फसल के साथ गुफ्तगू

Updated at : 13 Dec 2016 1:08 AM (IST)
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फसल के साथ गुफ्तगू

हमें खेत से कितना कुछ सीखने को मिलता है. किसानी कर रहे लोगों के लिए तो खेत पाठशाला की तरह है. मौसम की मार क्या होती है, खेत से बेहतर कोई नहीं जान सकता है. माटी में पल-बढ़ कर खेत में उपजी फसल हमारे आंगन-दुआर में खुशबू बिखेरती है. ऐसे में आज इस किसान को […]

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हमें खेत से कितना कुछ सीखने को मिलता है. किसानी कर रहे लोगों के लिए तो खेत पाठशाला की तरह है. मौसम की मार क्या होती है, खेत से बेहतर कोई नहीं जान सकता है. माटी में पल-बढ़ कर खेत में उपजी फसल हमारे आंगन-दुआर में खुशबू बिखेरती है. ऐसे में आज इस किसान को फसल और खेत-खलिहानों से बातचीत करने का मन है.

फसल, तुम ही हो, जिससे हमने संघर्ष करना सीखा. हमारे भंडार को एक नयी दिशा देकर बाजार में पहुंच कर हमारे कल और आज के लिए चार पैसे तुम ही देती हो, लेकिन ऐसा हर बार हो, यह निश्चित तो नहीं है न! कभी मौसम की मार, तो कभी कुछ और लेकिन हर बार, हर साल तुम हमारे लिए इतना तो दे ही देती हो कि हम भूखे नहीं सोते हैं.

सुबह हल्के कुहासे की चादर में अपने खेत के आल पर घूमते हुए जब तुम्हें देखता हूं, तो मन करता है कि तुमसे बतियाऊं, दिल खोल कर, मन भर कर. धान के बाद अब तुम्हारी बारी है मक्का, अभी तो तुम नवजात हो. धरती मैया तुम्हें पाल-पोस रही हैं. हम किसान तो बस एक माध्यम हैं. यह जानते हुए कि प्रकृति तुम्हारी नियति तय करती है, लेकिन खूब बतियाने का जी कर रहा है तुमसे. महाभारत के उस संवाद को जोर से बोलने का जी करता है- ‘आशा बलवती होती है राजन!’

धरती मैया में हमने अठारह-उन्नीस दिन पहले तुम्हें बोया था. आज तुम नवजात की तरह मुस्कुरा रहे हो. मैंने हमेशा धान को बेटी माना है, क्योंकि धान मेरे लिए फसल भर नहीं है, वह ‘धान्या’ है. वहीं मेरे मक्का, तुम किसानी कर रहे लोगों के घर-दुआर के कमाऊ पूत हो. बाजार में जाकर हमारे लिए दवा, कपड़े और न जाने किन-किन जरूरतों को पूरा करते हो. यह तुम ही जानते हो या फिर हम किसान ही जानते हैं.

बाबूजी अक्सर कहते थे कि नयी फसल की पूजा करो, वही सब कुछ है. फसल की बदौलत ही हमने पढ़ाई-लिखाई की. घर-आंगन में शहनाई की आवाज गूंजी. बाबूजी तुम्हें आशा भरी निगाह से देखते थे. वैसे ही जैसे दादाजी पटसन को देखते थे. कल रात बाबूजी की 1980 की डायरी पलट रहा था, तो देखा कैसे उन्होंने पटसन की जगह पर तुम्हें खेतों में सजाया था. खेत उनके लिए प्रयोगशाला था. मक्का, आज तुम्हें उन खेतों में निहारते हुए बाबूजी की खूब याद आ रही है. बाबूजी का अंतिम संस्कार भी मैंने खेत में ही किया, इस आशा के साथ कि वे हर वक्त फसलों के बीच अपनी दुनिया बनाते रहेंगे और हम किसानों को किसानी का पाठ पढ़ाते रहेंगे.

पिछले साल मौसम की मार ने तुम्हें खेतों में लिटा दिया था. तुम्हें तो सब याद होगा मक्का! आंखें भर आयी थीं. बाबूजी पलंग पर लेटे थे. सैकड़ों किसान रो रहे थे. लेकिन हिम्मत किसी ने नहीं हारी. हम धान में लग गये. मिर्च में लग गये. आलू में सब कुछ झोंक दिया…

खेत में टहलते हुए, तुम्हें देखते हुए, बाबूजी के ‘स्थान’ को नमन करते हुए खुद को ताकतवर महसूस कर रहा हूं. तुम नवजात होकर भी मुझसे कह रहे हो कि ‘फसल’ से आशा रखो और बाबूजी कह रहे हैं किसानों को हर चार महीने में एक बार लड़ना पड़ता है, जीतने के लिए.

इस बीच कचबचिया चिड़िया पर नजर टिक जाती है. कुहासे में मन के सारे तार खुलते जा रहे हैं. ठंडी हवा चल रही है, कुहासे में भीगे पत्ते बहुत सुंदर लगने लगे हैं. सेमल के पेड़ को देख कर फसलों के और भी करीब चला जाता हूं. उदय प्रकाश की इन पंक्तियों की तरह- मैं सेमल का पेड़ हूं/ मुझे जोर-जोर से झकझोरो और मेरी रूई को हवा की तमाम परतों में/ बादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह उड़ जाने दो…

गिरींद्र नाथ झा

ब्लॉगर एवं किसान

girindranath@gmail.com

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