स्वास्थ्य तंत्र है बीमार

मानव विकास के अन्य प्रमुख सूचकांकों की तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी भारत दुनिया के सबसे निचले पायदान पर खड़े देशों में शामिल है. इस सप्ताह लांसेट जर्नल में प्रकाशित एक व्यापक शोध में बताया गया है कि स्वास्थ्य मानकों के आधार पर 188 देशों की सूची में भारत 143वें स्थान पर है. यह […]
मानव विकास के अन्य प्रमुख सूचकांकों की तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी भारत दुनिया के सबसे निचले पायदान पर खड़े देशों में शामिल है. इस सप्ताह लांसेट जर्नल में प्रकाशित एक व्यापक शोध में बताया गया है कि स्वास्थ्य मानकों के आधार पर 188 देशों की सूची में भारत 143वें स्थान पर है.
यह स्वास्थ्य सूचकांक वाशिंगटन विवि के ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज द्वारा भारत समेत दुनियाभर के 1,750 शोधार्थियों के साथ 33 मानकों के तहत किये गये अध्ययन पर आधारित है. यह अपने तरह का पहला सूचकांक है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों में उल्लिखित स्वास्थ्य से जुड़े मसलों का गंभीर अध्ययन किया गया है. संयुक्त राष्ट्र इसी सप्ताह इन लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में हो रहे प्रयासों की समीक्षा कर रहा है.
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत के लिए इस सूचकांक के निष्कर्ष बेहद निराशाजनक हैं. सौ के मानक पर हमारे देश को सिर्फ 42 अंक मिले हैं, जो शीर्ष के देश आइसलैंड की तुलना में आधे से भी कम है. कई मानकों पर तो भारत ब्रिक्स समूह के देशों में सबसे नीचे है. हमारी तुलना में मलयेशिया करीब 100 और श्रीलंका 60 स्थान आगे हैं. भारत इस सूचकांक में लीबिया, इराक, कंबोडिया और म्यांमार से भी बहुत पीछे है. यह अध्ययन हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली तथा केंद्र और राज्य सरकारों की स्वास्थ्य नीति पर एक चिंताजनक टिप्पणी है.
एक तरफ भारत में स्वास्थ्य सेवा उद्योग 100 अरब डॉलर तक हो चुका है और 2020 तक इसके 200 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है, दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव सामान्य बात हो चली है. देश की ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से को तो साधारण इलाज भी मयस्सर नहीं है. यहां कुपोषण, गरीबी, प्राथमिक उपचार का अभाव और सरकारी उपेक्षा के कारण बीमारियों की रोकथाम लगातार मुश्किल होता जा रहा है. देश में स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बहुत कम होने के चलते मौजूदा तंत्र पर दबाव बहुत है, जिसका परिणाम अक्षमता, लापरवाही व भ्रष्टाचार के रूप में सामने आता है.
वर्ष 2015 में प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का रवैया भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के प्रति बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं है. आशा है कि नयी सूचनाओं की रोशनी में केंद्र और राज्य सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से सुधार के लिए ठोस पहलों की ओर उन्मुख होंगी.
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