परीक्षा का व्हॉट्सएप्प युग

प्रभात रंजन कथाकार मेरी कक्षा के एक विद्यार्थी का मैसेज आया- ‘सर, व्हाॅट्सएप्प पर कुछ इम्पोर्टेंट क्वेश्चन भेज दीजिये न, परसों पेपर है’. आजकल दिल्ली विश्वविद्यालय में परीक्षाओं का मौसम है. हर सेमेस्टर के अंत में एक परीक्षा होती है, जिसके बाद विद्यार्थी अगले सेमेस्टर में पहुंच जाता है. बिहार, झारखंड, यूपी के विद्यार्थी आज […]
प्रभात रंजन
कथाकार
मेरी कक्षा के एक विद्यार्थी का मैसेज आया- ‘सर, व्हाॅट्सएप्प पर कुछ इम्पोर्टेंट क्वेश्चन भेज दीजिये न, परसों पेपर है’. आजकल दिल्ली विश्वविद्यालय में परीक्षाओं का मौसम है. हर सेमेस्टर के अंत में एक परीक्षा होती है, जिसके बाद विद्यार्थी अगले सेमेस्टर में पहुंच जाता है. बिहार, झारखंड, यूपी के विद्यार्थी आज भी बड़े पैमाने पर दिल्ली विवि में पढ़ने का सपना संजोते हैं. यहां परीक्षाओं के मौसम का हमेशा से एक अलग मिजाज रहा है.
जब हम लोग दिल्ली विवि के विद्यार्थी थे, तब लाइब्रेरी का युग था. हम कॉलेज लाइब्रेरी में बैठे रहते थे और एक-एक प्रश्न के नोट्स तैयार करने के लिए न जाने कितनी किताबों से संपर्क करते थे. मुझे याद है कि अध्यापक को हमारे नोट्स पढ़ते हुए यदि लग जाता था कि हमने गाइड या गाइडनुमा किताबों से किसी तरह की मदद ली है, तो वे बहुत नाराज होते थे. हिंदू कॉलेज में मेरे अध्यापक कृष्णदत्त पालीवाल बार-बार यह कहते थे कि शिक्षा का उद्देश्य मौलिकता का विकास होता है. पढ़ो सबकी, लेकिन निष्कर्ष अपने दो- तुम नवीन कल्पना करो! उस जमाने की शिक्षा ने मेरे अंदर साहित्य की जमीन पुख्ता की.
परीक्षा और लाइब्रेरी का वह दौर फोटोस्टेट के दौर में बदल गया. लाइब्रेरी गये, किताब उठायी और बाहर से फोटोस्टेट करवा कर किताब को वापस कर दिया. परीक्षाओं के मौसम में विवि-कॉलेजों में सबसे अधिक भीड़ फोटोस्टेट की दुकानों के आसपास ही होती थी. इम्पोर्टेंट सवालों के जवाब बच्चे फोटोस्टेट में लेकर आते थे और परीक्षाओं के शुरू होने से कुछ देर पहले तक पढ़ते रहते थे, बाद में वहीं छोड़ कर चले जाते थे. हर साल परीक्षाओं के बाद कॉलेज में बड़ा अंबार इन्हीं इम्पोर्टेंट जवाबों के पन्नों का लग जाता था.
अब व्हाॅट्सएप्प, स्मार्टफोन युग है.
इंटरनेट की सुविधा जैसे-जैसे सहज होती जा रही है, परीक्षा की तैयारी नेट के माध्यम से की जाने लगी है. आज ऐसे विद्यार्थी कम ही मिलते हैं, जो यह पूछें कि सर फलां विषय के लिए लाइब्रेरी में जाकर कौन सी किताब पढ़ लूं या सवाल का जवाब किस किताब में मिल जायेगा. हैरानी होती है कि आज बच्चों को अपनी पाठ्य-पुस्तकों के नाम भी नहीं पता होते. लेकिन, वे सारी सामग्री इंटरनेट से जुटा लेते हैं. फिर उसके लिंक एक-दूसरे से व्हाॅट्सएप्प पर साझा कर लेते हैं. ऐसा नहीं है कि आजकल विद्यार्थी लाइब्रेरी नहीं जाते. वे जाते हैं, लेकिन ज्यादातर वहां लगे कंप्यूटरों में इंटरनेट की मुफ्त सुविधा के इस्तेमाल के लिए जाते हैं.
असल में यह परीक्षा का ही नहीं, बल्कि शिक्षा का भी व्हाॅट्सएप्प युग चल रहा है. मेरी बेटी भी जिस दिन स्कूल नहीं जाती है, उस दिन अपने किसी सहपाठी से उस दिन के होमवर्क मंगा लेती है. दिल्ली के स्कूलों में चौथी और पांचवीं से अलग-अलग क्लास के बच्चों का अपना व्हाॅट्सएप्प ग्रुप बन जाता है, जो पढ़ाई के साथ-साथ जरूरी जानकारियों के आदान-प्रदान का मंच बन जाता है.
तकनीक हमें सुविधा और सहूलियत देती है. लेकिन, जब हम किताब पढ़ते हैं, तो जरूरी सवाल के आगे-पीछे के संदर्भों से भी परिचित हो जाते हैं. व्हाॅट्सएप्प के माध्यम से इम्पोर्टेंट की जानकारी तो हो जाती है, लेकिन किसी विषय का ज्ञान नहीं हो पाता. आजकल आमतौर पर यह देखने में आ रहा है कि बहुत अधिक अंक लेकर पास होनेवाले विद्यार्थियों का सामान्य ज्ञान अक्सर कमजोर होता है.
बहरहाल, सोचते-विचारते मैंने उस विद्यार्थी को व्हाॅट्सएप्प पर इम्पोर्टेंट सवाल भेज दिये हैं. साथ में शुभकामना भी!
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