हद पार करते काटजू
Updated at : 28 Sep 2016 4:59 AM (IST)
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किसी-किसी बच्चे के मुंह से एकदम सयानों जैसी बातें निकलती हैं. ऐसा बच्चा ‘मुझे चांद लाकर दो’ सरीखा बालहठ ना दिखा कर बड़े-बूढ़ों की तरह संयम और धीरज के उपदेश सुनाने लगता है. ऐसे बच्चों के लिए पुरानी काट की हिंदी में एक शब्द चलता था- अकालवृद्ध! अकालवृद्ध जैसा शब्द है, तो उसका विपरीतार्थक शब्द […]
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किसी-किसी बच्चे के मुंह से एकदम सयानों जैसी बातें निकलती हैं. ऐसा बच्चा ‘मुझे चांद लाकर दो’ सरीखा बालहठ ना दिखा कर बड़े-बूढ़ों की तरह संयम और धीरज के उपदेश सुनाने लगता है. ऐसे बच्चों के लिए पुरानी काट की हिंदी में एक शब्द चलता था- अकालवृद्ध!
अकालवृद्ध जैसा शब्द है, तो उसका विपरीतार्थक शब्द भी होगा. ऐसा शब्द प्रचलन में दिखता तो नहीं, लेकिन वह शब्द आपकी नजर में हो, तो उसकी जीती-जागती मिसाल के रूप में मार्केंडेय काटजू का नाम लेना अनुचित ना होगा. कभी सुप्रीम कोर्ट में जज का ओहदा संभालनेवाले काटजू से बेहतर कौन जानता होगा कि सार्वजनिक मर्यादा से विचलन की इक्की-दुक्की घटनाओं को आधार बना कर पूरे समुदाय को दोष देना और उस समुदाय को स्वाभाविक तौर पर किन्हीं कमियों का शिकार करार देना एक फासिस्ट मनोवृत्ति का सूचक है. बिहार के बारे में काटजू का अपमानजनक बयान एक पूरे राजनीतिक समुदाय को स्वभावगत दोषों का शिकार बतानेवाली ऐसी ही मनोवृत्ति की उपज है.
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्था के प्रधान रह चुके काटजू सबसे बेहतर जानते हैं कि जैसे हर अभिव्यक्ति की हद होती है और होनी चाहिए, उसी तरह उपहास की भी हद होती है और होनी चाहिए. काटजू ने अपने फेसबुक पोस्ट में यह कह कर कि ‘हम पाकिस्तान को कश्मीर दे सकते हैं, बशर्ते वह साथ में बिहार भी ले ले’ उपहास की हद को पार करनेवाला मंतव्य जाहिर किया है.
इस पोस्ट से जाहिर होता है कि वे बिहार को अराजक राज का पर्याय समझते हैं और पाकिस्तान में आतंकी जमातों द्वारा फैलाये अराजक राज से उसकी तुलना करना चाहते हैं. इस सोच से पहले बेहतर होता कि वे अपने गृहप्रदेश यूपी के हालात को देख लेते, जहां बलात्कार जैसी जघन्य घटना होने पर नेता दोषियों को सजा दिलवाने की जगह उसमें अपनी सरकार के खिलाफ साजिश सूंघ लेते हैं या फिर हरियाणा की ओर ही पल भर नजर उठाते, जहां मुख्यमंत्री बलात्कार को छोटी-मोटी घटना करार देते हैं और एक समुदाय के विरुद्ध अपनी द्वेषभावना को जाहिर करने के लिए पुलिस को बिरयानी-सुंघवा महकमे में तब्दील कर देते हैं.
अच्छा होगा कि सस्ती लोकप्रियता बटोरने की जगह भारतीय दर्शन के जानकार और मीमांसा के नियमों पर पीएचडी हासिल करनेवाले काटजू आगे से कुछ कहने से पहले भारतीय संतों की इस सीख को याद रखें कि कहीं बुराई देखने से पहले अपने दिल में झांकना चाहिए, क्योंकि जो दिल ढूंढ़ा आपना- मुझ सा बुरा ना कोय!
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