मुद्रा बनाम कूटमुद्रा

Updated at : 30 Nov 2016 5:59 AM (IST)
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मुद्रा बनाम कूटमुद्रा

िबभाष कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ कबीलाई और सामंती समाज के आगे लोकतांत्रिक समाज के विकास में मुद्रा के उद्भव और विकास का बहुत बड़ा योगदान रहा है. मुद्रा ने आम आदमी के श्रम, सेवा और हुनर को एक मूल्य दिया है. लेकिन, मुद्रा का प्रबंधन और नियंत्रण हमेशा से एक कठिन कवायद रही […]

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िबभाष
कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
कबीलाई और सामंती समाज के आगे लोकतांत्रिक समाज के विकास में मुद्रा के उद्भव और विकास का बहुत बड़ा योगदान रहा है. मुद्रा ने आम आदमी के श्रम, सेवा और हुनर को एक मूल्य दिया है. लेकिन, मुद्रा का प्रबंधन और नियंत्रण हमेशा से एक कठिन कवायद रही है.
समय-समय पर प्रकट होनेवाली आधुनिक अर्थव्यवस्था में निहित अनिश्चितता के कारण पूरी दुनिया में वैकल्पिक भुगतान और निवेश उपायों की सतत तलाश जारी है. वस्तुओं के लेन-देन, गोल्ड और डॉलर स्टैंडर्ड के रास्ते मुद्रा प्रबंधन आज के टोकेन मुद्रा के रूप में स्थापित हुआ है. आज की मुद्रा प्रणाली 15 अगस्त, 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन द्वारा घोषित व्यवस्था के अंतर्गत चल रही है. इस व्यवस्था में मुद्रा धन (मनी) के रूप में परिवर्तित हो गयी, जिसमें क्रेडिट के रूप में धन का निर्माण प्रमुख स्थान पर आ गया. इस व्यवस्था के अंतर्गत धन निर्माण में बैंकों की भूमिका प्रमुख हो गयी. इससे तात्कालिक तौर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था संकट से उबर सकी.
लेकिन, उसके बाद यह मुद्रा व्यवस्था कई उतार-चढ़ाव के बाद हाल में सब-प्राइम संकट के मुकाम तक पहुंची. इसका पटाक्षेप 15 सितंबर, 2008 को लेमैन ब्रदर्स जैसी बड़ी वित्तीय संस्था के बंद होने के रूप में हुआ. प्रचलित मुद्रा निर्माण, नियंत्रण और प्रबंधन हमेशा से आलोचना का विषय रहा है. आलोचना के मुख्य बिंदुओं में मुद्रा निर्माण पर समुचित नियंत्रण का अभाव, मुद्रा के प्रवाह का लेखा-जोखा न रख पाना, जिससे समानांतर अर्थव्यवस्था का चलते रहना, मुद्रा के अराजक उपयोग से विलासितापूर्ण जीवनयापन, समावेशी अर्थव्यवस्था की स्थापना का अभाव आदि शामिल है.
यह विषय अर्थशास्त्रियों के लिए हमेशा से शोध का विषय रहा है. आज का युग तकनीकी युग है. तकनीकी विशेषज्ञों की नजर भी इस विषय पर लगातार बनी रही है. इसी परिदृश्य में टेक्नोलॉजी ने हाल के वर्षों में सदियों से प्रचलित करेंसी के विकल्प के रूप में क्रिप्टोकरेंसी (कूटमुद्रा) की अवधारणा रखी है.
आज प्रचलित कुछ कूटमुद्राओं के नाम हैं- ब्लैक क्वाॅइन, डैश, बिटक्वाॅइन आदि, जिसमें सबसे ज्यादा प्रचलित है बिटक्वॉइन. कूटमुद्रा के पैरोकारों का कहना है कि यह मुद्रा परंपरागत मुद्रा के सारे अवगुणों से मुक्त है. लेमैन ब्रदर्स के बंद होने के कुछ एक महीने बाद 31 अक्तूबर, 2008 को किसी सतोशी नाकामोतो नाम के व्यक्ति, जिसका पता अब तक नहीं लगाया जा सका है, ने बिटक्वाॅइन नामक कूटमुद्रा की अवधारणा इ-मेल के माध्यम से कुछ लोगों के सम्मुख रखी. शुरुआती संशय के साथ इस कूटमुद्रा की स्वीकार्यता बढ़ती गयी है.
