राजनीति का खूनी खेल

भारतीय राजनीति में पार्टियों और विचारधाराओं में हिंसक झड़पों का इतिहास पुराना है, पर इन दिनों जो खबरें केरल से आ रही हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं. मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीएम) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भाजपा के कार्यकर्ताओं खुलेआम एक-दूसरे पर जानलेवा हमले कर रहे हैं तथा कार्यालयों को निशाना बना रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव […]
भारतीय राजनीति में पार्टियों और विचारधाराओं में हिंसक झड़पों का इतिहास पुराना है, पर इन दिनों जो खबरें केरल से आ रही हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं. मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीएम) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भाजपा के कार्यकर्ताओं खुलेआम एक-दूसरे पर जानलेवा हमले कर रहे हैं तथा कार्यालयों को निशाना बना रहे हैं.
पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से राजनीतिक हिंसा के 400 से अधिक मामले दर्ज किये जा चुके हैं तथा बीते तीन सालों में ऐसी वारदातों में 30 फीसदी की बढ़त हुई है. रिपोर्टों के अनुसार, इन मामलों में सीपीएम के 600, संघ-भाजपा के 300 और कांग्रेस के 60 से अधिक कार्यकताओं की गिरफ्तारी हुई है. यह बड़े अचंभे की बात है कि लगभग पूर्ण रूप से साक्षर और शैक्षणिक मानदंडों पर शीर्षस्थ राज्यों में शामिल केरल में राजनीतिक मतभेदों और विवादों के निपटारे के लिए बम, बंदूक, तलवारों जैसे हथियारों का सहारा लिया जा रहा है.
यह राज्य आर्थिक, वैचारिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी बहुत समृद्ध है. वहां की राजनीति में धन और बाहुबल का दखल भी नाम-मात्र का है. अपराधों की संख्या के लिहाज से भी केरल बेहतर स्थिति में है. विकास के पैमाने पर पहली कतार के राज्य में अनवरत राजनीतिक हिंसा की घटनाओं में शामिल विचारधाराओं के दावे भी बड़े-बड़े हैं. एक पक्ष समाजवादी-साम्यवादी सोच से समतामूलक समाज बनाने की बात कहता है, तो दूसरा पक्ष सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नैतिकता के वाहक होने का दंभ भरता है. एक पक्ष राज्य की सत्ता पर काबिज है, तो दूसरा केंद्र में शासन की बागडोर संभाले हुए है. पर जमीन पर सच यह है कि वर्चस्व की लड़ाई में हर आदर्श और जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ कर एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं.
सीपीएम और संघ-भाजपा भले ही हिंसा का आरोप एक-दूसरे पर मढ़ते रहें, लेकिन असलियत यही है कि इस संकट में दोनों की भागीदारी है. यह भी निराशाजनक है कि राजनीतिक संवाद के जरिये शांति कायम करने की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ है. एक तो प्रशासनिक स्तर पर इन घटनाओं को तुरंत रोकने और दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए, वहीं लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप बहसों और चर्चाओं के सहारे राजनीति करने की कोशिश होनी चाहिए.
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