बख्शे नहीं जायेंगे दोषी!

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार दोषियों की कौम भी एक अजीब कौम है. सरकार द्वारा उन्हें कभी बख्शा नहीं जाता, फिर भी वे खूब फलते-फूलते रहते हैं और नित नये कांड किये चले जाते हैं. जितना ही ज्यादा उन्हें बख्शा नहीं जाता, उतना ही ज्यादा वे सिर उठाये मिलते हैं. इधर सरकार द्वारा उन्हें बख्शा […]
डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
दोषियों की कौम भी एक अजीब कौम है. सरकार द्वारा उन्हें कभी बख्शा नहीं जाता, फिर भी वे खूब फलते-फूलते रहते हैं और नित नये कांड किये चले जाते हैं. जितना ही ज्यादा उन्हें बख्शा नहीं जाता, उतना ही ज्यादा वे सिर उठाये मिलते हैं. इधर सरकार द्वारा उन्हें बख्शा न जाकर चैन की सांस ली भी नहीं गयी होती, कि वे फिर से बख्शे न जाने के लिए तैयार खड़े मिलते है. रक्तबीज की तरह उनके रक्त की बूंदें भी जमीन पर गिर कर उतने और दोषी पैदा तो नहीं कर देतीं? वरना बख्शे न जाने के बावजूद फिर से बख्शे न जाने के लिए इतने दोषी आ कहां से जाते हैं? बशीर बद्र के शब्दों में कहूं तो- शिद्दत की धूप, तेज हवाओं के बावजूद वे कभी-कभार शाख से भले गिर जायें, नजर से, वह भी सरकार की, कभी नहीं गिरते.
नोटबंदी का निर्णय इतनी तैयारी और सोच-विचार के बाद लिया गया कि कदम-कदम पर लगता रहा कि बिना किसी तैयारी और सोच-विचार के लिया गया है. दुर्भाग्य से उसमें भी बहुत-से दोषी निकल आये, जो उसे सही तरह से लागू नहीं होने दे रहे. सुनते हैं कि लंबी लाइन देख कर आगे घुसने की कोशिश कर रहा एक आदमी जब किसी तरह सफल नहीं हुआ, तो उसने यह कह कर सबको दहला दिया कि या तो मुझे लाइन में आगे खड़ा होने दो, वरना मैं अगली बार भी मोदी को ही वोट दे दूंगा. सबने घबरा कर उसे फौरन आगे लगा लिया.
एक ग्रामीण अपनी लड़की की शादी का कार्ड लेकर ढाई लाख रुपये लेने बैंक पहुंच गया, तो बैंक वालों के लिए उसे यह समझाना मुश्किल हो गया कि पैसा लेने के लिए बैंक में खाता और उसमें उतना पैसा भी होना चाहिए. वह बार-बार यही कहता रहा कि मोदी तो जनता को पैसा दे रहे हैं, तुम बैंक वाले ही रोड़े अटकाते हो. कुछ समय पहले बहुत-से लोग मोदी जी द्वारा विदेशों से लाये गये कालेधन के अपने-अपने हिस्से के पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये लेने भी इसी तरह बैंक पहुंच गये थे. जनधन खातों के माध्यम से अपना कालाधन सफेद करने के लिए भी बहुत-से दोषी तत्पर हो गये. सरकार ने उनके लिए भी कहा तो है कि उन्हें बख्शा नहीं जायेगा.
रेल हमारा सबसे बड़ा और प्यारा उद्योग है. सरकार के घर-घर शौचालय बनाने के संकल्प को रेलवे जितना सपोर्ट दे रहा है, उतना कोई और उद्योग नहीं. ‘रहने को घर नहीं है, सारा जहां हमारा’ वाले गाने में बेघर लोगों के लिए जिस ‘सारे जहां’ का संकेत किया गया है, वह असल में रेल की पटरियां ही हैं, जिनसे लोग शौचालय का भी काम लेते हैं और जरूरत पड़ने पर संसार से रुखसत होने का भी. हमारी दूरदर्शी सरकार बड़े काम पहले करती है, छोटे बाद में, जिस तरह नोटबंदी के बाद दो हजार का नोट पहले जारी किया और पांच सौ का बाद में. उसी तरह शौचालय पहले बनवा रही है, घर बाद में बनते रहेंगे.वैसे ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के संकल्प के बाद इतने शौचालय बनवाये किसलिए जा रहे हैं, समझना थोड़ा कठिन है.
सरकार रेल को सफल बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील दिखती है. पटरी पर तो रेल सभी देशों में चलती है, उसे जमीन पर चलाने के प्रयोग सिर्फ हमारे यहां ही होते हैं. किराया बढ़ा कर उसे हवाई जहाज जैसा रुतबा दिलाने के बाद देश में बुलेट ट्रेन के आने से पहले साधारण रेल को ही बुलेट ट्रेन की तरह चलाने के प्रयास में कानपुर-जैसे हादसे हो जायें, तो भला किसका दोष! और अगर किसी का है भी, तो उसे बख्शा नहीं जायेगा! रेलमंत्री ने यह साफ कह दिया है.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




