सोशल मीडिया के नजरिये में स्त्री

Updated at : 02 Mar 2017 6:30 AM (IST)
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सोशल मीडिया के नजरिये में स्त्री

प्रभात रंजन कथाकार बीस साल की एक छात्रा एक राजनीतिक विषय को लेकर अपना मुंह खोलती है और सोशल मीडिया पर समाज के हर तबके के पुरुष या तो उसका मजाक उड़ाने लग जाते हैं या उसके विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणियां करके उसकी जुबान बंद करवाने में लग जाते हैं. उसको मजबूर कर दिया जाता है […]

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प्रभात रंजन

कथाकार

बीस साल की एक छात्रा एक राजनीतिक विषय को लेकर अपना मुंह खोलती है और सोशल मीडिया पर समाज के हर तबके के पुरुष या तो उसका मजाक उड़ाने लग जाते हैं या उसके विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणियां करके उसकी जुबान बंद करवाने में लग जाते हैं. उसको मजबूर कर दिया जाता है कि वह अपनी जुबान को बंद करके परिदृश्य से गायब हो जाये. ऊपरी तौर पर यह मामला राजनीतिक लग सकता है, लेकिन गुरमेहर कौर नामक उस छात्रा द्वारा अपनी राय प्रकट करने के बाद जिस तरह से पुरुष समाज ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, वह इसका आईना है कि समाज में हम आज भी औरतों को किस दर्जे में रखते हैं?

यह घटना तो महज एक उदाहरण भर है. अगर सोशल मीडिया को खंगालने की कोशिश करें, तो पायेंगे कि स्त्री-मुक्ति, स्त्री सशक्तिकरण की तमाम बहसों के बीच स्त्रियों के प्रति पुरुष मानसिकता में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है. एक तरफ बेटी बचाओ का अभियान चलाया जाता है, बेटियों के साथ भेदभाव न करने की बात की जाती है, लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल गुम हो जाता है कि बेटियों के लिए हम कौन सा समाज बना रहे हैं. कामकाज और समाज के हर क्षेत्र में आज स्त्रियों की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन वे कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं. उनको हर कहीं पुरुष-हिंसा का शिकार होना पड़ता है. पहले से कहीं अधिक.

दुर्भाग्य से, अभिव्यक्ति की आजादी के सबसे बड़े प्रतीक सोशल मीडिया के माध्यमों पर समाज की यह सोच स्पष्ट रूप से प्रकट होती है. सोशल मीडिया हमारे समाज की सोच को सामने लाता है. मेरा एक मित्र अक्सर मजाक में कहता है कि सोशल मीडिया के सारे माध्यम ‘स्ट्रीम ऑफ कांशसनेस’ (चेतना की धारा) के माध्यम हैं. यानी अक्सर लोग बिना अधिक सोचे-समझे किसी भी विषय पर त्वरित प्रतिक्रिया देते हैं, जिससे उनकी वास्तविक मानसिकता का पता भी चल जाता है. सभ्य होने का आवरण उतर जाता है और अंदर का पशु दिखाई दे जाता है.

इसलिए जब स्त्री अपने लेखन में जरा भी मुखर होती है, किसी मुद्दे पर खुल कर अपनी प्रतिक्रिया देती है, तो उसको मर्यादा का पाठ पढ़ानेवाले ही नहीं, उसके ऊपर निजी टिप्पणियां करनेवाले भी सामने आ जाते हैं. गुरमेहर कौर का प्रकरण कोई अकेला उदाहरण नहीं है. समाज के किसी भी वर्ग की स्त्री को इस तरह की प्रतिक्रियाओं से बख्शा नहीं जाता है. यहां तक कि लेखिकाओं और पत्रकारों को भी नहीं छोड़ा जाता है. हाल में ही एक लेखिका को इस बात को लेकर सोशल मीडिया पर पुरुष-हिंसा का शिकार होना पड़ा कि उसने अपनी किताब के शीर्षक में ‘पतनशील’ शब्द का उल्लेख क्यों किया है.

जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ में लिखा था- ‘नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में/ पीयूष-स्रोत बहा करो जीवन के सुंदर समतल में.’ इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आसपास सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है- नारी तुम केवल देह हो! हम यह कहते हैं कि बाजार स्त्री देह को ऑब्जेक्टिफाइ कर रहा है.

वह वस्तुओं को बेचने के लिए स्त्री देह को वस्तु की तरह पेश कर रहा है. लेकिन, जिस तरह से सोशल मीडिया की पुरुषवादी सोच सामने आ रही है, उससे ऐसा नहीं लगता है कि स्त्री देह का यह वस्तुकरण बाजार कर रहा है. बल्कि, लगता यह है कि बाजार ऐसा इसलिए कर रहा है, क्योंकि पुरुष ऐसा सोच रहा है.

स्त्रियों के सशक्तिकरण, बेटियों को सम्मान देने की बात तब तक बेमानी ही लगती है, जब तक कि स्त्री को उसकी देह से, उसके सौंदर्य से अलग हट कर न देखा जाये.

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