पाकिस्तान में हिंदी की धमक

Updated at : 14 Sep 2016 6:36 AM (IST)
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पाकिस्तान में हिंदी की धमक

विवेक शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार आप यह मानेंगे कि चीनी और खाड़ी देशों के बहुत से राजनयिक और रक्षा विशेषज्ञ पाकिस्तान से हिंदी सीख रहे हैं? पर यह सच है. और खुद पाकिस्तान के भीतर भी हिंदी को जानने-समझने-सीखने की प्यास तेजी से बढ़ रही है. दरअसल, बंटवारे से पहले समूचे पाकिस्तान में पंजाब से लेकर […]

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विवेक शुक्ला

वरिष्ठ पत्रकार

आप यह मानेंगे कि चीनी और खाड़ी देशों के बहुत से राजनयिक और रक्षा विशेषज्ञ पाकिस्तान से हिंदी सीख रहे हैं? पर यह सच है. और खुद पाकिस्तान के भीतर भी हिंदी को जानने-समझने-सीखने की प्यास तेजी से बढ़ रही है. दरअसल, बंटवारे से पहले समूचे पाकिस्तान में पंजाब से लेकर सिंध तक हिंदी पढ़ाई जाती थी. लाहौर हिंदी का गढ़ होता था. वहां पर हिंदी के कई बड़े प्रकाशन भी थे. लेकिन बाद में बंटवारे का खामियाजा हिंदी को भी भुगतना पड़ा.

बहरहाल, चीनियों और अरब देशों के रक्षा और कूटनीति के जानकारों को इसलामाबाद स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेज (एनयूएमएल) में हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान मिल रहा है.

पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर में भी 1983 से हिंदी विभाग सक्रिय है. एनयूएमएल के हिंदी विभाग में पांच टीचर हैं. यहां हिंदी में डिप्लोमा से लेकर पीएचडी तक की सुविधा है. जून माह में सिंगापुर में जाने का मौका मिला. वहां एक रेस्तरां में लंच के दौरान एक चीनी मूल की महिला से हिंदी में बातचीत हुई. महिला ने बताया कि उसने बीजिंग में हिंदी सीखी है. उसके कई मित्र इसलामाबाद स्थित एनयूएमएल से हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं.

दिल्ली में पाकिस्तानी हाइ कमिश्नर रहे रियाज खोखर ने कहा था कि हिंदी पाकिस्तान के पड़ोसी मुल्क की अहम भाषा है, इसलिए हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते. हालांकि, वह इस सवाल का उत्तर नहीं दे पाये थे कि कराची यूनिवर्सिटी का हिंदी विभाग क्यों बंद हो गया. दरअसल, कराची में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार से जाकर बसे लोगों की भारी तादाद है. कराची और सिंध क्षेत्र में ही पाकिस्तान के हिंदुओं की ठीक-ठाक आबादी भी है. इनमें हिंदू धर्मग्रंथों को हिंदी में पढ़ने की लालसा रहती है.

एनयूएमएल की हिंदी विभाग की प्रमुख डॉ नसीमा खातून ने नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी से हिंदी साहित्य में पीएचडी की है. वह आगरा यूनिवर्सिटी में भी पढ़ी हैं. उनके अलावा इस विभाग में शाहिना जफर मेरठ यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं. इससे स्पष्ट है कि निकाह के बाद पाकिस्तान गयी कई महिलाएं वहां हिंदी पढ़ा रही हैं.

पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर में भी हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था है. पाकिस्तान में भाषा को लेकर सरकारी नीति शुरू से ही बेहद तर्कहीन रही है. पाकिस्तान में उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला, जो पाकिस्तान की मिट्टी की जुबान नहीं थी. उसे सिर्फ भारत से गये मुहाजिर जानते थे. भाषा के सवाल पर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) की अनदेखी पाकिस्तान की बंटवारे की बड़ी वजह रही.

बहरहाल, हिंदी फिल्मों और भारतीय टीवी सीरियलों के कारण पाकिस्तान में हिंदी का बहुत प्रभाव बढ़ रहा है. दर्जनों हिंदी के शब्द आम पाकिस्तानी की आम बोल-चाल में शामिल हो गये हैं. एक वजह यह भी है कि खाड़ी के देशों में लाखों भारतीय-पाकिस्तानी एक साथ काम कर रहे हैं.

दोनों एक-दूसरे की जुबान सीख रहे हैं. सिंध से संबंध रखनेवाले चंदर कुमार दुबई में रहते हैं. उनके अनुसार वह अपने बुजुर्गों से हिंदी सीख रहे हैं. वह कहते है कि अब हम अपनी अगली पीढ़ी को हिंदी पढ़ाने की स्थिति में हैं. हालांकि, पाकिस्तान के हिंदुओं की मातृभाषा हिंदी नहीं है, पर वे हिंदी से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं. पाकिस्तान में हिंदी फले-फूले इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती. आखिर भाषा का संबंध किसी धर्म या जाति से तो नहीं होता.

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