गीतों की बिसरी परंपरा

Updated at : 23 Jun 2016 6:15 AM (IST)
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गीतों की बिसरी परंपरा

प्रभात रंजन कथाकार कल मुझे अचानक अपने किताबों के संग्रह में दुष्यंत कुमार का गजल संग्रह ‘साए में धूप’ मिल गया. मैं उजली-धुंधली यादों के कोहरे में खो गया. यह पहली साहित्यिक पुस्तक थी, जो मैंने सीतामढ़ी के मिश्रा बुक डिपो से खरीदी थी. दूसरी अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ थी. उस छोटे से […]

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प्रभात रंजन
कथाकार
कल मुझे अचानक अपने किताबों के संग्रह में दुष्यंत कुमार का गजल संग्रह ‘साए में धूप’ मिल गया. मैं उजली-धुंधली यादों के कोहरे में खो गया. यह पहली साहित्यिक पुस्तक थी, जो मैंने सीतामढ़ी के मिश्रा बुक डिपो से खरीदी थी. दूसरी अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ थी. उस छोटे से कस्बे में किताब की दुकान का मतलब था कोर्स की किताबों की दुकान. तब तक मैंने भी कोर्स की किताब छोड़ कर कोई और किताब नहीं खरीदी थी.
हिंदी साहित्य से मेरा पहला परिचय दुष्यंत की गजलों से ही हुआ था.मुझे याद आता है कि हिंदी में गीत-गजल की अपनी परंपरा थी, जिसने गांव-देहातों में पाठक तैयार किये. अपने पापा की कॉपी में मैंने पहली बार यह गीत पढ़ा था- ‘बदनाम रहे बटमार मगर/घर तो घरवालों ने लूटा/ मेरी दुल्हन सी रातों को/ नौ लाख सितारों ने लूटा’. तब मैं गोपाल सिंह नेपाली का नाम जानता भी नहीं था. नेपाल के बॉर्डर पर रहने के कारण मैंने सोचा था कि पापा का कोई दोस्त होगा, जो नेपाल में रहता था. मैं वह गीत आज तक नहीं भूला.
हिंदी में गीतों की एक समृद्ध परंपरा रही है. जिनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं होता था, वे भी ‘मधुशाला’ कि पंक्तियां सुना दिया करते थे या दिनकर की ‘रश्मिरथी’ की पंक्तियां. मेरे दादाजी जब अपने जीवन के आखिरी दिनों में थे, तो वे मुझसे रश्मिरथी सुनाने के लिए कहते थे.
उनको उससे सुकून मिलता था शायद! ये संस्मरण मुझे इसलिए याद आ रहे हैं, क्योंकि बार-बार मेरा ध्यान इस बात की तरफ जा रहा है कि हिंदी कविता ने अपने आप को गीतों की इस समृद्ध परंपरा से क्यों काटा? जनवाद-जनवाद के नाम पर हिंदी कवि ऐसी कविताएं लिखने लगे, जो जनता के लिए अबूझ पहेली की तरह होती चली गयी.
आज अगर हिंदी कविता के पाठक नहीं हैं, हिंदी कविता छापने से प्रकाशक कन्नी काटने लगे हैं, तो इसके लिए खुद कवि जिम्मेवार हैं. उन्होंने बौद्धिकता की ऐसी मुद्रा अख्तियार की, मानो कविता लिखना बौद्धिक क्रिया-कलाप से अधिक कुछ न हो. मुझे मध्यकाल का उदाहरण याद आ रहा है.
तुलसीदास के समकालीन कवि थे केशवदास. तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखी और केशवदास ने ‘रामचंद्रिका’. दोनों में रामकथा को आधार बनाया गया है. शास्त्रीय दृष्टि से रामचंद्रिका को आचार्य लोग बेहतर कृति भी बताते हैं, जबकि जनभाषा अवधी में लिखी रामचरितमानस घर-घर पहुंच गयी. उसने कथा का ही नहीं, भाषा का भी विस्तार किया.
एक दौर में गीतों की परंपरा ने लोकरुचि का ध्यान तो रखा ही, भाषा का भी विस्तार किया. अकारण नहीं है कि जयशंकर प्रसाद, निराला से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह तक गीत लिखा करते थे.
तब गीत का मतलब महज फिल्मी गीत नहीं हुआ करते थे. फिल्मी गीतों से अलग साहित्यिक गीतों की भी अपनी लोकप्रियता थी. पंडित नरेंद्र शर्मा ने फिल्मों में काफी गीत लिखे, लेकिन वे अपने गैर-फिल्मी गीत ‘आज के बिछड़े न जाने कब मिलेंगे’ के लिए ज्यादा याद किये जाते हैं.
आम पाठकों को हिंदी से जोड़ने में महज जासूसी या रोमांटिक धारा के उपन्यासकारों का ही योगदान नहीं रहा है, बल्कि हमारे मन को काव्यात्मक संस्कार देने में इन गीतकारों की महती भूमिका रही है, जिनके योगदान को हिंदी साहित्य का इतिहास लिखनेवाले अक्सर भुला देते हैं.
आजकल जब फेसबुक और ट्विटर पर बड़ी तादाद में लोगों के उर्दू शायरों के शेर देवनागरी में लिखते देखता हूं, तो मुझे हिंदी गीतों की परंपरा की याद आ जाती है, जिनमें आम आदमी की भावनाओं की अभिव्यक्ति होती थी. उसकी कमी ने ही पाठकों को शायद उर्दू शायरी की तरफ उन्मुख कर दिया!
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