एक जरूरी फैसला

Updated at : 09 Sep 2016 6:34 AM (IST)
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एक जरूरी फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआइआर) दर्ज होने के 24 घंटों के भीतर उसे पुलिस की वेबसाइट पर प्रकाशित करने का आदेश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को दिया है. उग्रवाद, आतंकवाद और यौन अपराध से संबंधित मामलों के एफआइआर को इससे बाहर रखा गया है. पंद्रह नवंबर से लागू होनेवाले इस फैसले में उन […]

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सर्वोच्च न्यायालय ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआइआर) दर्ज होने के 24 घंटों के भीतर उसे पुलिस की वेबसाइट पर प्रकाशित करने का आदेश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को दिया है. उग्रवाद, आतंकवाद और यौन अपराध से संबंधित मामलों के एफआइआर को इससे बाहर रखा गया है.

पंद्रह नवंबर से लागू होनेवाले इस फैसले में उन राज्यों को 72 घंटे का समय दिया गया है, जहां इंटरनेट की सेवा कमजोर है. इस फैसले पर अमल से पुलिस के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है. देशभर में यह आम शिकायत है कि पुलिस एफआइआर दर्ज करने में आनाकानी करती है. अकसर मामला दर्ज हो भी जाता है, तो बाद में उसे वापस ले लिया जाता है. न्यायालय में स्पष्ट कहा है कि उपाधीक्षक स्तर से नीचे के अधिकारी को प्रकाशित एफआइआर को हटाने का अधिकार नहीं होगा. वर्ष 2013 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों को एफआइआर दर्ज नहीं करनेवाले पुलिसकर्मियों के विरुद्ध 166-ए के तहत कार्रवाई करने का निर्देश जारी किया था, जिसमें एक वर्ष के कारावास की सजा का प्रावधान है. हमारे देश की पुलिस व्यवस्था दुनिया के सबसे लचर तंत्रों में से एक है.

पुलिसकर्मियों की कम संख्या, समुचित संसाधनों, संवेदनशीलता और प्रशिक्षण का अभाव, भ्रष्टाचार, आतंरिक व विभागीय लापरवाही आदि अनेक कमजोरियों ने पुलिस व्यवस्था को लगभग पंगु बना दिया है. पुलिस सुधार के लिए कई रिपोर्ट तैयार हुईं, पर उनको सही तरीके से अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका. पुलिस तंत्र में अपराध की जांच तथा कानून-व्यवस्था की जिम्मेवारी को अलग-अलग करने की मांग लंबे समय से की जा रही है.

संख्या कम होने और बोझ अधिक होने के कारण पुलिसकर्मियों को तनावपूर्ण स्थितियों में काम करना पड़ता है. पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में जनवरी, 2014 में एक लाख की आबादी के लिए मात्र 139.76 पुलिसकर्मी थे.

बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी अतिविशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा में और विभागीय कार्यों में लगे हैं. गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2015 में भारतीय पुलिस सेवा के लिए नियत 4,754 पदों में 906 पद खाली थे. ऐसे में जरूरी यह है कि पुलिस तंत्र को जवाबदेह बनाने के साथ उसे बेहतर बनाने के भी ठोस प्रयास किये जायें.

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