चीन की नीति पर खुशफहमी

Updated at : 04 May 2016 6:36 AM (IST)
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चीन की नीति पर खुशफहमी

पुष्परंजन ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक चलिये, थोड़ी देर के लिए खुश हो जाते हैं कि चीन, भारत से डर गया. बकौल सुब्रमण्यम स्वामी, ‘उन्हें बताया गया है कि चीन न सिर्फ मसूद अजहर, बल्कि हाफिज सईद के मुद्दे पर भी भारत के पक्ष पर विचार कर सकता है, बशर्ते उसे कुछ और सुबूत […]

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पुष्परंजन

ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक
चलिये, थोड़ी देर के लिए खुश हो जाते हैं कि चीन, भारत से डर गया. बकौल सुब्रमण्यम स्वामी, ‘उन्हें बताया गया है कि चीन न सिर्फ मसूद अजहर, बल्कि हाफिज सईद के मुद्दे पर भी भारत के पक्ष पर विचार कर सकता है, बशर्ते उसे कुछ और सुबूत मुहैया कराये जायें.’
स्वामी कहते हैं, ‘चीन को सुबूत मुहैया कराना आसान है.’ मगर आप क्यों चीन को सुबूत देंगे? क्या चीन हमारा चौधरी है? भाजपा के नये-नवेले राज्यसभा सांसद स्वामी को किस चीनी अधिकारी ने यह सलाह दी है, उन्हें देश को बताना चाहिए.
ऐसा है, तो भारत को चाहिए था कि वह उईगुर नेता डोल्कुन ईसा के बारे में चीन से उसके आतंकवादी होने का सुबूत मांगता. जर्मनी के म्यूनिख में रह रहे डोल्कुन ईसा, 1997 में चीन से पलायन कर गये थे. डोल्कुन को 2006 में जर्मनी ने नागरिकता प्रदान की है.
उससे पहले डोल्कुन के विरुद्ध चीन ने इंटरपोल के जरिये ‘रेड काॅर्नर नोटिस’ जारी करा रखा था, पर जर्मनी ने इसकी परवाह नहीं की. सवाल है कि डोल्कुन को वीजा देना है या नहीं, इस बारे में जर्मन सरकार से क्यों नहीं पूछा गया? नागरिक तो अब वह जर्मनी का है. राजनयिक सूत्रों के हवाले से 2 मई को खबर आयी कि नयी दिल्ली स्थित चीनी राजदूत ली युचेंग ने विदेश सचिव एस जयशंकर से डोल्कुन का वीजा निरस्त किये जाने के वास्ते मुलाकात की थी. यदि सूत्रों की बात सही है, तो दबाव चीन ने बनाया था. और आप उसे न मानने की हालत में नहीं दिखे.
गृह मंत्रालय ने अपनी खाल बचाते हुए तर्क दिया है कि डोल्कुन ईसा को ‘टूरिस्ट वीजा’ जारी किया गया था, जबकि वे 28 अप्रैल से 1 मई 2016 तक धर्मशाला में सिटीजन पावर फाॅर चाइना (सीएफसी) सम्मेलन के लिए आ रहे थे. क्या इसके लिए सरकार के वीजा अधिकारी और गृह मंत्रालय में इससे संबंधित क्लियरेंस देनेवाले अफसर की कोई जिम्मेवारी नहीं है?
सबके बावजूद धर्मशाला में यह सम्मेलन संपन्न हो गया. ‘कम्युनिस्ट देश में लोकतंत्र की वापसी’ विषय पर विमर्श के लिए मंगोल, फालुंग कोंग, तिब्बती, उईगुर और क्रिश्चियन प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था. सिटीजन पावर फाॅर चाइना (सीएफसी), नामक संस्था इससे पहले बोस्टन, कैलीफोर्निया, ताइपे, वाशिंगटन में ऐसे काॅन्फ्रेंस करा चुकी है. ‘सीएफसी’ द्वारा सम्मेलन कराने का मकसद यही रहा है कि चीन में शांतिपूर्ण तरीके से लोकतंत्र का आगमन हो.
‘सीएफसी’ जैसी संस्था को चीनी मूल के यांग चियानली अमेरिका से चला रहे हैं. क्या इसके पीछे सीआइए है? इसकी पड़ताल जरूरी है. सरकार की विवशता देखिये कि धर्मशाला के सम्मेलन में यूनाइटेड स्टेट कमीशन आॅफ इंटनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआइआरएफ) की कमिश्नर कैथरीन लैंटोस स्वेफ्ट और सीएफसी के नेता यांग चियानली को वीजा देना पड़ा. ‘सीएफसी’ नेता यांग चियानली थ्येनआनमन स्क्वाॅयर नरसंहार पर चीन के विरुद्ध मुखर रहे हैं.
1949 में कम्युनिस्ट चीन के कंट्रोल में आने से पहले शिनचियांग स्वायत्त प्रदेश था. उईगुर मुसलमानों के सफाये के वास्ते चीन ने बड़ी संख्या में हान आबादी को शिनचियांग में बसाना शुरू किया.
चीन की सबसे बड़ी चिंता शिनचियांग को लेकर है, जहां उईगुर स्वायत्त क्षेत्र अफगानिस्तान के वखान काॅरीडोर से लगा हुआ है. वखान सीमा तालिबान के नियंत्रण में है और चीन मानता है कि यहां आतंकवाद की नर्सरी चल रही है. चीन को हर समय इसका खौफ रहता है कि तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी (टीआइपी), अलकायदा और तालिबान से मिल कर शिनचियांग को अलग करने के वास्ते किसी बड़े अभियान को अंजाम न दे दे.
गालिबन हम गलतफहमी में रहे कि डोल्कुन को वीजा रद्द कर देने से चीन खुश हो गया, और अब वह मसूद अजहर के विरुद्ध भारत के आड़े संयुक्त राष्ट्र में नहीं आयेगा. चीन क्या करेगा, उसका पता छह माह बाद ही चलना है.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रस्ताव 1267 की मियाद सितंबर में समाप्त होगी. चीन इस वजह से मसूद अजहर और हाफिज सईद को लेकर नरम है, ताकि ऐसे लोग तुर्किस्तान इसलामिक पार्टी, ‘पैन इसलामिज्म’ और सुन्नी इसलाम के मार्ग को प्रशस्त करनेवाले उईगुर की मदद में न लग जायें. चीन को गुलाम कश्मीर से लेकर ग्वादर तक 46 अरब डाॅलर की परियोजनाओं और नये रेशम मार्ग की चिंता है. मगर, क्या हम धीरे-धीरे कश्मीर मामले में ‘थर्ड पार्टी’ को रास्ता दे रहे हैं? यह थर्ड पार्टी, हुर्रियत के लोग नहीं, स्वयं चीन बनना चाहता है, जिसके लिए मसूद अजहर एक मजबूत मोहरे की तरह है!
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