देश के भविष्य का आईना!

Updated at : 09 Jun 2016 5:36 PM (IST)
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देश के भविष्य का आईना!

-हरिवंश- हमारी पीढ़ी तक, पत्रकारिता समाज पर असर डालनेवाली प्रभावी माध्यम के रूप में स्वीकार्य थी. 80 के दशक के अंतिम पड़ाव की यह चर्चा है. कांग्रेस का जादू खत्म हो चुका था. जनता पार्टी का प्रयोग विफल हो रहा था. ‘एंग्री यंगमैन’ की भूमिका में उतरे अमिताभ, ‘महानायक’ बनने की ओर बढ़ चुके थे. […]

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-हरिवंश-

हमारी पीढ़ी तक, पत्रकारिता समाज पर असर डालनेवाली प्रभावी माध्यम के रूप में स्वीकार्य थी. 80 के दशक के अंतिम पड़ाव की यह चर्चा है. कांग्रेस का जादू खत्म हो चुका था. जनता पार्टी का प्रयोग विफल हो रहा था. ‘एंग्री यंगमैन’ की भूमिका में उतरे अमिताभ, ‘महानायक’ बनने की ओर बढ़ चुके थे. समाज का मानस बेचैन था, वह ‘एंग्री यंगमैन’ में अपना नायक तलाश रहा था. तब टीवी की ‘इंस्टैंट (क्षणजीवी) पत्रकारिता या ब्रेकिंग न्यूज के दौर दूर थे.

गांधी युग के आदर्श खत्म हो चुके थे. समाज के पास सपने नहीं थे. भ्रष्टाचार, बिचौलियापन, अपराध, जाति, धर्म, क्षेत्रीयता जैसे तत्व राजनीति और देश का भविष्य तय करने लगे थे, तब पत्रकारिता में कुछेक युवा और नये नाम आये. हवा के ताजे झोंके की तरह. समाज, राजनीति, अर्थनीति, गवर्नेंस जैसे मुद्दों पर नयी दृष्टि से देखने-समझने और प्रस्तुत करनेवाले.

इसी युग में ‘इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ (खोजी पत्रकारिता) की नयी विधा ने देश को झकझोरा. इस विधा के जनक और नायक पत्रकार थे, अरुण शौरी. कहना चाहिए, अपने प्रयोगों, प्रस्तुति और खोज रपटों के कारण वह छा गये. एक नये नायक की तरह उनका नाम संसद में, सत्ता गलियारे में गूंजने लगा. पत्रकारिता में साहसिक प्रयोग, खोज और एक नये धरातल की तलाश के कारण. वर्ल्ड बैंक की नौकरी छोड़ कर, वह देश के लिए कुछ करना चाहते थे.

उन्हें रामनाथ गोयनका जैसे साहसी उद्यमी मिले और महत्वपूर्ण मंच दिया ‘इंडियन एक्सप्रेस का’. बाद में अरुण जी को देखा-जाना. नजदीक से. उनकी राजनीतिक मान्यताओं से मतभेद हो सकते हैं, पर इतना ईमानदार, पारदर्शी, विनम्र, पर अपनी प्रतिबद्धता के प्रति अटल, धैर्य से चीजों की छानबीन और साफ दृष्टि ‘रेअर’(गिने-चुने) लोगों में मिलती है. और लगातार उसी पैशन (आवेग) से शोधपूर्ण चीजें लिखना, दशकों से वही तेवर, वही मानस, वही श्रम बनाये रखना अकल्पनीय है. पर यह अरुण शौरी के साथ सच है. उनका दूसरा पक्ष असाधारण ‘क्रियेटिव’ (सृजनात्मक) है. सांसद के रूप में अपना सारा विकास मद का पैसा आइआइटी, कानपुर को देकर उन्होंने विश्वस्तर का एक अध्ययन केंद्र बनवाया है. अनूठा और अद्भुत. यह रचनात्मक पक्ष उनके लेखन में भी साफ है. समस्याओं, चुनौतियों के साथ समाधान.

उसी अरुण शौरी की 24वीं पुस्तक आयी है. व्हेयर विल आल दिस टेक अस? डिनायल, डिसयूनिटी, डिसऐरे प्रकाशक है, द इंडियन एक्सप्रेस. छापा है, रूपा एंड कंपनी ने. कीमत है, 500 रुपये. पुस्तक के शीर्षक का हिंदी आशय होगा, ‘यह सब हमें कहां ले जायेगा? (नकार, फूट, अव्यवस्था). एक-एक प्रतीक शब्द के गहरे अर्थ हैं. बड़े और भयावह मुद्दे सामने हैं, पर शुतुरमुर्ग की तरह आंख बंद कर हम (राष्ट्र, शासक, दल) उन्हें अनदेखा कर रहे हैं. आपसी फूट का क्या कहना? अव्यवस्था की तह में जाइए, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. यह 600 से अधिक पृष्ठों की पुस्तक है.
इस पुस्तक के बारे में एक पंक्ति में कहना हो तो, हमारे दौर-समय को समझने की कुंजी है, यह. जिन्हें मुल्क को बचाने की चिंता है, उनके लिए अनिवार्य दस्तावेज. जो देश और इनकी चुनौतियों से खुद को रू-ब-रू कराना चाहते हैं या अपडेट रखना चाहते हैं, उनके लिए लाइफ लाइन (जीवन रेखा) की तरह महत्वपूर्ण.
पिछले कुछ वर्षो में अरुण शौरी के ये लेख इंडियन एक्सप्रेस में छपे. तथ्यों से भरे. खरी बातें. भविष्य के साफ संकेत देते विश्लेषण-निष्कर्ष. उन मुद्दों-सवालों पर गहराई से विचार, जो देश को घुन की तरह खा रहे हैं. गवर्नेंस का अदृश्य होते जाना, देश की आंतरिक सुरक्षा पर कहर, पाकिस्तान से उभरे सवालों से नयी-नयी मुसीबतों का बढ़ना,चीन का महाशक्ति के रूप में उदय जैसे घटनाक्रम, भारत के लिए क्या अर्थ रखते हैं? ऐसे सवालों से निबटने में हम कितने सक्षम और समर्थ हैं? यूपीए सरकार द्वारा अमेरिका के साथ न्यूक्लीयर डील, भारत के भविष्य के लिए कैसा है?

