बोलियों से हिंदी को खतरा!

Updated at : 29 Sep 2016 6:13 AM (IST)
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बोलियों से हिंदी को खतरा!

प्रभात रंजन कथाकार अभी हाल में ही फेसबुक पर मुझे किसी ने मित्रता निवेदन भेजा. लिखा था- हिंदी बचाओ मंच. पहले मुझे लगा कि हिंदी पखवाड़ा चल रहा है. इस दौरान हिंदी को लेकर लोगों की भावुकता चरम पर होती है. ऐसा ही कोई मंच होगा. उत्सुकतावश जब मैं उस मंच के फेसबुक पेज पर […]

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प्रभात रंजन

कथाकार

अभी हाल में ही फेसबुक पर मुझे किसी ने मित्रता निवेदन भेजा. लिखा था- हिंदी बचाओ मंच. पहले मुझे लगा कि हिंदी पखवाड़ा चल रहा है. इस दौरान हिंदी को लेकर लोगों की भावुकता चरम पर होती है. ऐसा ही कोई मंच होगा.

उत्सुकतावश जब मैं उस मंच के फेसबुक पेज पर गया, तो देखा, वहां लिखा हुआ था कि बोलियों को अगर आठवीं अनुसूची में मान्यता मिल गयी, तो इससे हिंदी कमजोर हो जायेगी. गोया हिंदी कोई सर्वसत्तावादी तानाशाह हो और हिंदी पट्टियांे की बोलियां उसकी रियाया. यह बहस तब से तेज हुई है, जब से भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में जगह देने की मांग उठी है. समय-समय पर विद्वान लिखते रहते हैं कि हिंदी बोलियों को अपनी यथास्थिति को बनाये रखना चाहिए. वे याद दिलाते हैं कि हिंदी अपनी 12-13 बोलियों की राष्ट्रीय प्रतिनिधि के रूप में काम कर रही है. बोलियों को उसके नेतृत्व के ऊपर सवाल नहीं उठाना चाहिए, बल्कि उनको हिंदी को मजबूत करने की दिशा में काम करना चाहिए.

हिंदी बचाओ की बात करनेवाले विद्वान इस बात को भूल जाते हैं कि जिसे हिंदी कहा जाता है, वह भी एक बोली ही थी- खड़ी बोली. सत्ता केंद्रों के आसपास बोली जानेवाली इस बोली को हिंदी भाषा के रूप में मान्यता दे दी गयी. आज हिंदी का प्रयोग, इसका विस्तार काफी हद तक हो चुका है.

ऐसे में किसी और बोली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने, उसको राजभाषा का दर्जा मिल जाने से हिंदी को कैसे खतरा हो सकता है? हम भूल जाते हैं कि कुछ साल पहले मैथिली को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया था. अब इससे हिंदी को क्या खतरा हो गया? 80 के दशक में बिहार में मैथिली भाषा अधिक मजबूत थी.

प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती के लिए होनेवाली परीक्षा में उसको एक विषय के रूप में मान्यता प्राप्त थी. विश्वविद्यालयों में मैथिली पढ़नेवाले विद्यार्थी बड़ी संख्या में थे. लेकिन, तब वह आठवीं अनुसूची की भाषा नहीं थी. हालांकि, आज वह आठवीं अनुसूची की भाषा बन चुकी है, लेकिन न तो प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती परीक्षाओं की भाषा है, न ही विश्वविद्यालयों में पहले की तरह विद्यार्थी उसको पढ़ने आते हैं. यानी, सरकारी मान्यता से कोई भाषा न तो फलती-फूलती है, न ही उसकी जमीन मजबूत होती है. वह तो लोक व्यवहार, रोजगार से ही संभव होता है.

भोजपुरी भले संविधान की आठवीं अनुसूची की भाषा न बन पायी हो, मगर भोजपुरी का अपना सिनेमा उद्योग विकसित है. वह देश के बार भी मॉरिशस, सूरीनाम आदि कई देशों में प्रवासियों के बोलचाल की भाषा है.

कहने का मतलब यह है कि हिंदी की तमाम बोलियों में भोजपुरी एक ऐसी बोली है, जिसका अंतरराष्ट्रीय स्वरूप पहले से ही है. इसके बावजूद उससे हिंदी को कभी कोई खतरा नहीं रहा है. अगर आठवीं अनुसूची में उसको मान्यता मिल भी गयी, तो इससे हिंदी को क्या खतरा हो जायेगा? यह समझ से परे है. मुझे तो यह लगता है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी की तमाम बोलियों को मान्यता दे दी जानी चाहिए, जिससे वे किसी न किसी रूप में बची रहें. संवैधानिक मान्यता भावनात्मक मुद्दा है. इससे अधिक कुछ नहीं.

हिंदी को खतरा अपनी बोलियों से नहीं है. उस मानसिकता से है, जिसने दशकों से इसे ‘किचेन लैंग्वेज’ बनाये रखा है अर्थात् घरेलू काम करनेवालों से बात करनेवालों की भाषा. हिंदी को असल खतरा उस हीनता ग्रंथि से है, जिसने दशकों से इसे दबाये रखा है.

बोलियां हिंदी को समृद्ध करती हैं, उसको कमजोर नहीं!

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