पीएम मोदी की महारत

पिछले दो साल से प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राअों का बखान कुछ ऐसे किया जाता रहा है, जैसे हर बार वह दिग्विजय के लिए निकले हों अौर घर वापसी के बाद तुरंत अश्वमेध यज्ञ संपन्न होगा. हाल की पांच देशों की यात्रा इस का अपवाद नहीं. बहरहाल, एनएसजी वाला घोड़ा फिलहाल चीन ने रोक लिया […]
पिछले दो साल से प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राअों का बखान कुछ ऐसे किया जाता रहा है, जैसे हर बार वह दिग्विजय के लिए निकले हों अौर घर वापसी के बाद तुरंत अश्वमेध यज्ञ संपन्न होगा. हाल की पांच देशों की यात्रा इस का अपवाद नहीं. बहरहाल, एनएसजी वाला घोड़ा फिलहाल चीन ने रोक लिया है अौर दम साधे सब यही इंतजार कर रहे हैं कि इसे भारत छुड़ायेगा कैसे? हमारी समझ में अमेरिका के साथ भारत की बहुचर्चित सामरिक साझेदारी सिर्फ परमाण्विक मुद्दे तक सीमित नहीं है अौर इस दौरे का लेखा-जोखा तैयार करते वक्त दूसरे देशों अौर उन विषयों का जिक्र भी जरूरी है, जो हमारे राष्ट्रहित के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं.
मोदी ने दौरा शुरू किया अफगानिस्तान से- वहां भारत के सहकार से निर्मित बांध का उद्घाटन करके. इस तरह उन्होंने यह संदेश दिया कि अफगानिस्तान में शांति की पुनर्स्थापना के लिए भारत का भी बड़ा योगदान रहा है अौर उसने भी इसकी कीमत चुकायी है. यह बात नजरंदाज नहीं की जानी चाहिए कि जहां अमेरिका भारत को बारंबार यह सलाह देता है कि वह अपनी उदीयमान छवि के अनुसार क्षेत्रीय जिम्मेवारी का निर्वाह करे, वहीं जब कोई महत्वपूर्ण शिखर वार्ता का आयोजन होता है, तो भारत को आमंत्रित करने की जरूरत नहीं समझी जाती. हाल में चीन को ऐसे एक जमावड़े में शामिल किया गया है. अमेरिकी संसद को संबोधित करते हुए मोदी ने दहशतगर्दों को पनाह देनेवाले देशों का उल्लेख किया. बिना पाकिस्तान का नाम लिये उन्होंने कट्टरपंथी तालिबान आतंकियों के संरक्षकों के खिलाफ संयुक्त मोर्चाबंदी की जरूरत को रेखांकित किया.
इसके बाद बारी थी कतर की, जहां बड़ी संख्या में भारतीय मजदूर अौर कामगार प्रवासी हैं. मोदी ने न केवल उच्च स्तरीय वार्ता से उनकी परेशानियों का हल तलाशने की कोशिश की, वरन कतर की संप्रभु निवेश निधि का एक अंश भारत में लगाने की पेशकश भी की. यह एक तीर से दो शिकार का प्रयास था. यदि अमेरिकी पूंजी निवेशक नखरे करते हैं, तो भारत इस स्रोत का वैकल्पिक उपयोग कर सकता है. आज सऊदी अरब की तुलना में नन्हा कतर कहीं अधिक आकर्षक लगता है. यहां भी शायद यह टिप्पणी नाजायज नहीं कि मोदी का मकसद अमेरिका, चीन तथा पाकिस्तान को एक साथ यह जतलाने का था कि दुनिया में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत के लिए पश्चिम एशिया के राज्य स्वाभाविक साझेदार हैं, इनके साथ उसके ऐतिहासिक पारंपरिक रिश्ते रहे हैं अौर खाड़ी के देशों की खुशहाली में भारतीय प्रवासियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
मोदी की स्विट्जरलैंड यात्रा प्रतीकात्मक महत्व की ही थी. अब तक यह जगजाहिर हो चुका है कि कालाधन उस देश में नहीं पनामा, कैमेरून, वर्जिन आइलैंड्स, लिचैंस्टाइन आदि में रखा जाने लगा है. बहरहाल, अब प्रांतीय चुनावों के अभियान में उन पर यह आरोप लगाना कठिन हो जायेगा कि वह इस दिशा में कुछ नहीं कर रहे.
मैक्सिको ने पहले ही स्विट्जरलैंड की तरह यह साफ कर दिया था कि एनएसजी की सदस्यता के मामले में वह भारत को समर्थन देगा, सो वहां की जो खबर सुर्खियों में रही, वह यह कि मैक्सिको के राष्ट्रपति खुद कार चला कर हिंदुस्तानी मेहमान को शाकाहारी भोजन कराने एक रेस्त्रां में ले गये. हमारी समझ में इसे मनोरंजक चुहलबाजी ना समझें. जागरूक नागरिक यह सवाल खुद से पूछने को मजबूर होंगे कि क्या कभी ऐसी खबर भारत से भी सुनने-देखने को मिलेगी कि सुरक्षा का तामझाम त्याग भारतीय प्रधानमंत्री किसी शाही मेहमान को इसी तरह अनौपचारिक दावत देगा? यह सवाल सिर्फ मोदी के संदर्भ में ना पूछें. उनके पूर्ववर्ती अौर सहयोगी मंत्रियों पर भी लागू होता है यह सवाल.
इस समय हमारे कुछ दोस्त नाहक यह सिरदर्द पाल रहे हैं कि मोदी का अमेरिका वाला भाषण टेलीप्रॉम्प्टर की मदद से दिया गया था अौर इसीलिए जानदार लगा. यह मीन-मेख निकालने का वक्त नहीं. अोबामा समेत सभी नेता अपने संबोधनों को प्रभावी बनाने के लिए आधुनिकतम टेक्नोलॉजी की सहायता लेते हैं. मोदी की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने आरंभिक ठोकरों के बाद यह महारत हासिल कर ली है.
मोदी की सफलता-विफलता का आकलन विदेशनीति अौर राजनय के क्षेत्र में उनके पराक्रम से नहीं, बल्कि स्वदेश में अर्थव्यवस्था की सेहत के आधार पर किया जायेगा. घरेलू मतदाता अौर विदेशी निवेशक दोनों की यही एक कसौटी होगी! यह चुनौती अरुण जेटली या रघुराम राजन के भरोसे छोड़ मोदी निश्चिंत नहीं बैठ सकते- फिलहाल…
पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
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