जंगी राष्ट्रवाद का अर्थशास्त्र

Updated at : 26 Sep 2016 6:22 AM (IST)
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जंगी राष्ट्रवाद का अर्थशास्त्र

अिनल रघुराज संपादक, अर्थकाम.काॅम युद्ध है तो जीवन है. भीतर, बाहर. मन में, तन में. लगातार संघर्ष के बीच ही निर्माण होता है. मानव शरीर में अनुमानतः 37.2 लाख करोड़ कोशिकाएं हैं, जिनमें से हर मिनट करीब 9.6 करोड़ कोशिकाएं मर जाती हैं और इतनी ही नयी बन जाती हैं. इसलिए युद्ध से भागना जीवन […]

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अिनल रघुराज
संपादक, अर्थकाम.काॅम
युद्ध है तो जीवन है. भीतर, बाहर. मन में, तन में. लगातार संघर्ष के बीच ही निर्माण होता है. मानव शरीर में अनुमानतः 37.2 लाख करोड़ कोशिकाएं हैं, जिनमें से हर मिनट करीब 9.6 करोड़ कोशिकाएं मर जाती हैं और इतनी ही नयी बन जाती हैं. इसलिए युद्ध से भागना जीवन चक्र से भागना हो सकता है. युद्ध दो तरह के होते हैं. एक युद्ध जीवनदायी होता है, दूसरा युद्ध विनाश की तरफ ले जाता है.
उड़ी के आतंकी हमले के बाद हमारे सामाजिक, राजनीतिक जीवन और मीडिया-सोशल मीडिया में जिस तरह का युद्धोन्माद छाया हुआ है, वह दूसरी तरह का युद्ध है. हमें गुबार से पार जाकर इसका सच समझना होगा. ‘अबकी बार सीमा पार’ और ‘एक दांत के बदले जबड़ा तोड़ देने’ जैसे कई बयान आये हैं. अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार व सेना पूरा संयम बरत रही है.
हमें भी भरपूर संयम बरतते हुए संपूर्ण सच को समझने की कोशिश करनी चाहिए. देश में शहरों, कस्बों, गांवों तक जिस जंगी राष्ट्रवाद की हवा बह रही है, हमें उसके अर्थशास्त्र को समझना पड़ेगा. हालांकि, शहीद जवानों के परिवार को कितना भी सरकारी मुआवजा मिल जाये, उनका अर्थशास्त्र हमेशा के लिए गड़बड़ा गया है. वे मन से टूट गये हैं. उड़ी हमले के तीन दिन बाद कुपवाड़ा में शहीद हवलदार की मां कहती हैं, ‘हमारे बच्चे रोज मर रहे हैं और सरकार 5-10 लाख रुपये देकर हमें भिखारी समझ रही है. मेडल लाने पर खिलाड़ियों को करोड़ों और देश के लिए जान देनेवालों से भिखारियों जैसा सलूक!’
सबसे बड़ी बात उस देश या राष्ट्र के नफे-नुकसान की है, जिसके नाम पर टीवी चैनलों के एंकर गले की नसें तान कर टीआरपी बढ़ाने और सेना के रिटायर्ड अफसर जहर उगल कर हथियार लॉबी के लिए दावेदारी मजबूत करने में लगे हैं. इतना तय है कि भारत जैसी सुदीर्घ परंपरा और विरासत वाले देश में जो राष्ट्रवाद मुसलमानों को गरियाने से शुरू होकर पाकिस्तान के विरोध तक खत्म हो जाता है, वह सच्चा राष्ट्रवाद नहीं हो सकता. यह वो संकीर्ण राष्ट्रवाद है, जिसकी नींव अंगरेज इतिहासकार जेम्स मिल ने 1817 में भारतीय अतीत को हिंदू सभ्यता, मुसलिम सभ्यता और ब्रिटिश काल में बांट कर रखी थी. फिर भी 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में हिंदू-मुसलमान मिल कर लड़े, तो अंगरेजों ने 1872 की जनगणना में पहली बार हिंदुओं को बहुसंख्यक समुदाय और मुसलमानों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दे दिया. इस जहर से आगे जाकर देश बंट गया. लेकिन, राष्ट्र-निर्माण का काम अधूरा रह गया. भारतीय अवाम की वही कसक आज भी विविध रूपों में उभरती रहती है.
