाकमान और नवनिर्वाचित विधायकों ने मुहर लगा दी. जिस तरह से उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी जीत ने लोगों को अचंभित किया था, उसी तरह बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चयन से अचरज होना स्वाभाविक है. उग्र हिंदुत्व के पैरोकार और अक्सर विवादों में घिरे रहनेवाले नेता को देश के सबसे बड़े सूबे की बागडोर देने के फैसले में कई संकेत पढ़े जा सकते हैं. योगी की ताजपोशी के मायने और मतलब के विश्लेषण पर आधारित यह विशेष प्रस्तुति…
।। प्रमोद जोशी ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के चुनाव को लेकर पिछले एक हफ्ते से कई नामों पर कयास लगाये जा रहे थे, लेकिन जिस तरीके से योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति बनी, वह थोड़ा आश्चर्य पैदा करती है. यह समझा जा रहा था कि यूपी में भाजपा किसी ऐसे नेता को लायेगी, जो विकास और कानून व्यवस्था आदि को सुधारे. इसके विपरीत योगी आदित्यनाथ अाक्रामक हिंदुत्ववादी चेहरा हैं. भाजपा 2014 से अभी तक अपने हिंदुत्व वादी एजेंडे को बरकरार रखे हुए है, लेकिन पार्टी ने कभी अाक्रामक हिंदुत्व को आगे नहीं किया था. यूपी में भाजपा ने ऐसा क्यों किया और आगे की रूपरेखा क्या है, इसे समझने में अभी कुछ समय लगेगा. फिलहाल, ऐसा लगता है कि भाजपा ने ऐसा निर्णय भविष्य को राजनीति को ध्यान में रख कर किया है. प्रदेश में अब पार्टी विकास और आर्थिक प्रगति के साथ-साथ हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ायेगी. यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि योगी क्या अपनी अाक्रामता को बरकरार रखते हैं या फिर मुख्यमंत्री होने के नाते सबका साथ-सबका विकास की विचाराधारा पर आगे बढ़ते हैं. चूंकि, उत्तर प्रदेश में हिंदू ही नहीं रहते, मुसलमान, अन्य धर्मों और जातियों से जुड़े लोग भी रहते हैं. क्या मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ कुछ आश्वासन देंगे, कि वे सभी वर्गों को और उनकी चिंताओं को ध्यान में रखेंगे.
इस वर्ष के अंत तक गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होना है, अगले वर्ष कर्नाटक में चुनाव होगा. लेकिन, उत्तर प्रदेश अगर बीजेपी अाक्रामक हिंदुत्व को आगे लाती है, इसका मतलब है कि उसको कोई फाॅर्मूला समझ में आता है. चुनाव परिणामों से स्पष्ट था कि लोगों को ने जाति-धर्म के मुद्दों से उठ कर वोट किया है. लेकिन, भाजपा की गणना कुछ और ही नजर आती है. उसको लगता है कि आर्थिक कार्यक्रमों के अलावा, सांस्कृतिक पहचान का जो विचार है, उसे आगे लाया जायेगा, तभी वोट मिलेगा. यह केवल चुनाव की राजनीति को लेकर फैसला नहीं किया गया है. योगी को दो-तीन विशेषताओं के कारण चुना गया है. उनकी छवि एक कठोर, अनुशासित कार्यकर्ता की है. उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए एक कठोर और अनुशासित व्यक्ति की आवश्यकता थी. योगी के पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है. वे न तो कोई मंत्री रहे हैं, और न ही किसी अन्य प्रकार का अनुभव है. हालांकि, उनकी कुछ संस्थाएं चलती हैं. क्या वह अनुभव काम आयेगा, यह देखना होगा. यह कोई अनिवार्य बात नहीं है कि जिसके पास कोई अनुभव नहीं है, वह मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है. संभव है कि वह बेहतर प्रशासक साबित हों. उनके साथ अच्छी बात यह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन है. केंद्र सरकार भी अपनी है, कुछ ऐसी चीजें हैं, जो योगी की पक्ष में जाती हैं.
