मुस्कुराइये जनाब!

Updated at : 04 Oct 2016 6:30 AM (IST)
विज्ञापन
मुस्कुराइये जनाब!

गिरींद्र नाथ झा ब्लॉगर एवं किसान इंटरनेट ने जिस तेजी से हमारी जिंदगी में पैठ बनायी है, उससे आभास होता है कि हम अभी और इसके भीतर भटकेंगे. हम बोलचाल की भाषा में तकनीकी शब्दों का बखूबी इस्तेमाल करने लगे हैं और यही वजह है कि इंटरनेट की बनायी आभासी दुनिया में हम आराम से […]

विज्ञापन

गिरींद्र नाथ झा

ब्लॉगर एवं किसान

इंटरनेट ने जिस तेजी से हमारी जिंदगी में पैठ बनायी है, उससे आभास होता है कि हम अभी और इसके भीतर भटकेंगे. हम बोलचाल की भाषा में तकनीकी शब्दों का बखूबी इस्तेमाल करने लगे हैं और यही वजह है कि इंटरनेट की बनायी आभासी दुनिया में हम आराम से घुल-मिल चुके हैं. गांव-घर का चौपाल हो या फिर शहर के चौक-चौराहे, ये सब भी वर्चुअल होने लगे हैं. मानो ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ ने असल जिंदगी पर वर्चस्व कायम कर लिया हो.

मेरा मानना है कि हम लोगों को इंटरनेट के प्रयोग की आदत जब से पड़ी है, तब से ही मन की दीवार छोटी पड़ने लगी है और लगता है कि कभी भी यह दीवार टूट सकती है. यह सोच कर अच्छा भी लगता है कि हम सभी विस्तार के लिए पुरानी सीमाओं को तोड़ रहे हैं.

इस दुनिया में गोता लगाते हुए ऐसा लगता है मानो मैं यहां सदियों से भटक रहा हूं. सारे चेहरे परिचित नजर आते हैं. जब गांव से दूर था, तब इसी के जरिये अपनी अंचल की यादों की पोटली खोला करता था. सच पूछिये तो शुरुआत से ही रेडिफ, याहू, हॉट मेल और फिर अब जीमेल, फेसबुक, ट्विटर से यारी कभी महंगी नहीं पड़ी. सब एक-दूसरे से जुड़ते चले गये और मेरे ‘मैं’ का विस्तार होता चला गया. कबीर कहते हैं न- ‘बिन धरती एक मंडल दीसे, बिन सरोवर जूं पानी रे। गगन मंडलू में होए उजियाला, बोल गुरु-मुख बानी हो जी…।।’

सोशल साइट्स मेरे लिए कबीर रच रहे हैं, गुलजार बो रहे हैं. और तो और, कुछ रेणु के बीज भी बो रहे हैं. ऐसे में मुझे यह दुनिया भी किसानी लगती है और आभासी दुनिया में भी मैं काश्तकार बन जाता हूं, जो मेरा मूल है.

ऑरकुट के दोस्त फेसबुक के प्लेटफॉर्म पर कॉमन हो गये, तो जिले के पड़ोसी-संबंधी यहां और भी करीबी बन गये. व्हाॅट्सएप्प की दुनिया हमें चिट्ठी-पतरी वाले दिनों में लेकर चली जाती है. यहां बेबाक होकर हम एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, प्रेम करते हैं, मानो बनारस के किसी घाट पर पं छन्नू लाल मिश्रा गा रहे हों- नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी/ पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी……

सोशल साइट्स पर दोस्तों को एकजुट करने में उम्र कभी बाधा नहीं बनी. 70 साल के राधेश्याम वर्मा भी फ्रेंड लिस्ट में हैं, तो 14 साल का नितिन भी. राधेश्याम जी किताबों पर चर्चा करते हैं, तो नीतिन फिल्मों पर बात करता है. हरी बत्ती जलते देख (चैट) सब एक हो जाते हैं.

बातचीत औपचारिक से कब आत्मीय हो जाती है, पता ही नहीं चलता.

अक्सर फेसबुक के चौराहे पर कई लोग टकराते हैं. ऐसे अवसरों पर लगता है मानो यह कोई स्टेज हो, जहां सब हर दिन सज-धज के आते हैं और अपने किरदार को निभा कर निकल जाते हैं, अपने घर की ओर. और मैं, इन सब में अपना चेहरा खोजने जुट जाता हूं. तभी पर्दे के पीछे से रबींद्र नाथ टैगोर के शब्द गूंजने लगते हैं- विश्वरूपेर खेलाघरे/ कतई गेलेम खेले/ आपरूप के देखे गेलेम/ दुटि नयन मेले…/ जाबार दिने…हमने कभी भी इस दुनिया को आभासी नहीं माना, और न ही ख्वाब. हम इसमें भी एक शहर बसाते हैं, एक चौक तैयार करते हैं.

ऐसे लोगों से और करीब आते हैं, जिससे मन की बातें थोक के भाव में कर सकें, जिन्हें ड्राइंगरूम में बुला कर अच्छी चाय पिला सकें. सब अपने हैं यहां, कोई भी पराया नहीं है. आइये, आप भी मेरे गांव के खेतों की दुनिया की तरह फेसबुक के आंगन में दाखिल हो जाइये. आइये कुछ बात करते हैं, कुछ कहानियां गढ़ते हैं, कुछ गीत गाते हैं. बस इतना ध्यान रहे, आभासी दुनिया हमारी असल दुनिया पर हावी न होने पाये.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola