ठोस पहलों की दरकार

Updated at : 05 Sep 2016 5:42 AM (IST)
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ठोस पहलों की दरकार

शिक्षक दिवस उन तमाम शिक्षकों के प्रति आभार का एक अवसर होता है, जो देश के भविष्य को संवारने में अप्रतिम योगदान देते हैं. साथ ही, यह अहम दिन शिक्षा तंत्र, विशेषकर शिक्षकों, से जुड़ी समस्याओं पर गहन विचार का मौका होता है. गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे और शिक्षक-छात्र अनुपात के मामले में हमारी गिनती दुनिया […]

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शिक्षक दिवस उन तमाम शिक्षकों के प्रति आभार का एक अवसर होता है, जो देश के भविष्य को संवारने में अप्रतिम योगदान देते हैं. साथ ही, यह अहम दिन शिक्षा तंत्र, विशेषकर शिक्षकों, से जुड़ी समस्याओं पर गहन विचार का मौका होता है. गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे और शिक्षक-छात्र अनुपात के मामले में हमारी गिनती दुनिया के बेहद पिछड़े देशों में होती है तथा हम शिक्षा पर सबसे कम खर्च करनेवाले देशों की सूची में भी शामिल हैं.
हालांकि इन कमियों के कई कारण हैं, पर अमूमन हम शिक्षकों के सिर पर इसका ठीकरा फोड़ कर संतुष्ट हो जाते हैं. इस प्रवृत्ति का दूसरा सिरा शिक्षक दिवस जैसे मौकों पर शिक्षकों के अमूल्य योगदान की प्रशस्ति गाने और उन्हें सम्मानित करने का रिवाज निभाने का है. इन दो ध्रुवों के बीच समाधान की ठोस कोशिशों की संभावनाएं हाशिये पर चली जाती हैं. वर्ष 2009 के शिक्षा के अधिकार कानून में हर 30 छात्र पर एक शिक्षक होने का प्रावधान किया गया है. वर्ष 2010 में तत्कालीन सरकार ने संसद को सूचना दी थी कि देश में 12 लाख शिक्षकों की कमी है और उपलब्ध पदों में से 5.23 लाख स्थान रिक्त हैं.
बीते छह सालों में यह स्थिति बदली नहीं है. पिछले महीने संसद में पेश 2014-15 की रिपोर्ट में बताया गया है कि 1,05,630 ऐसे विद्यालय हैं जहां मात्र एक ही शिक्षक कार्यरत है. पिछले साल का आंकड़ा है कि 4.5 लाख प्राथमिक शिक्षक अप्रशिक्षित हैं और केंद्रीय योजना के तहत 2013-14 तक महज 19.2 फीसदी शिक्षकों को ही प्रशिक्षण दिया जा सका था. पिछले 10-12 सालों में प्राथमिक शिक्षा पर 95 अरब डॉलर से अधिक खर्च किया गया है. लेकिन अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि छात्रों के सीखने की क्षमता चिंताजनक बनी हुई है. वर्ष 2007 से 2013 के बीच प्राथमिक कक्षाओं में छात्रों के नामांकन की संख्या तेजी से बढ़ी थी, पर सरकारी विद्यालयों में नामांकन घटा था तथा बड़ी संख्या में अभिभावकों ने अपने बच्चों के लिए निजी विद्यालयों का विकल्प चुना था.
क्या इस स्थिति के दोषी सिर्फ शिक्षक हैं जिनकी संख्या बढ़ाने और जिन्हें प्रशिक्षण देने की व्यवस्था लचर है? स्थायी पदों पर योग्य शिक्षकों की बहाली की जगह कम वेतन में अस्थायी नियुक्तियां तथा उपलब्ध शिक्षकों पर अधिकाधिक छात्रों का जिम्मा देकर हम पूरी शिक्षा व्यवस्था को पंगु बनाते जा रहे हैं. यदि सुधार के ठोस प्रयास नहीं हुए, तो हम निराशाजनक भविष्य के लिए अभिशप्त होंगे.
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