कैपिटल हिल में भारत की धमक

Updated at : 10 Jun 2016 5:43 AM (IST)
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कैपिटल हिल में भारत की धमक

तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा अमेरिका के लिए नये संबंधों की वर्णमाला नरेंद्र मोदी ने रची है. वह वर्णमाला है भारत के हित साधने के लिए अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक गंठबंधन, जिसे देख कर चीन का चिंतित होना स्वाभाविक ही था. अमेरिकी संसद में भारतीय प्रधानमंत्री का शानदार संबाेधन और अमेरिकी सांसदों का उनके भाषण के हर […]

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तरुण विजय

राज्यसभा सांसद, भाजपा

अमेरिका के लिए नये संबंधों की वर्णमाला नरेंद्र मोदी ने रची है. वह वर्णमाला है भारत के हित साधने के लिए अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक गंठबंधन, जिसे देख कर चीन का चिंतित होना स्वाभाविक ही था.

अमेरिकी संसद में भारतीय प्रधानमंत्री का शानदार संबाेधन और अमेरिकी सांसदों का उनके भाषण के हर मिनट पर जोरदार करतल ध्वनि से स्वागत हर भारतीय के लिए सुखद, गर्वीली अनुभूति का कारण होना चाहिए. राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और विपक्षी तेवर के विरोधी पहलू ऐसे मौकों पर भूल जाने चाहिए.

खाड़ी के देशों और सऊदी अरब के सुन्नी क्षेत्रों के बाद शिया ईरान की सफल यात्रा ने भारत के प्रतिद्वंद्वी देशों की नींद उड़ा दी.

वे मानते थे कि हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा को माननेवाले जब सत्ता में आयेंगे, तो उनका न तो स्वदेश के विविध मतावलंबी समुदायों के साथ सामंजस्य बैठेगा और न ही अतिरेकी तथा तीव्र वैचारिक भिन्नताओं वाले देशों से पट पायेगी. लेकिन, यह भारत का बदलता मिजाज और बढ़ती धमक का ही नतीजा है कि न केवल लाहौर अचानक मोदी के आने से हक्का-बक्का रह गया, बल्कि सऊदी अरब में भारतीयों ने भारतमाता की जय के नारे लगा कर नया अंदाज बता दिया. अब अमेरिकी संसद में सांसद तालियों से भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत करते हैं, तो यह मामला किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि हिंदुस्तान का हो जाता है.

दिलचस्प रहा चीन का खीझ कर बयान देना और भारत-अमेरिकी मैत्री के नये आयामों पर नकारात्मक बयान देना. क्यों? क्योंकि यह वह सहन नहीं कर पाया कि दो बड़े लोकतांत्रित देश परमाणु शक्ति के क्षेत्र में सहयोग के लिए वचनबद्ध होकर चीन की परमाणु क्षेत्र में बढ़त को कम कर रहे हैं.

परमाणु आपूर्ति समूह की सदस्यता भारत को मिले और वह एक जिम्मेवार परमाणु शक्ति के रूप में उभरे, यह चीन कतई नहीं चाहता. इसके पहले लखवी और मसूद अजहर के मामलों में भी उसने भारत का साथ नहीं दिया और इन आतंकवादियों को कूटनीतिक कवच प्रदान किया. ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने, अफगानी संसद के नये भवन और सलमा बांध के पूरे होने पर किये गये शानदार उद्घाटन का भी चीन और पाकिस्तान में दर्द भरा असर हुआ. भारतीय उपमहाद्वीप, जिसे अब सार्क या दक्षेस भी कहा जाने लगा है, को चीन और पाकिस्तान बढ़ते देखना ही नहीं चाहते.

जबकि इस क्षेत्र के साथ-साथ पूर्वी एशिया, दक्षिणी एशिया एवं सुदूर पूर्व में भारत एक मैत्रीपूर्व नेतृत्व की स्थिति रखता है. इसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, सिंगापुर, फिलीपिंस, वियतनाम जैसे देश समर्थन देते हैं, जबकि चीन की प्रसारवादी नीतियों से उन्हें सदा अशंका रहती है. पिछले पखवाड़े शंगरीला में संवाद में रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर के भाषण तथा वियतनाम को ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र देने की पेशकश ने पूर्वी देशों को भारत की बढ़ती समुद्री आकांक्षाओं से आश्वस्त किया है. इन सभी देशों के साथ भारत के सैकड़ों वर्ष पुराने मैत्री-संबंध रहे हैं और इस कारण वहां के नेतृत्व और समाज में भारत के प्रति एक सहज, सरल आत्मीयता का भाव देखने को मिलता है.

कांग्रेस के दो प्रधानमंत्रियों नरसिम्हा राव तथा डॉ मनमोहन सिंह ने इसी वातावरण का भारत के हित में उपयोग किया तथा लुक इस्ट पॉलिसी अर्थात् पूर्वोन्मुखी नीति का श्रेय उनको ही देना होगा.

यह विडंबना ही है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद न तो भारत को सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता और वीटो शक्ति संयुक्त राष्ट्रसंघ में स्थिति मिली और न ही परमाणु आपूर्ति समूह की सदस्यता सरलता से मिलती दिख रही है. जबकि चीन, जो परमाणु बम के भय का विस्तार करनेवाला सबसे कुख्यात परमाणु प्रसारक देश है- दोनों स्थितियों का प्रभुत्व प्राप्त आक्रामक विदेश नीति का देश बना है.

उसने ही पाकिस्तान, ईरान, अरब, जैसे देशों को परमाणु तकनीक दी. उत्तरी कोरिया जैसे देश के सर्वाधिक निकट चीन ही माना जाता है और एशिया में अपनी हमलावर कूटनीति से उसने ऐसा वातावरण बना दिया है कि विश्लेषक मानने लगे हैं कि मध्य एशिया के तनाव अब पूर्वी एशिया के दक्षिण-चीन सागर क्षेत्र में स्थानांतरित हो रहे हैं.

इस परिदृश्य में भारत का क्षेत्रीय शक्ति की धुरी बनना अपने लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के विश्व के लिए जरूरी है. यह जरूरी है कि देश के राजनीतिक दलों के लिए देश की मजबूती का एजेंडा जाति और निजी स्वार्थों की पूर्ति से बड़ा बने.

पारिवारिक तथा अहंकार की निजी-नेतृत्व केंद्रित राजनीति ने देश को बीस साल पीछे धकेल दिया. मोदी की सफल नीतियां, अमेरिका में मिला उनको सम्मान देश के लिए अच्छा ही मानना चाहिए, यह कह कर किसी पार्टी का रुतबा कम नहीं होता.

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