आज आर्थिक सुधारों की क्या जरूरत है? जो आर्थिक सुधारों के ब्रेक हैं, साम्यवादी या अन्य, उनके असल रेकार्ड ! यूपीए के सत्तारूढ़ होते ही बिना तह में गये वामपंथियों के दबाव पर श्री शौरी के खिलाफ सीबीआइ जांच प्रकरण, तीन वर्षों तक ‘छिद्र-छिद्र’ जांच के बाद सीबीआइ में कुछ न पाने की रपट देना. उन बजटों में सरकार के झूठ, जिन्हें उद्यमियों ने ‘ड्रीम बजट’ कहा या 10 में से नौ नंबर दिये. कैसे शासक, मीडिया में छपनेवाले उन रपटों से डील करते हैं, जिनमें उनका चेहरा साफ-साफ दिखता है. कैसे वामपंथी तर्कों को, अकाट्य प्रमाणों को, झूठ, दोषारोपण और लांछन से ढंकते-तोपते हैं. और इस बीच जो नयी पत्रकारिता उभर रही है, वह कैसे देश भयानक अहित कर रही है? ये और ऐसे अन्य जरूरी प्रसंग इस पुस्तक में हैं. विस्तार से. ब्योरेवार.

अरुण शौरी के लेखन की एक खास विशेषता है. वह एक-एक तथ्य को सामने रख देते हैं. इसलिए उनके लेख लंबे होते हैं. पर गौर से पढ़ लें, तो एक-एक दृश्य साफ. आप खुद निष्कर्ष तक पहुंच जायेंगे. उनका लेखन, एक पाठक की जागरुकता, ज्ञान और चेतना को उस स्तर तक पहुंचा देता है, जहां वह खुद दूध और पानी में साफ-साफ फर्क कर सके. तथ्यों के प्रति इतनी सजगता, आग्रह और पैनापन, शायद ही किसी अन्य में हो.
इंडियन एक्सप्रेस समूह के संपादक शेखर गुप्ता ने प्रस्तावना में अरुण शौरी की खूबियां गिनायी हैं. उन्होंने कहा है कि तथ्यों के आधार पर ही वह ‘स्टैंड’ लेते हैं. अगर तथ्य नहीं हैं, तो जहां से भी संभव हो, वे ढूंढ़ते हैं. भारत में शोध करनेवाला या कोई पत्रकार, न ऐसा करता है, न अब तक ऐसा किया है. शेखर गुप्ता यह बताना भी नहीं चूकते कि श्री शौरी देश में उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जिनके कट्टर प्रखर विरोधी भी उनकी ‘इंटीग्रिटी’ (साख, सच्चाई, ईमानदारी) पर सवाल नहीं उठाते. शेखर गुप्ता ने मेनार्ड कींस को अरुण शौरी के संदर्भ में उद्धृत किया है. अगर तथ्य बदलते हैं, तो अपने मस्तिष्क, विचार या रूझान बदलने की बौद्धिक ईमानदारी का होना. अरुण शौरी में यह है. शेखर के अनुसार उनके अंदर जो आवेग है, प्रोफेशनल और निजी साहस है, वह प्रेरक है. हमेशा नयी चीजें जानने की ललक, ज्ञान समृद्ध करने की भूख, निराश माहौल में भी सिनिकल (उदासीन) न होना.
पुस्तक की भूमिका में अरुण शौरी ने सिकंदर बख्त को कोट किया है. श्री बख्त सुलझे राजनीतिज्ञ, विनम्र और गिने-चुने समझदार नेताओं में से थे. राज्यसभा में अरुण शौरी को सुनने के बाद सिकंदर बख्त ने कहा- अरुण, तुम्हें मैं पढ़ा करता था. अब यहां बैठा (राज्यसभा) सुनता भी हूं. तुम इस देश को, इस कौम को समझे ही नहीं. इस देश ने तथ्यों से रू-ब-रू होने की क्षमता, सच से मुखातिब होने का साहस खो दिया है. और तुम सीधे तथ्यों की बौछार करते रहते हो. पर यह मुल्क उन तथ्यों-सच्चाइयों को सुनना नहीं चाहता.
दरअसल, ऐसे ही तथ्य हैं, इस पुस्तक में, जिन्हें जानते हर दल के लोग हैं. निजी बातचीत में कबूलते हैं, पर इन समस्याओं को फेस (सामना) करने का न माद्दा है उनमें, न क्षमता, न योग्यता, न नैतिक बल. आधुनिक भारत को समझने की अनिवार्य पुस्तक है, यह.
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