शब्द-हिंसा की राजनीति

Updated at : 03 Mar 2017 6:40 AM (IST)
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शब्द-हिंसा की राजनीति

तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा दिल्ली के रामजस कॉलेज में देश को तोड़ने और कश्मीर की आजादी के लिए नारे लगाये गये. ये नारे लगानेवाले वहां भी कम्युनिस्ट छात्र नेता थे. देशभक्त छात्राें को जब यह देख कर गुस्सा आया, तो कम्युनिस्ट छात्रों ने उन पर हमला कर दिया. इसका जब उन्हें जवाब मिला, तो […]

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तरुण विजय

राज्यसभा सांसद, भाजपा

दिल्ली के रामजस कॉलेज में देश को तोड़ने और कश्मीर की आजादी के लिए नारे लगाये गये. ये नारे लगानेवाले वहां भी कम्युनिस्ट छात्र नेता थे. देशभक्त छात्राें को जब यह देख कर गुस्सा आया, तो कम्युनिस्ट छात्रों ने उन पर हमला कर दिया. इसका जब उन्हें जवाब मिला, तो इसे मीडिया में ऐसे उछाला गया, मानो देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में पड़ गयी है.

कारगिल के महान शहीद की बेटी भी इसमें अपना एक भिन्न मत देने लगी. जहां शहीद की बेटी को अपनी बेटी मानते हुए हमें उसकी सुरक्षा करनी चाहिए और उसके विरुद्ध अभद्र टिप्पणियां करनेवालों पर कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए, वहीं सैनिकों का अपमान करनेवाले कम्युनिस्ट छात्रों पर कोई दया नहीं दिखानी चाहिए.

भद्रता, शब्द संयम और शालीनता राम का गुण है- पराक्रमी विजेताओं का प्रतीक, न कि हारे हुओं की कायरता. सागर और झरने में यही फर्क होता है, लेकिन भारत का वर्तमान सार्वजनिक संवाद प्रत्यक्ष हिंसा और शब्द-हिंसा से भर गया है. हिंसा केवल शस्त्र से नहीं होती. अपशब्द भी हिंसा की श्रेणी में आते हैं.

केरल में संघ और भाजपा के ग्यारह कार्यकर्ता गत नौ माह में केवल वैचारिक मतभिन्नता के कारण बर्बरतापूर्वक माकपा कार्यकर्ताओं द्वारा मार डाले गये. न दिल्ली हिली, न संवेदनशील मीडिया का दिल हिला. इतना वैचारिक विद्वेष कि मृत्यु पर भी दिल न हिले और यह उस देश में जहां कम्युनिस्ट पार्टी की अनेक शाखाओं द्वारा भयानक हिंसा, नक्सलवाद, माओवाद, मार्क्सवाद-लेनिनवाद के जरिये किये जाने के बावजूद दीनदयाल उपाध्याय या वाजपेयी ने कभी उन पर गाली-गलौज का प्रहार नहीं किया.

गुजरात के पूरे लोगों को गधा बतानेवाले गुजरात का अपमान कर रहे थे, या मोदी पर हमला बोल रहे थे? नहीं, वे समूचे देश का अपमान कर रहे थे. मार्क्सवादी सात दशक तक कांग्रेस के साये में रहे. जनता द्वारा अस्वीकृत और विश्व द्वारा तिरस्कृत होने के बावजूद उन्हें अपने भिन्न मत उस देश में स्वीकार नहीं, जहां की माटी ने सदा मतभिन्नता को सम्मान दिया. उनके प्रभाव वाले शिक्षा केंद्रों में जेहादी, भारत-द्रोही, देश के विरुद्ध आवाज उठानेवाले स्वीकार्य हो सकते हैं, लेकिन भारत-भक्ति के स्वर नहीं. क्यों?

यह असहिष्णुता वास्तव में वैचारिक हिंसा है और विचारधारा शून्य दल ही उसका उपयोग कर सकते हैं.

गाली-गलौज कभी भी जनसमर्थन नहीं बढ़ाती, बल्कि अपना अहंकार और दुर्बलता ही प्रकट करती है. जो जितना कमजोर और विचार-शून्य होता है, वह उतना ही गालियों का सहारा लेता है. तर्क न सही तो न सही, गाली से तो सुर्खियां बटोर लूं- बस यही हारे हुए का आखिरी तीर होता है. वास्तव में देखा जाये, तो इस देश की राजनीति पारिवारिक जमींदारियों के तहत माफिया-समूहों का दंगल बन चुकी है. इस देश को धन और मन दोनों से दरिद्र बनानेवाले अब अरब, तुरक, मंगोल, बर्बर, हूण, अंगरेज या मुगल नहीं आते.

हमें खुद ही अपनों को लूटने में लज्जा नहीं आती. पचास के दशक से वर्तमान युग तक के चुनावी वायदे तनिक भी नहीं बदले, तो इसकी एकमात्र वजह राजनेताओं का एेश्वर्य प्रिय स्वभाव और अहंकार ही है, जो उनमें एक-दूसरे भारतीय को तिरस्कार एवं शत्रुता के भाव से देखने का स्वभाव पैदा करता है. पार्टी दफ्तर में घनघोर घमंड से तौलिया बिछी कुर्सी (अजब का राजनीतिक फैशन है सिर्फ भारत में) पर बैठे मंत्री-नेता अपने कार्यकर्ताओं की नमस्ते का तो जवाब तक नहीं देते, सिर्फ नजर भर उठा कर देख लिया, यही पर्याप्त होता है. ये लोग संवेदना और एक-दूसरे भारतीय के प्रति सम्मान का भाव कहां से पैदा करेंगे?

कौन जात है तुम्हारी? कितना पैसा है? कितना खर्च करने का दम है? सिर्फ इस पर निर्भर करता हो यदि राजनीतिक जीवन और चुनावी जीत या हार अपने राजनीतिक जीवन का प्राण या मृत्यु मान ली जायें, तो स्वदेशी वैचारिक विपक्षी सीमा बाहर के शत्रु से भी ज्यादा खतरनाक और घृणित बन जाता है.

भारत में अभद्रता और हिंसा की राजनीति कम्युनिस्टों की देन है. मेरे अलावा बाकी सब कुछ असत्य, ध्वंसयोग्य मृत्युदंड का पात्र है- यही वह मानसिकता है, जिसने सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप को बनाया और बर्लिन की दीवार खड़ी की. इसी मानसिकता ने गुलाग, साइबेरिया और एकतंत्रवादी शासन पैदा किये. इसी मानसिकता ने सऊदी अरब की घुटन, पाकिस्तानी फिदायीन, सीरिया के शरणार्थी और आइएसआइएस के रक्तपिपासु उभारे. अपशब्द जुबान पर लानेवाला शब्द-हिंसा करने को तत्पर फिदायीन ही होता है, जो अपनी छवि की मृत्यु पर चिंतित नहीं होता.

कुछ लोग ऐसे चाहिए, जो पार्टी की विभिन्नताओं को दीनदयाल उपाध्याय की सरलता से जी सकें और उन पुलों को बना सकें, जो घनघोर विरोध एवं मतभेद के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक शीर्ष अधिकारियों ने बनाये थे. यह कल की ही बात है, जब चंद्रशेखर, वाजपेयी, नरसिंहराव जैसे घोर वैचारिक विरोधी भी मित्रता के संबंध रख सके थे. वह आज भी असंभव नहीं है. देश का मन, हमारी जय-पराजय से ज्यादा बड़ा और मूल्यवान है. धन बचे न बचे, मन तो बचाइये.

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