रिझाने की हमारी कूटनीति

Updated at : 27 Jun 2016 5:52 AM (IST)
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रिझाने की हमारी कूटनीति

पुष्पेश पंत वरिष्ठ स्तंभकार सिओल की किरकिरी के बाद अब हमारा विदेश मंत्रालय इस कोशिश में है कि एनएसजी न सही, शंघाई सहयोग संगठन की स्थायी सदस्यता को ही एक बड़ी राजनयिक कामयाबी के रूप में पेश किया जा सके. इस बात को काफी तूल दिया गया कि ताशकंद के शिखर सम्मेलन में मोदी की […]

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पुष्पेश पंत

वरिष्ठ स्तंभकार

सिओल की किरकिरी के बाद अब हमारा विदेश मंत्रालय इस कोशिश में है कि एनएसजी न सही, शंघाई सहयोग संगठन की स्थायी सदस्यता को ही एक बड़ी राजनयिक कामयाबी के रूप में पेश किया जा सके. इस बात को काफी तूल दिया गया कि ताशकंद के शिखर सम्मेलन में मोदी की मुलाकात चीनी सदर शी जिनपिंग के अलावा पाकिस्तानी सदर के प्रतिनिधि से भी होगी और वहां पुतिन भी होंगे. भारतीय प्रधानमंत्री इस मौके का लाभ शी को भारत को एनएसजी में शामिल होने के लिए राजी करने के लिए करेंगे. यह बात पहले ही कही जाने लगी थी कि सिअोल में दरवाजा हमेशा के लिए बंद नहीं हुआ है- कुछ समय बाद चीन का फैसला बदल सकता है.

यहां कुछ बातें समझ लेना जरूरी है. शंघाई सहयोग संगठन चीन के आक्रामक तेवरों पर बहुत मधुर मुद्रा में अंकुश लगाने का ही राजनयिक प्रयास है. भारत की उपयोगिता बहुत सीमित है अौर इसके अन्य सदस्यों के लिए तभी तक है, जब तक रूस अौर चीन दोनों को यह लगता है कि वह उसे शक्ति समीकरण संतुलित करनेवाले बटखरे की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं. अब तक यह जगजाहिर है कि भारत को दुनिया क्या, एशिया में भी बराबरी का दर्जा देने को चीन सहमत नहीं है. ब्रिक्स की धीमी प्रगति का भी यही प्रमुख कारण है.

विडंबना यह है कि जिस वक्त चीन के विरोध के कारण भारत की एनएसजी की सदस्यता की महत्वाकांक्षा धराशायी हो रही थी, हमारे वित्त मंत्री चीनी व्यापारियों को भारत आने तथा बड़े पैमाने पर आर्थिक विकास में साझेदार होने का न्योता दे रहे थे. फिलहाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में भारत का अव्वल नंबर का साझेदार चीन ही है अौर इस रिश्ते की नजाकत के मद्देनजर ही मनमोहन सिंह सीमा विवाद को ठंडे बस्ते में डालने की सलाह देते थे.

तब क्या यह समझा जाये कि चीन की मेहरबानी से एनएसजी की पंगत में बैठने का उतावलापन ही अरुण जेटली के आर्थिक राजनय को इस घड़ी गतिशील बना रहा है? क्या शंघाई सहयोग संगठन में भारत नयी जिम्मेवारियां कबूल कर भी चीन को यही दिखाने को व्याकुल है कि वह उसकी सुझायी राह पर चलने को राजी है, बशर्ते बतौर इनाम उसकी परमाण्विक मुराद पूरी कर दी जाये?

जहां तक रूस का प्रश्न है, वह आरंभ से ही शंघाई सहयोग संगठन में भारत को स्थायी सदस्यता देने के पक्ष में रहा है. इस समर्थन को एनएसजी के अखाड़े में भुनाया जा सकता है, ऐसा सुझानेवाला नादान ही समझा जा सकता है. इस घड़ी पुतिन के लिए चीन नहीं, अमेरिका अौर ब्रेक्जिट के बाद बिखरते यूरोप की सामरिक चुनौती कहीं अधिक अहम है.

अमेरिका तथा यूरोप दोनों यूक्रेन में रूसी हस्तक्षेप से बौखलाये पुतिन को किसी तरह पंगु बनाने अौर राजनयिक बेड़ियों में जकड़ने को प्राथमिकता देते रहे हैं. परंतु अरब जगत की अस्थिरता अौर लगातार विस्फोटक गृहयुद्ध जैसे माहौल के कारण पुतिन के प्रतिरोध में पश्चिमी खेमा नाकाम रहा है.

सीरिया के शरणार्थियों की बाढ़ तथा जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, कनाडा और ब्रिटेन में कट्टरपंथी इसलामी दहशतगर्दी की पेचीदा सामरिक चुनौती की वजह से भी आज शंघाई सहयोग संगठन जैसे क्षेत्रीय/समानोद्देश्यीय जमावड़ों की सार्थकता पर बड़े सवालिया निशान लग चुके हैं. यह सुझाना जायज है कि भारत अौर चीन के बुनियादी राष्ट्र हितों के टकराव को देखते हुए यह संभव नहीं लगता कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय राजनयिक मंच पर कोई लाभप्रद सहमति बन सकती है. खासकर ऐसे स्थानों में, जहां भारत के साथ-साथ पाकिस्तान भी आमंत्रित हो! इस संदर्भ में यहां यह याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि अरसे तक भारत आसियान की स्थायी सदस्यता की मरीचिका में भी इसी तरह भटकता रहा था.

इस सब का अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि भारत ने राजनयिक एकांत या वनवास ग्रहण कर लेना चाहिए. एनएसजी वाला अभियान पूरी तरह बेकार नहीं कहा जा सकता. कम-से-कम इसने चीन को यह तो जतला दिया कि भारत के पक्ष में इस क्लब के अधिकांश सदस्य हैं.

बहुत देर तक भारत का बहिष्कार अपने हित में नहीं समझा जा सकता. भारत को बिल्कुल असहाय अौर विकल्पहीन नहीं समझा जा सकता. हमारे विदेश मंत्रालय ने यह ऐलान तो कर ही दिया है कि एनएसजी वाले फैसले के कारण अब भारत को मौसम बदलाव वाले पेरिस में स्वीकार किये दायित्व के पालन में देर लग सकती है. ब्रेक्जिट के बाद भारत की अर्थव्यवस्था से सहकार की जरूरत इस भूकंप से प्रभावित सभी देशों को होगी. इसीलिए यह समझना कठिन है कि क्यों जेटली चीन को ही रिझाने को अब भी प्राथमिकता दे रहे हैं?

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