एक जरूरी फैसला
Updated at : 04 May 2016 6:35 AM (IST)
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उदारीकरण के बाद, खास कर बीते दो दशकों में, इंडस्ट्री की मांग के अनुरूप पेशेवर तैयार करने के कथित उद्देश्य से उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया गया है. कुछ निजी संस्थाएं इन अपेक्षाओं पर खरी भी उतरी हैं, लेकिन साथ में हजारों की संख्या में […]
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उदारीकरण के बाद, खास कर बीते दो दशकों में, इंडस्ट्री की मांग के अनुरूप पेशेवर तैयार करने के कथित उद्देश्य से उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया गया है. कुछ निजी संस्थाएं इन अपेक्षाओं पर खरी भी उतरी हैं, लेकिन साथ में हजारों की संख्या में ऐसी संस्थाएं भी खुल गयी हैं, जो गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे के अभाव के बावजूद भारी-भरकम शुल्क वसूली के चलते अपने मालिकों के लिए अंधाधुंध कमाई का जरिया बन गयी हैं. देश के कुछ इलाकों में शिक्षा में निवेश को बेहतर लाभ अर्जित करने का सर्वोत्तम जरिया माना जा रहा है. यहां मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट आदि की सीटों की खुलेआम नीलामी हो रही है.
लेकिन, लाखों रुपये और कैरियर के कुछ महत्वपूर्ण साल गंवाने के बाद भी यहां से उत्तीर्ण युवाओं की रोजगार-क्षमता अत्यंत न्यून है. ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सरकार को निजी शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश और शुल्क के नियमन का अधिकार है. अदालत ने स्पष्ट कहा है कि सरकारी सहायता के बिना निजी पेशेवर संस्थान स्थापित एवं प्रबंधित करने का अर्थ स्वमेव पूर्ण अधिकार मिलना नहीं है और शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोकने के लिए राज्य अपनी नियामक शक्तियों का उपयोग कर सकता है.
न्यायालय ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद सरकार ने इस आशा के साथ ऐसी संस्थाओं की स्थापना को प्रोत्साहित किया था कि शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थाएं कल्याणकारी और आदर्शवादी दृष्टिकोण से योगदान करेंगी. दरअसल, मध्य प्रदेश में 2007 में शिक्षण संस्थाओं पर नियमन का कानून बना था, जिसे निजी संस्थाओं ने अदालत में चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इसी मसले पर फैसला सुनाया कि जैसे उद्योगों और व्यवसायों का नियमन होता है, ऐसा ही नियमन शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत जरूरी है.
दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाया है, जिसका स्वाभाविक रूप से व्यापक स्वागत हुआ है. अब उम्मीद बंधी है कि अन्य राज्य सरकारें भी शिक्षा के क्षेत्र में मनमाने तरीके से मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के प्रयास करेंगी. निजी संस्थानों की खुली लूट और गैरजिम्मेदाराना रवैये को निर्बाध चलने देना देश और समाज के लिए आत्मघाती होगा. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक मेधावी विद्यार्थियों की पहुंच पर ही भारत का भविष्य टिका है और इस मामले में लापरवाही विकास की हमारी आकांक्षाओं पर पानी फेर सकती है.
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