हमारा सत्ता प्रतिष्ठान बराबर उस कसक से खेलता है और दुनिया की हथियार लॉबी अट्टहास करती है. भारत-पाकिस्तान की सरकारें फिलहाल युद्ध लड़ने की मूर्खता नहीं करेंगी. हां, इस बहाने सैन्य खर्च को बढ़ाने की जन स्वीकार्यता जरूर बना लेंगी. गौर फरमायें. बुधवार को कैबिनेट ने हरी झंडी दिखाई और शुक्रवार को ही फ्रांस की निजी बहुराष्ट्रीय कंपनी डैसू एविएशन से भारतीय वायुसेना के लिए 36 राफेल लड़ाकू जेट विमान खरीदे गये. यह 59,000 करोड़ रुपये का सौदा है. राफेल की सबसे बड़ी खासियत है कि इससे परमाणु हमला आसानी से किया जा सकता है. यह सौदा 16 साल से लटका पड़ा था.
पिछले ही महीने हमारे रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने वॉशिंगटन जाकर अमेरिका के साथ ऐसी रक्षा संधि पर दस्तखत किये हैं, जिससे अमेरिकी सैनिकों को भारत में ठिकाना बनाने की इजाजत मिल गयी है. कहने को भारत भी अमेरिका के ठिकानों का इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन उसे तो पाकिस्तान और चीन से ही लड़ना है, तो अमेरिका के ठिकाने उसके किस काम आयेंगे. उसी दौरान भारत में अमेरिकी युद्धक विमान एफ-16 बनाने की भी चर्चा उठी. लेकिन, हल्ला मचा कि एफ-16 तो पुराना पड़ चुका है, तो एफ-18 की बात होने लगी. अब अमेरिका अपने एफ-35 और रूस एसयू-35 लड़ाकू विमान भारत को बेचने में जुटा हुआ है.
असल में भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश बना हुआ है. इसलिए अमेरिका से लेकर इजराइल, रूस व यूरोप तक फैली हथियार लॉबी इतने बड़े बाजार को हाथ से नहीं जाने देना चाहती. भारत सरकार ने रक्षा उत्पादन में मेक इन इंडिया पर जाेर दिया और धीरे-धीरे करके इसमें 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की इजाजत दे दी.
लेकिन, यकीन नहीं आता कि मई 2014 के बाद अब तक हमारे रक्षा क्षेत्र में मात्र 1.12 करोड़ रुपये का एफडीआइ आया है. यह जानकारी खुद रक्षा मंत्री ने संसद में दी है, जिसकी एक घंटे की कार्यवाही पर 1.5 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं.
ऐसे में बाहर से हथियार खरीदना भारत की मजबूरी बनी रहेगी. दिक्कत यह है कि हम सिपाहियों के हेलमेट और रात में देखने के उपकरण तक आयात करते हैं. यही वजह है कि हमारा रक्षा बजट बढ़ता जा रहा है. दिसंबर 2001 में संसद पर आतंकी हमले के बाद वित्त वर्ष 2002-03 में हमारा रक्षा बजट 65,000 करोड़ रुपये का था. चालू वित्त वर्ष 2016-17 तक 10.35 प्रतिशत की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ता हुआ यह 2.58 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. वहीं, 2005-06 में कृषि को बजट में 6,361 करोड़ रुपये मिले थे जो 2016-17 में ब्याज सब्सिडी घटाने के बाद 20,984 करोड़ रुपये बनते हैं. इस तरह कृषि को रक्षा खर्च का दसवां हिस्सा ही मिलता रहा है. जय जवान, जय किसान के नारे की यह हकीकत राष्ट्र-निर्माण के बारे में बहुत कुछ कह जाती है.
देश लोगों से बनता है और राष्ट्र बाजार के एकीकरण व विस्तार से. कभी आपस में भयंकर युद्ध करनेवाले यूरोपीय देश डेढ़ दशकों से साझा बाजार ही नहीं, साझा मुद्रा तक अपना चुके हैं. वहीं भारत ने किसानों, दलितों व आदिवासियों के रूप में बहुसंख्यक आबादी को ही उपेक्षित नहीं रखा है, बल्कि बाजार तक को विखंडित रखा है. जीएसटी (वस्तु व सेवा कर) बाजार के इस विखंडन को दूर करेगा और दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) उसे विस्तार देगा. ऐसे ही प्रयासों से राष्ट्र बनेगा, जबकि युद्ध बरबादी और तबाही के अलावा कुछ नहीं देगा.
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