हम, कार और पार्किंग

Updated at : 12 Dec 2016 7:02 AM (IST)
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हम, कार और पार्किंग

वीर विनोद छाबड़ा व्यंग्यकार गुल्लू बाबू ने बुढ़ौती में कार खरीदने का मन बनाया. बच्चों ने नाक में दम कर दिया है. एलआइजी के दो कमरे का छोटा सा घर है उनका. दो-दो बहु-बेटे, चार उनके बच्चे और खुद पति-पत्नी, कुल अदद आठ प्राणी हैं. दो बाइक और एक स्कूटी छोटे से लॉन में खड़ी […]

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वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

गुल्लू बाबू ने बुढ़ौती में कार खरीदने का मन बनाया. बच्चों ने नाक में दम कर दिया है. एलआइजी के दो कमरे का छोटा सा घर है उनका. दो-दो बहु-बेटे, चार उनके बच्चे और खुद पति-पत्नी, कुल अदद आठ प्राणी हैं. दो बाइक और एक स्कूटी छोटे से लॉन में खड़ी रहती हैं. एक पुरानी साइकिल भी कबाड़ माफिक खूंटी पर टंगी है. कार कहां खड़ी होगी? गुल्लू बोले- चार फुट घर के अंदर और बाकी फुटपाथ पर घेरेबंदी करके गैराज बना ली है.

हमारे एक मित्र छिद्दू बाबू ने भी कार गैराज बनवाया था, बिलकुल कार की नाप का. मिस्त्री ने बहुत समझाया था, लेकिन माने नहीं थे. उलटे मिस्त्री से भिड़ गये कि पैसा तेरे बाप का लग रहा है क्या! और वही हुआ, जिसकी आशंका थी. गैराज में कार घुस तो गयी. मगर न दायें निकलने की जगह थी और न बायें. ऊपर से आस-पास वालों के लिए टैक्स फ्री मनोरंजन की सामग्री बने, सो अलग. अंततः उन्होंने कार बेच कर गैराज में परचून की दूकान खोल ली, निठल्ले बेटे के लिए.

गुल्लू बाबू किस्सा सुन कर हंस पड़े- हमने दो-दो फुट जगह छोड़ी है. फिर भी हमने बहुत समझाया कि देखो जमाना बहुत खराब. पिछले महीने हमारे पड़ोसी के मेहमान की नयी इनोवा चोरी हो गयी. रजिस्ट्रेशन भी नहीं हुआ था. बेचारे डिनर खाने आये थे. फिर हमें अपना जमाना याद आया. मारूति 800 स्टैंडर्ड ली थी, भूमंडलीकरण की शुरुआत में. चौराहे पर खड़ा बड़ी मूंछ वाला सिपाही भी सैल्यूट मारता था. अपनी गली क्या, आगे-पीछे की छह-छह गलियों में भी इकलौती रही सालों तक. मगर इस बीच रात-दिन प्रसूताओं और बीमारों को लादती फिरी. मुंह से ‘ना’ नहीं निकलती थी. समाजसेवी जो ठहरे. पत्नी बड़बड़ाती रही. इससे अच्छा तो एम्बुलेंस खरीद लेते.

आजकल तो कार खरीदना आसान है. चलाना मुश्किल है. छिद्दू बाबू के साथ यही हुआ. हमें क्या मालूम था कि कार पेट्रोल पानी की तरह पीती है. शान बघारने के लिए बाहर चारदीवारी के साथ सटी खड़ी है. स्कूटी पर आ गये. छठी-छमाही तब चलती है, जब शादी-ब्याह आदि समारोह में जाना होता है.

हमारे एक अन्य मित्र नंदू बाबू भी पार्किंग को लेकर बहुत दुखी रहते हैं. न्यौता देनेवाले से पहले ही पूछ लेते हैं- गेस्ट हाउस के आस-पास पार्किंग स्पेस है कि नहीं. अगला गर्व से कहता है- हजार कारें खड़ी हो सकती हैं. लेकिन, नंदू बाबू को विश्वास नहीं होता. उस दिन हमें बता रहे थे कि एक समारोह में गये. पार्किंग के लिए जगह नहीं मिली. फैमिली को तो अंदर भेज दिया, खुद इधर-उधर घंटों टहलते रहे. नयी कार थी, सो डर भी लगता था कि चोर-उचक्के न ले उड़ें. फिर सिपाही लोगों ने चालान काट दिया तो. कभी कभी तो क्रैन से उठा भी ले जाते हैं. हजार से नीचे बात नहीं करते. इतना तो शादी में ‘व्यवहार’ नहीं दिया होता.

पड़ोसी टिल्लू बाबू को तो बहुत न्यौते मिलते हैं. वे दिन में स्कूटी उठा कर निरीक्षण कर आते हैं. इसी बहाने सड़क के आस-पास गड्डों की जानकारी भी कर लेते हैं. खुद को बहुत चालाक समझने के बावजूद टिल्लू बाबू की कार पर दर्जनों डेंट और खुरचनें हैं. बंपर भी कीलों-पेंचों से ठुके हैं.

ये सब खराब ड्राइविंग का नहीं, अव्यवस्थित पार्किंग का परिणाम हैं. पिछली बार उन्होंने अंजाने में ‘निषेध’ स्थान कार पार्क करी ही थी कि दो खूंखार पालतू कुत्तों ने उन्हें दौड़ा दिया. मोटे-मोटे कई इंजेक्शन लगवाने पड़े थे. अब उन्होंने कार बेच दी है. आसपास के स्टोन-थ्रो वाले न्यौते निपटाते हैं. पेट्रोल, समय और ऊर्जा की बचत और साथ में पार्किंग के झंझट से भी फुरसत मिल गयी है.

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