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रेल बजट का विलय

केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के साथ ही रेल बजट को आम बजट से अलग पेश करने का 92 साल पुराना चलन अब समाप्त हो जायेगा. अगले वित्त वर्ष से रेल बजट आम बजट के भीतर ही पेश होगा. इस आशय के रेल मंत्री के प्रस्ताव को बीते महीने वित्त मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया था. […]

केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के साथ ही रेल बजट को आम बजट से अलग पेश करने का 92 साल पुराना चलन अब समाप्त हो जायेगा. अगले वित्त वर्ष से रेल बजट आम बजट के भीतर ही पेश होगा. इस आशय के रेल मंत्री के प्रस्ताव को बीते महीने वित्त मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया था.
आम बजट में रेल बजट के विलय के लिए किन बातों का ध्यान रखा जाये, इसके बारे में सुझाव देने के लिए एक पांच सदस्यीय समिति बनायी गयी थी और समिति की रिपोर्ट के बाद मंत्रिमंडल ने अंगरेजी जमाने से चली आ रही रेल बजट को अलग से पेश करने की रिवायत को खत्म करने का फैसला किया है.
कहा जा रहा है कि फैसले से रेलवे को एक बड़ा फायदा आर्थिक मोर्चे पर होगा. उसे लाभांश नहीं चुकाना पड़ेगा, जबकि पूंजीगत व्यय के लिए सकल बजट समर्थन पहले की तरह जारी रहेगा. हासिल हुए आर्थिक मदद के एवज में भारतीय रेलवे को 10 हजार करोड़ रुपये की रकम बतौर लाभांश केंद्र सरकार को चुकानी पड़ती थी. आर्थिक तंगी की शिकार रेलवे के लिए निश्चित ही यह बड़ी बचत है.
शुरुआती जानकारी के हिसाब से देखें, तो नहीं लगता कि एक स्वायत्त उपक्रम के रूप में कामकाज करने में रेलवे को कोई रुकावट आयेगी या फिर उसके वित्तीय अधिकारों को कोई हानि पहुंचेगी. हां, यह बात तयशुदा तौर पर अभी से कही जा सकती है कि आगे से रेलभाड़ा या किराये में बढ़ोतरी का जिम्मा वित्त मंत्रालय का होगा. यानी रेलयात्री के रूप में जनता की जेब पर असर डालनेवाले किसी फैसले से उपजे रोष का निशाना वित्त मंत्री होंगे ना कि रेल मंत्री. इसी तरह रेलयात्रियों को मिलनेवाली सुविधा या सुरक्षा में इजाफा होता है, तो इसकी वाहवाही वित्त मंत्री के खाते में जायेगी. जाहिर है, रेल बजट को आम बजट से मिलाने के फैसले का राजनीतिक महत्व उसके वित्तीय पक्ष से कहीं ज्यादा बड़ा है.
मंत्रिमंडल के गठन के समय जिन मंत्रालयों को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाती रही है, रेल मंत्रालय उनमें एक रहा है. इसकी बड़ी वजह है कालक्रम में रेल मंत्री के पद पर आसीन नेता द्वारा अपने चुनाव-क्षेत्र या राजनीतिक प्रभुत्व वाले इलाके के लोगों के लिए रेलयात्रा को ज्यादा सुगम बनाना या अपने इलाके में रेलवे से जुड़ी किन्हीं लाभकर परियोजनाओं की शुरुआत करना.
यही वजह रही िक जो गंठबंधन की राजनीति के दौर में सरकार में शामिल सहयोगी दलों का जोर होता था कि रेल मंत्रालय का प्रभार उन्हीं का कोई सांसद संभाले. दोनों बजट के आपसी विलय के बाद की वास्तविक स्थिति तो आनेवाले दिनों में स्पष्ट होगी, लेकिन फैसले से रेलमंत्री का राजनीतिक रुतबा निश्चित ही पहले की तुलना में कम हुआ माना जायेगा.
Prabhat Khabar Digital Desk
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