जो करना है कर ही डालो

Updated at : 23 Sep 2016 6:01 AM (IST)
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जो करना है कर ही डालो

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार आदमी मूलत: दो तरह के पाये जाते हैं. एक वे, जो कुछ करते हैं और दूसरे वे, जो कुछ नहीं करते. जो कुछ करते हैं, वे जिंदगी भर करते ही रह जाते हैं, कर कुछ नहीं पाते. जो कुछ नहीं करते, वे न करके भी बहुत-कुछ कर लेते हैं. करनेवाले […]

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डॉ सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

आदमी मूलत: दो तरह के पाये जाते हैं. एक वे, जो कुछ करते हैं और दूसरे वे, जो कुछ नहीं करते. जो कुछ करते हैं, वे जिंदगी भर करते ही रह जाते हैं, कर कुछ नहीं पाते. जो कुछ नहीं करते, वे न करके भी बहुत-कुछ कर लेते हैं. करनेवाले ‘कमेरे’ कहलाते हैं, जिसका अर्थ वैसे तो ‘काम करनेवाला’ होता है, पर हकीकत में नौकर, दास वगैरह हो गया है. न करनेवाला सेठ कहलाता है, जो श्रेष्ठ से बना है. ये दोनों शब्द अपने आप इन दोनों की हैसियत सूचित कर देते हैं.

फिर भी महत्व काम करने का ही बताया गया है, और वह शायद इसलिए कि कहीं करनेवाले काम करना न छोड़ दें और फिर वे काम, काम न करनेवालों को न करने पड़ जायें. कर्म का असली सिद्धांत इसी अवधारणा पर आधारित है, जो दूसरों को कर्म करते रहने की प्रेरणा देता है, ताकि अपने को कर्म न करना पड़े. कर्म का यह सिद्धांत इस तरह कर्म न करनेवालों द्वारा प्रतिपादित किया गया लगता है.

वैसे महत्व कर्म न करनेवालों का भी कम नहीं बताया गया है. साहित्य और शास्त्र काम न करनेवालों की महिमा से भरे पड़े हैं. मलूकदास ने तो पूरे सम्मान के साथ ऐसे लोगों को ‘पंछी’ कह कर संबोधित किया है- ‘पंछी करै न काम!’ कहने की आवश्यकता नहीं कि उनकी निगाह में पंछी कुछ काम नहीं करते, एकदम निष्काम भाव से जीवन-यापन करते हैं.

मलूकदास जी यह कह कर कुछ न करनेवालों को कुछ न करते रहने के लिए प्रेरित भी करते हैं कि रामजी काम करनेवालों के ही नहीं, बल्कि न करनेवाले के भी दाता हैं. वे दोनों को समान भाव से देते हैं, किसी में कोई भेदभाव नहीं करते. उधर मैनेजमेंट भी काम न करनेवालों का ही शास्त्र है, जिसके अनुसार मैनेजर वह नहीं होता, जो खुद काम करता है, बल्कि वह होता है, जो दूसरों से काम करवाता है.

जो लोग कुछ नहीं करते, वे बातें अलबत्ता बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं. बड़ी-बड़ी बातें करनेवालों की जगह राजनीति और साहित्य दोनों में बहुत बड़ी है. साहित्य तो असल में है ही बड़ी बात, और ऐसे ही राजनीति भी बड़ी ही बात है.

जब कोई बड़ी बात होती है, तो साहित्य होता है और तभी होती है राजनीति. लेकिन छुटभैयों ने बड़ी बातों का मतलब बड़ी-बड़ी बातों से लिया और खासकर राजनीति को बड़ी-बड़ी बातों का पर्याय बना दिया. जैसे कि छोड़ेंगे नहीं, घर में घुस कर मारेंगे, एक के बदले दस सिर लेकर आयेंगे, आदि. ऐसे लोगों को जनसाधारण ने फेंकू की उपाधि से नवाजा, तो बचने के लिए फेंकुओं ने दूसरों को पप्पू कहना शुरू कर दिया. मानो दूसरों के पप्पू होने से उनका फेंकू होना कट जाता हो.

इन फेंकुओं को बड़ी-बड़ी बातें करते देख मुझे एक मुशायरे का किस्सा याद आता है, जिसमें एक नामचीन शायर था, जिसका चीन यानी विदेश में ही नाम था, स्वदेश में नहीं, और ऐसा भी वह खुद ही समझता और कहता था, दूसरे नहीं. वह नामचीन शायर मंच पर दहाड़ रहा था- ‘अंधेरे में लूटूंगा दामन किसी का… अंधेरे में लूटूंगा दामन किसी का… अंधेरे में लूटूंगा दामन किसी का…’

जब वह ऐसा कई बार कह चुका और इससे आगे बढ़ता दिखाई नहीं दिया, तो किसी दिलजले ने उठ कर कह दिया- ‘उजाले में उखड़ीं न… किसी की!’ दिलजले महाशय का आशय था कि उजाले में तो तुमसे कुछ उखड़ा नहीं, और अंधेरे में किसी का दामन लूटने चले हो!

तो भाई फेंकुओ, जो करना है, कर ही डालो न, फेंकने की क्या जरूरत है? कर लोगे, तो सबको दिख ही जायेगा.

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