कार्यसंस्कृति में सुधार
Updated at : 15 Sep 2016 6:26 AM (IST)
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चुस्त-दुरुस्त, पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त. अच्छी कार्यसंस्कृति के लिए ये कुछ जरूरी तत्व हैं. दुर्भाग्य से आजादी के सात दशक बाद भी देश के सरकारी दफ्तरों की कार्यसंस्कृति के बारे में जनमानस में जो छवि कायम है, उसमें इन तत्वों का नितांत अभाव है. शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस […]
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चुस्त-दुरुस्त, पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त. अच्छी कार्यसंस्कृति के लिए ये कुछ जरूरी तत्व हैं. दुर्भाग्य से आजादी के सात दशक बाद भी देश के सरकारी दफ्तरों की कार्यसंस्कृति के बारे में जनमानस में जो छवि कायम है, उसमें इन तत्वों का नितांत अभाव है.
शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से जब सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए देश को बताया कि उनकी सरकार ने कार्यसंस्कृति में बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाया है, तो इस पर खास चर्चा नहीं हुई. दरअसल, सरकारी कार्यसंस्कृति सुधारने के दावे पहले भी सरकारें करती रही हैं. लेकिन, जब किसी सरकारी विभाग से जुड़ी कोई नकारात्मक खबर छपती है, तो आम लोगों के मन में यही भाव उभरता है कि खबर छपने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. ऐसे में एक अंगरेजी अखबार की यह रिपोर्ट उम्मीद जगाती है कि मोदी सरकार ने सरकारी बाबुओं को जवाबदेह बनाने की दिशा में एक नया कदम उठाया है. अब विभागीय सचिव हर सुबह अपने विभाग से जुड़ी नकारात्मक खबरों को चिह्नित करेंगे और संबंधित पदाधिकारी से स्पष्टीकरण मांगेंगे. पदाधिकारी को दिन में दो बजे तक स्पष्टीकरण और कार्रवाई के बारे में बताना होगा और यदि खबर गलत है तो उसका खंडन करना होगा.
यदि मामला गंभीर है, तो इसकी जानकारी विभाग के मंत्री तक भी पहुंचेगी. यह हर विभाग में रोज की प्रक्रिया होगी, जिसकी मासिक रिपोर्ट कैबिनेट सचिव के पास भेजी जायेगी.
कहने की जरूरत नहीं कि सचिवों के जरिये रोजाना मॉनीटरिंग की मोदी सरकार की इस उल्लेखनीय पहल पर गंभीरता से अमल जारी रहा, तो यह अधिकारियों को अपनी ड्यूटी के प्रति जवाबदेह बनाने में मददगार होगा. इससे दबाव उन संवाददाताओं पर भी होगा, जो कई बार अपुष्ट सूचनाओं या गलत तथ्यों के आधार पर भी सरकारी कामकाज से जुड़ी नकारात्मक खबर लिख देते हैं. सोशल मीडिया की सक्रियता के मौजूदा दौर में कई बार वायरल हो रही सूचनाओं की सत्यता की पड़ताल किये बिना भी खबर लिख दी जाती है, जिस पर संबंधित मीडिया हाउस को बाद में खेद जताना पड़ता है.
सरकारी कार्यालयों की सुस्ती, लापरवाही और भ्रष्टाचार देश के विकास की राह रोकती रही है
इसमें सुधार के नाम पर बायोमीट्रिक हाजिरी जैसी तकनीकी कवायद से बहुत से दफ्तरों में बाबुओं के आने-जाने का समय भले सुधरा हो, काम करने की शैली बहुत नहीं बदली. उम्मीद करनी चाहिए कि रोज की मैनुअल मॉनीटरिंग बाबुओं को अपने कामकाज के प्रति चुस्त और सजग बनायेगी.
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