खबर है कि हाल की घटनाओं के फलस्वरूप देश में बिटक्वॉइन प्रीमियम पर बिके. जैसी खबर है, हाल ही में चीन में उसकी मुद्रा के कमजोर पड़ने के चलते बिटक्वाॅइन की मांग और प्रीमियम बढ़ गये. एक समय था, जब लोगों ने घोषणा कर दी थी कि अब बिटक्वाॅइन मर चुका है. लेकिन, इस कैलेंडर वर्ष में पूरी दुनिया में दिन-प्रतिदिन बिटक्वाॅइन लेन-देन लगातार बढ़ रहा है. बिटक्वाॅइन डेबिट कार्ड भी अस्तित्व में आ चुका है. बड़ी-बड़ी वित्तीय कंपनियां बिटक्वाॅइन रिसर्च पर पैसा लगा रही हैं. लेकिन, दुनियाभर की सरकारें और केंद्रीय बैंक इस मुद्रा को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं, क्योंकि यह कूटमुद्रा प्रचलित मुद्रा प्रबंधन में किसी केंद्रीय अथॉरिटी की भूमिका को ही नकारता है. इसके पैरोकारों के अनुसार यह एक तरह से डिसेंट्रलाइज्ड व्यवस्था के अंतर्गत काम करता है.
प्रचलित मुद्रा व्यवस्था केंद्रीय अथॉरिटी के हाथ में निहित ट्रस्ट के बल पर चलता है, लेकिन समय-समय पर आनेवाले वित्तीय संकटों से लोगों में इस ट्रस्ट के प्रति भरोसा डगमगाता रहता है. कूटमुद्रा, जैसा कि इसको प्रतिपादित करनेवाले लोग कहते हैं, अपने विकेंद्रीकृत नेटवर्क से इस ‘ट्रस्ट’ से मुक्त व्यवस्था में लोगों का भरोसा बनाये रखने का प्रबंध किये हुए है. ऐसा कहा जाता है कि यह कूटमुद्रा अपनी ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी के माध्यम से किसी भी तरह की जालसाजी से मुक्त है. कूटमुद्रा अपने पब्लिक लेजर के माध्यम से हर प्रकार के लेन-देन पर नजर रखता है, जिससे कालेधन के निर्माण पर नियंत्रण किया जा सकता है. कूटमुद्रा के समर्थकों के अनुसार, यह मुद्रा अतिक्रमण न किये जा सकनेवाले अल्गोरिद्म पर आधारित है, न कि मानव-संचालित बड़ी संस्थाओं द्वारा, जो मानवीय भूल या लालच से ग्रस्त होते रहे हैं.
कूटमुद्रा, जैसा कि इसके समर्थक कहते हैं, वित्तीय समावेशन में भी बहुत उपयोगी है. ऐसे लोग जो दूरदराज इलाकों में बैठे हैं और बैंक जहां नहीं पहुंच पाता है, बिटक्वाॅइन जैसी कूटमुद्रा ने सफलता की कई कहानियां रची हैं.
एक टीवी इंटरव्यू में बिटक्वाॅइन पर पूछे गये एक सवाल के जवाब में भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि कूटमुद्राओं के उद्भव पर नजर रखी जा रही है. उन्होंने कहा कि इस प्रकार के मुद्रा को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं तो हैं ही, इन मुद्राओं के मान में अस्थिरता भी एक विचारणीय विषय है. उन्होंने यह भी कहा कि अर्थव्यवस्थाओं का लक्ष्य नकदविहीन व्यवस्था है और ऐसी टेक्नोलॉजी को भविष्य में अपनाना पड़ सकता है, जिसमें दस-बीस साल लग सकते हैं. फिलहाल वर्तमान में यही कार्य क्रेडिट कार्ड कर रहे हैं.
टेक्नोलॉजी में लगातार नयी अवधारणाओं का जन्म हो रहा है. अभिनव तकनीकी विकास के कारण ही फिल्म फोटोग्राफी इतिहास बन गयी. नयी तकनीकी विकास के कारण पुस्तकों के प्रकाशन और पढ़ने का ढंग बदल रहा है. इसी तरह वित्तीय टेक्नोलॉजी क्षेत्र में अभिनव प्रयोग के कारण कूटमुद्रा का जन्म हुआ है.
हो सकता है निकट भविष्य इन्हीं कूटमुद्राओं का हो. लेकिन, लगता है अर्थ और वित्त विशेषज्ञ इस अभिनव विकास को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं. समय की मांग है कि टेक्नोलॉजी, अर्थ-वित्त, विधि विशेषज्ञ और वित्त प्रशासक अभी से एक सर्वस्वीकार्य कूटमुद्रा के लिए रास्ता तैयार करें.
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