नतीजों पर समझ बनाना जरूरी

Updated at : 29 Nov 2016 6:41 AM (IST)
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नतीजों पर समझ बनाना जरूरी

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया फ्रांसीसी नेता जिस्कार्द दे’एस्तेंग के बारे में कहा जाता है कि वे एक यूरोपीय संघ के विचार से बेहद उत्साहित थे, परंतु उसके विवरण से उन्हें बड़ी ऊब हुई थी. मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि ऐसी मनोवृत्ति मौजूदा भारत सरकार द्वारा उठाये गये ज्यादातर कदमों में भी […]

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आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
फ्रांसीसी नेता जिस्कार्द दे’एस्तेंग के बारे में कहा जाता है कि वे एक यूरोपीय संघ के विचार से बेहद उत्साहित थे, परंतु उसके विवरण से उन्हें बड़ी ऊब हुई थी. मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि ऐसी मनोवृत्ति मौजूदा भारत सरकार द्वारा उठाये गये ज्यादातर कदमों में भी पायी जा सकती है.
कालेधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किये गये जोरदार कुठाराघात के बाद दो सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है. इस संदर्भ में यहां पर दो बातों को स्वीकार करना उचित होगा. पहली बात यह है कि नोटबंदी के इस निर्णय से देशभर में आम जनता को हो रही असुविधा के बावजूद नरेंद्र मोदी की व्यापक लोकप्रियता बनी हुई है. और दूसरी बात यह है कि नकदी की कमी के कारण पैदा हुई आर्थिक समस्या के ढेर सारे सबूत रिपोर्टों के जरिये जमा हो रहे हैं.
सभी रिपोर्टें एक जैसी ही हैं, चाहे वे सूरत से आ रही हों या फिर लुधियाना से या मुरादाबाद से या देश के किसी भी हिस्से से आ रही हों. मैनुफैक्चरिंग के सभी केंद्रों में हालात एक समान हैं. इन रिपोर्टों में या तो इकाइयों की अपनी क्षमता से कम काम करने का उल्लेख है, या मांग की कमी के कारण वे इकाइयां बंद होने के कगार पर हैं, या नकदी के अभाव के कारण उनके पास कच्चे माल की उपलब्धता नहीं है. इकाइयां अपने यहां श्रमिकों को काम पर रखने में भी संकोच कर रही हैं, और प्रवासी मजदूरों की छंटनी हो रही है या कुछ समय के लिए उन्हें घर वापस जाने के लिए कहा जा रहा है. फिलहाल तो इस संबंध में हमें समुचित आंकड़ों के आने का इंतजार करना होगा, लेकिन कही-सुनी जा रही रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि बड़े स्तर पर कुछ घटित हो रहा है, जिससे अगले महीने और अगले साल कुछ मुश्किलें जरूर खड़ी हो सकती हैं.
जान-बूझ कर पैदा की गयी अनिश्चितता के बावजूद नरेंद्र मोदी के लिए समर्थन को कैसे विश्लेषित किया जा सकता है. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि उनकी लोकप्रियता व्यापक है.
चूंकि वर्तमान समय में मोदी सरकार का तकरीबन आधा कार्यकाल भी पूरा हो चुका है, तो यह उनकी लोकप्रियता पर विचार प्रासंगिक है. अभी तक के मोदी के कार्यकाल की विशिष्टता यह है कि उन्होंने शानदार योजनाएं शुरू की हैं और बड़ी-बड़ी घोषणाएं की हैं. ये योजनाएं और घोषणाएं देश के मानस को तो प्रभावित करती ही हैं, अपनी तरफ मीडिया का ध्यान भी खींचती हैं.
अब जरा मोदी सरकार की कुछ योजनाओं और पहलों की बात करते हैं. मेक इन इंडिया, बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी वगैरह- मोदी की इन योजनाओं और अन्य दूसरी पहलों में एक साझा पैटर्न है. वे अतीत से एक बड़े विच्छेद का प्रतिनिधित्व करती हैं. वे पुराने और पतनशील को हटा कर उनकी जगह नयी और बेहतर चीजें लाने का वादा करती हैं.
लेकिन, सवाल उठता है कि क्या उन्होंने इस वादे को किसी हद तक पूरा किया है? इसके असली नतीजे क्या हैं? यह तो हमें बाद में ही पता चल सकेगा. पहले एक उदाहरण पर नजर डालते हैं.
उड़ी में हमले के बाद किये गये सर्जिकल स्ट्राइक का मतलब नियंत्रण रेखा के उस पार से की जा रही हिंसा का जवाब देना था. मीडिया में आयी खबरों के मुताबिक, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय सेना के 20 सैनिक शहीद हो चुके हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि आम तौर पर युद्धविराम के तहत अपेक्षाकृत शांत रहनेवाली नियंत्रण रेखा पर स्थिति सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से बेहद तनावपूर्ण हो गयी है.
अब रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर यह कह रहे हैं कि युद्ध विराम फिर से काम कर रहा है, लेकिन इसी बीच 20 भारतीय मारे जा चुके हैं. तो, क्या सर्जिकल स्ट्राइक एक अच्छा निर्णय था? इस सवाल का किसी भी तरह से जवाब देना राष्ट्र-विरोधी है, सिवाय एक के, इसलिए इस सवाल को यहीं पर छोड़ देना ही ठीक है. फिर भी, मैं इतना जरूर कहूंगा कि एक भारतीय सैनिक पूजा जाता है और उसकी शहादत अपेक्षित होती है. एक सैनिक के योगदान के प्रति हमारे अंदर सिर्फ एक सम्मान भर है और उसकी जिंदगी के प्रति कोई वास्तविक आदर नहीं है.
फायदे और नुकसान के बारे में किसी निश्चितता के बगैर बड़ी घोषणा करने का सिलसिला कई अन्य घोषणाओं में भी देखा जा सकता है. कालेधन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक के असली असर को सामने आने में तो अभी कुछ अधिक लंबा समय लगेगा, परंतु बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के बारे में क्या कहा जाये, जिस पर करीब एक लाख करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं?
कूटनीतिक ऊर्जा और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत प्रभाव को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में जगह पाने के लिए खर्च किये जाने के बारे में क्या कहा जाये?
क्या अपेक्षित गंभीरता से परिणामों का विश्लेषण किया गया है? मैं इन घोषणाओं और योजनाओं के उद्देश्यों पर सवाल नहीं उठा रहा हूं, और मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सरकार का इरादा नेक है. मैं सिर्फ यह जानने के लिए उत्सुक हूं कि पहले गोली दागने और बाद में निशाना लगाने को लेकर जो मेरी आशंका है, क्या वह निराधार है?
नरेंद्र मोदी हमारे सबसे भरोसेमंद राजनेता हैं.
कोई और नेता ऐसी मुश्किलों के बीच इतने विश्वास के साथ देश का नेतृत्व नहीं कर सकता था. मोदी सरकार के कार्यकाल के अभी बचे हुए ढाई सालों में भी वे लोकप्रिय बने रहेंगे तथा साल 2019 में उन्हें पराजित कर पाना बहुत कठिन होगा. क्योंकि, अगले आम चुनाव से पहले उनके कई कामों के नतीजे सामने आ चुके होंगे. और, मैं उनके लिए और हम सभी के लिए यही उम्मीद करता हूं कि विवरणों में भी उनकी उतनी ही दिलचस्पी है, जितनी वे बड़े विचारों को लेकर उत्साहित हैं.
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