शराब की लत पर लगाम

Updated at : 28 Oct 2016 6:28 AM (IST)
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शराब की लत पर लगाम

दिल्ली सरकार ने शराब की लत और शराबियों की उदंडता पर लगाम के इरादे से आबकारी नियमों को कठोरता से लागू करने की घोषणा की है. दिल्ली में अब खुले में शराब पीने पर पांच हजार और नशे में उपद्रव करने पर दस हजार रुपये के आर्थिक दंड तथा तीन महीने की कैद हो सकती […]

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दिल्ली सरकार ने शराब की लत और शराबियों की उदंडता पर लगाम के इरादे से आबकारी नियमों को कठोरता से लागू करने की घोषणा की है. दिल्ली में अब खुले में शराब पीने पर पांच हजार और नशे में उपद्रव करने पर दस हजार रुपये के आर्थिक दंड तथा तीन महीने की कैद हो सकती है. शराब पीने के लिएजगह मुहैया करानेवाले दुकानदार या मकान मालिक को 50 हजार रुपये का जुर्माना और छह महीने की जेल हो सकती है.
इससे पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस वर्ष शराब की नयी दुकान नहीं खोलने तथा मौजूदा दुकानों से लोगों को परेशानी होने पर उन्हें बंद करने की सिफारिश करने के लिए मोहल्ला सभाओं को अधिकार देने का निर्णय किया था. स्पष्ट है, बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा की गयी शराबबंदी की पहल के उत्साहवर्द्धक नतीजों तथा जनता के भरपूर समर्थन का सकारात्मक असर अब कई राज्यों में दिख रहा है. खुद नीतीश ने भी पूरे देश में शराबबंदी की जरूरत पर जोर दिया है. तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा था और प्रमुख दलों को शराब की उपलब्धता तथा उपभोग सीमित करने की जरूरत का उल्लेख अपने-अपने घोषणापत्रों में करना पड़ा था. फिर से सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री जयललिता ने चरणबद्ध शराबबंदी के वादे को पूरा करने के क्रम में जून में शराब की 500 सरकारी दुकानों को बंद कर दिया था.
साथ ही सरकारी दुकानों के खुलने के समय में भी कटौती कर दी थी. उधर, केरल में शराब की सरकारी दुकानों की संख्या में क्रमिक रूप से कमी करने के पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को उलट देने के बाद हुए जोरदार विरोध के कारण मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को नयी आबकारी नीति बनाने की पहल करनी पड़ी है. शराबबंदी की मांग कई अन्य राज्यों में भी नागरिक संगठनों और समुदायों, खासकर महिलाओं, द्वारा लगातार हो रही है.
शराब के दुष्परिणामों की जानकारी तो सरकारों और समाजों को लंबे समय से है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और राजस्व के लोभ के चलते सरकारें ठोस निर्णय लेने से कतराती रही थीं. ऐसे में बिहार में शराबबंदी की पहल ने इस मुद्दे को देशव्यापी बहस का विषय बना दिया है.
बिहार के उदाहरण ने सबक दिया है कि सरकारों को शराब से होनेवाली आय के फेर में इसके भयानक दुष्परिणामों से नजर नहीं चुराना चाहिए. अध्ययनों के अनुसार, 1992 से 2012 के बीच देश में प्रति व्यक्ति शराब का उपभोग 55 फीसदी बढ़ा है, जो दुनिया में तीसरी सबसे तेज वृद्धि है. शराब की लत न सिर्फ सामाजिक बुराइयों और आपराधिक कृत्यों का कारण हैं, बल्कि व्यक्ति और परिवार को बर्बाद भी करती है. इसलिए शराब पर नियंत्रण के हर उपाय का स्वागत होना चाहिए.
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