उत्तर प्रदेश को सबसे पहले कानून-व्यवस्था की जरूरत है. क्या वे कानून व्यवस्था को दुरुस्त कर पायेंगे, क्या वे गुंडा-गर्दी को रोक पायेंगे. यह पहला सवाल है कि कानून व्यवस्था को ठीक करने में मुसलमान या दूसरे धर्म व जाति के लोग, जो उनके विचार से मेल खाते, उनको तो कोई परेशानी तो नहीं होगी? संभव है कि योगी उनका भी मन जीतने में सफल हों. अभी हम उनको पूरी तरह से सफल-विफल कुछ भी नहीं कह सकते हैं. उनका आकलन करने के लिए हमें इंतजार करना होगा. दूसरी बात, उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने बार-बार कहा कि देश के विकास का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर निकलता है. यानी उत्तर प्रदेश को अभी आर्थिक विकास की जरूरत है. पिछले 10-12 साल में उत्तर प्रदेश आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ा गया है. विकास दर में गिरावट आयी है और आर्थिक प्रगति रुक गयी है. अखिलेश सरकार ने लखनऊ मेट्रो चलाने और आगरा हाइवे बनाने और कुछ अन्य प्रकार के कार्यों को दिखाने का प्रयास किया है. डेढ़ दो वर्षों से ‘काम बोलता है’ नारे के साथ उन्होंने अपना काम दिखाने का प्रयास किया, लेकिन उत्तर प्रदेश आर्थिक कार्यक्रमों में पीछे चला गया है. विदेशी निवेश की जरूरत मोदी सरकार के सामने बड़ी समस्या के रूप में रही है. क्या यूपी में अाक्रामक हिंदूवादी नेता को स्थापित करने के बाद विदेशी निवेश पर किसी प्रकार का अंदेशा तो नहीं होगा. संभव है कि सरकार उन बातों को संभाल ले जाये, संभव है कि विदेशी राज्यों के साथ प्रदेश का प्रशासन बेहतर तरीके के साथ काम करे. अभी हमें पता नहीं है कि मुख्यमंत्री के रूप में योगी की भूमिका क्या होगी.
जहां तक किसानों के कर्ज माफ करने की बात है, बैंकिंग प्रणाली और अधिकारी मानते हैं कि कर्ज माफ करने की व्यवस्था ठीक नहीं है. मोदी व्यक्तिगत तौर भी इसे अच्छा तरीका नहीं मानते हैं. चूंकि, उन्होंने छोटे किसानों के लिए आश्वासन दिया है, तो प्रस्ताव पास करना होगा, इसकी कीमत उत्तर प्रदेश शासन को देनी होगी. गन्ना किसानों को कीमतें देना, चीनी मिलों के पास जो बकाया है, उसे दिलाने की व्यवस्था करनी होगी. कानून व्यवस्था, किसानों के अलावा छोटे बच्चों-महिलाओं के स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत होगी. चुनाव में जीत का बड़ा कारक लोगों के घर-घर जाकर उज्ज्वला योजना के तहत लोगों को सिलेंडर मुहैया कराने जैसी योजनाओं की बड़ी भूमिका रही है. नये मुख्यमंत्री के इलाके में बच्चों के बुखार की बड़ी समस्या रही है. अगर वे इन समस्याओं को हल कर पाये, तो उनके लिए बड़ी उपलब्धि होगी. हिंदु या योगी मुख्यमंत्री बने, इससे मुसलमानों को कोई दिक्कत नहीं होगी, बशर्ते वे उनके जीवन को सुरक्षित बनायें, उनके रोजगार की व्यवस्था करें, परिवहन की व्यवस्था अच्छी हो, यह ज्यादा जरूरी है. इसके अलावा यूपी में बिजली एक बड़ी समस्या है. अगर वे ढांचागत सुविधाओं को बेहतर बना सके, तो उनके और पार्टी दोनों के लिए बेहतर होगा. अभी तक उनके जो बयान आये हैं, लव-जिहाद, धर्मांतरण, एंटी रोमियो जैसे रहे हैं, वे सब एक तरफा बातें है, उससे अंदेशा पैदा होता है कि वे क्या करेंगे. अगर आरएसएस या शीर्ष नेतृत्व ने तय किया है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाना है, तो लोगों ने इन सारे सवालों पर विचार किया होगा. यदि स्वास्थ्य, परिवहन, बिजली, रोजगार, कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को बेहतर तरीके हल करना होगा. पूर्वी यूपी से होनेवाले पलायन को रोकने की योजना बनानी होगी.
अनुशासनहीनता देखने को मिलती रही है. थानों में एक विशेष प्रकार के लोगों की नियुक्ति का मामला था, उन मुद्दों पर योगी का क्या फैसला होगा, यह देखना होगा. जातीय समीकरणों को भी साधने की चुनौती योगी के सामने होगी. चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने सभी जातियों को साथ लाया है, ऐसे में सभी जातियों के साथ योगी को बेहतर तालमेल बना कर साथ लेकर चलना होगा. सामाजिक समरसता की चुनौती होगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि योगी प्रदेश को एक अच्छा नेतृत्व प्रदान करेंगे. यहां सफलता-विफलता योगी की नहीं होगी, बल्कि मोदी और अमित शाह की प्रतिष्ठा जुड़ी होगी.
(ब्रह्मानंद मिश्र से बातचीत पर आधारित)
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