गंभीर संकट में हैं गधे...

Updated at : 08 Mar 2017 6:38 AM (IST)
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गंभीर संकट में हैं गधे...

चंदन श्रीवास्तव एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज हर चुनाव अपने साथ कोई चुटीला नारा या जुमला छोड़ जाता है. बाद में लोग इस नारे या जुमले को ज्यादा याद रखते हैं और इस बात को कम कि उस चुनाव में किसकी सरकार बनी थी. यूपी में सरकार चाहे जिस पार्टी की बने यूपी का चुनाव आगे के […]

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चंदन श्रीवास्तव
एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज
हर चुनाव अपने साथ कोई चुटीला नारा या जुमला छोड़ जाता है. बाद में लोग इस नारे या जुमले को ज्यादा याद रखते हैं और इस बात को कम कि उस चुनाव में किसकी सरकार बनी थी. यूपी में सरकार चाहे जिस पार्टी की बने यूपी का चुनाव आगे के वक्त में जिन बातों के लिए याद किया जायेगा उनमें एक ‘गधा-प्रकरण’ भी होगा.
अपनी मुख्यमंत्री की गद्दी बचाने के लिए चुनावी मैदान में उतरे अखिलेश यादव ने 20 फरवरी को इलाहाबाद की रैली में अमिताभ बच्चन को याद किया. दरअसल, अमिताभ बच्चन ने गुजरात सरकार के एक विज्ञापन में गधे की एक प्रजाति ‘घुड़खर’ की तारीफ में कसीदे पढ़े हैं.
रैली में गुजरात टूरिज्म के विज्ञापन की स्क्रिप्ट पढ़ते हुए अखिलेश ने कहा कि ‘मैं सदी के महानायक से कहूंगा कि वे गुजरात के गदहों का प्रचार करना बंद करें.’ यह कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाने लगाने के अंदाज में फेंका हुआ जुमला था और यूपी में बीजेपी के स्टार कैंपेनर के रूप में देश के गुजराती प्रधानमंत्री की तरफ से इसका जवाब आना ही था. 23 फरवरी को बहराइच की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पलटवार किया. कहा कि गधा वफादार होता है, उसे जो काम दिया जाता है, उसे वह पूरा करता है. उन्होंने अखिलेश को नसीहत दी कि अपनी जातिवादी मानसिकता में पशुओं में ऊंच-नीच ना देखें, प्रेरणा गधे से भी ली जा सकती है.
गधा मजाक का विषय है या प्रेरणा का स्रोत इस सवाल पर लंबी और मनमोहनी बहस चल सकती है और इस बहस का पसारा अनंत तक जारी रह सकता है. इस बहस के उलट एक बात अभी से तय है कि गधे गंभीर संकट में हैं और वह दिन दूर नहीं जब गिद्ध और गौरेये की तरह गधे भी हमारी नजरों से ओझल हो जायेंगे. साल 2014 के सितंबर महीने में नयी पशुगणना के आंकड़े सामने आये, तो पता चला कि देश में गधों की संख्या तेजी से कम हो रही है. पांच साल के भीतर गधों की कुल संख्या में तकरीबन 27 फीसद की कमी आयी है. साल 2012 के 15 अक्तूबर यानी नयी पशुगणना की कटऑफ तारीख पर देश में गधों की संख्या 3 लाख 19 हजार पायी गयी, जबकि पिछली पशुगणना (2007) में गधों की कुल संख्या 4 लाख 38 हजार थी. इस कमी का चलन पिछले बीस सालों से जारी है.
1992 की पशुगणना में गधों की संख्या 9 लाख 67 हजार थी. पांच साल बाद 1997 में इस तादाद में 9 फीसद की कमी आयी. 1997 में गधों की संख्या घट कर 8 लाख 82 हजार रह गयी. साल 2003 की पशुगणना में गधों की संख्या 26 फीसद घट कर साढ़े 6 लाख हुई. इसी तरह साल 2012 की पशुगणना में गधों की संख्या में 27 फीसद की कमी आयी है. मोटा-मोटी हिसाब करें, तो 1992 से 2012 के बीच गधों की संख्या में 6 लाख की कमी आयी है. एक दशक में 3 लाख की कमी का रुझान अगर जारी रहता है, तो 2022 तक इस पशु-प्रजाति का वजूद संकट में आ जायेगा.
अगर प्रदेशवार देखें, तो स्थिति और भी ज्यादा विकट जान पड़ती है. कुछ राज्यों में गधे 1000 या इससे भी कम संख्या में बचे हैं. ऐसे राज्यों में असम (1049), पश्चिम बंगाल (566), छत्तीसगढ़ (600), झारखंड (300) तथा केरल (407) की गिनती की जा सकती है.
कुछ राज्यों जैसे गोवा, मिजोरम और त्रिपुरा में अब इस पशु का कोई नामोनिशान नहीं बचा है, जबकि पशुगणना रिपोर्ट में पुद्दुचेरी में सिर्फ 4 गधे के होने की बात दर्ज है. नयी पशुगणना का एक रुझान और भी गौरतलब है. दुधारू पशुओं में गाय और भैंसों की संख्या तो 2007 की पशुगणना की तुलना में 2012 की पशुगणना में बढ़ी है, लेकिन भेंड़, बकरी, सूअर, ऊंट और गधों की संख्या में कमी आयी है. दूध देनेवाली गाय और भैंसों की संख्या पिछली पशुगणना (2007) के 77.04 मिलियन से बढ़ कर 2012 में 80.52 मिलियन हो गयी. यह 4.51 फीसद की बढ़ोत्तरी है, लेकिन भेड़ और बकरियों की संख्या में कमी आयी है. देश में भेड़ों की कुल संख्या 65.06 मिलियन है, जो 2007 की पशुगणना की तुलना में 9.07 फीसद कम है. इसी तरह बकरे-बकरियों की संख्या में पिछली पशुगणना की तुलना में 3.82 फीसद और सूअरों की संख्या में पिछली पशुगणना की तुलना में 7.54 प्रतिशत की कमी आयी है. देश में बकरे-बकरियों की संख्या 2012 में 135.17 मिलियन और सूअरों की संख्या 10.29 मिलियन थी. सबसे ज्यादा तेज गिरावट (20 फीसद से अधिक) ऊंट और गधों की संख्या में दर्ज की गयी है.
गाय-भैंसों की तुलना में सूअर, भेड़, बकरी, ऊंट तथा गधों की संख्या में कमी क्या इस बात का इशारा है कि देश जाति-आधारित पेशों की जकड़ से मुक्त हो रहा है या इस बात से यह अर्थ निकाला जाये कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लोगों के लिए जीविका और रोजगार की स्थितियां नयी अर्थव्यवस्था में कम हुई हैं और उन्हें अपने परंपरागत पेशे को छोड़ कर पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है? भेड़, बकरी, सूअर, ऊंट और गधे एक अर्थव्यवस्था के भी संकेतक हैं. सोचिये कि इन पशुओं के सहारे जीविका चलानेवाले विकास की हमारी राजनीति में कहां हैं?
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